छह दशक लंबे संघर्ष का नाम है तेलंगाना

तेलंगाना
Image caption आंध्र प्रदेश में पृथक तेलंगाना राज्य की माँग को लेकर कई सालों से आंदोलन चल रहा है

भौगोलिक रूप से तेलंगाना 114,840 वर्ग किलोमीटर में फैला एक ऐसा क्षेत्र है जो साल 1948 तक निज़ाम राज का हिस्सा था.

हैदराबाद के भारत में विलय के बाद निज़ाम के तीन टुकड़े कर दिए गए. एक टुकड़े को कर्नाटक और दूसरे को महाराष्ट्र में मिला दिया गया.

तीसरे टुकड़े को अलग तेलंगाना राज्य बना दिया गया. यह टुकड़ा तेलंगी या तेलुगु भाषी क्षेत्र था.

बुर्गुला रामकृष्ण राव तेलगांना राज्य के पहले मुख्यमंत्री रहे.

साल 1953

नेहरू सरकार की ओर से राज्यों के पुनर्गठन के लिए बैठाए गए फज़ल अली कमीशन ने तेलंगाना को एक अलग राज्य बनाए रखने की सिफ़ारिश की थी.

वैसे आंध्र क्षेत्र के नेताओं का दबाव था कि तमाम तेलुगुभाषी लोगों के लिए आंध्र, रायलसीमा और तेलंगाना को मिलाकर एक ही राज्य बनाया जाए. केंद्र ने यह बात स्वीकार कर ली.

साल 1956

Image caption तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेस नेता और मंत्री अपनी रणनीति तय करने के लिए लगातार बैठकें करते रहे हैं

तेलंगाना राज्य 1 नवम्बर 1956 को ख़त्म हो गया जबकि केंद्र सरकार ने तीनों क्षेत्रों को मिलाकर आंध्र प्रदेश राज्य का गठन किया. मगर तेलंगाना के लोग कभी अपने इस विलय को स्वीकार नहीं कर पाए.

तेलंगाना समर्थकों की दलील यह थी की आंध्र और तेलंगाना की भाषा, संस्कृति और लोगों के मिज़ाज में बड़ा अंतर है. उन्होंने यह डर भी पैदा करने की कोशिश की कि आंध्र के शक्तिशाली लोग उनके साथ अन्याय करेंगे.

इन्हीं आशंकाओं के मद्देनज़र नेहरू सरकार ने आंध्र और तेलंगाना क्षेत्र के नेताओं के बीच एक 'शरीफ़ाना समझौता' या 'जेंटलमेन्स एग्रीमेंट' करवाया. इसके अंतर्गत तेलंगाना में स्थानीय नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के अनेक प्रावधान रखे गए.

इन्हें ‘मुल्की रूल’ का नाम दिया. यह भी तय किया गया की आंध्र और तेलंगाना क्षेत्रों पर सरकारी आय का कितना हिस्सा ख़र्च होगा.

कुछ ही समय बाद इस समझौते का उल्लंघन शुरू हो गया. तेलंगाना के लोगों को शिकायत थी कि उनके साथ अन्याय किया जा रहा है, उनकी नौकरियाँ छीनी जा रही हैं, राजस्व का बड़ा हिस्सा आंध्र में ख़र्च किया जा रहा है और नदियों के पानी से भी उसी क्षेत्र को लाभ मिल रहा है.

साल 1969

शिकायतों ने बढ़ते-बढ़ते ज्वालामुखी का रूप ले लिया. पूरे तेलंगाना में हिंसक आंदोलन छिड़ गया. मर्री चन्ना रेड्डी के नेतृत्व में ‘तेलंगाना प्रजा समिति’ ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग उठाई.

यह आंदोलन इतना हिंसक हो गया कि पुलिस फायरिंग में चार सौ लोग मारे गए. इनमें अधिकतर छात्र और युवा थे. दूसरी ओर आंध्र में भी ‘जय आंध्र’ आंदोलन छिड़ गया. वहाँ भी कुछ लोग अलग आंध्र राज्य की माँग करने लगे.

Image caption पूरे तेलंगाना में हिंसक आन्दोलन छिड़ गया. पुलिस फायरिंग में चार सौ लोग मारे गए

भारी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद जब 1973 के चुनाव हुए तो उसमें ‘तेलंगाना प्रजा समिति’ को तेलंगाना की अधिकतर लोकसभा सीटें मिलीं.

मर्री चन्ना रेड्डी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ समझौता कर लिया और अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया. तेलंगाना की मांग फिर एक बार ठंडे बस्ते में चली गई.

इस बात से लोग इतने निराश हुए कि अगले 30 साल तक किसी ने अलग तेलंगाना राज्य का नाम नहीं लिया.

साल 2000

तेलंगाना राज्य के मौजूदा आंदोलन की शुरुआत एक ऐसी घटना से हुई जिसे उस समय किसी ने ज़्यादा तवज्जो नहीं दी थी.

सत्तारूढ़ तेलुगु देशम् पार्टी के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने जब तेलंगाना के एक प्रमुख नेता के चंद्रशेखर राव को मंत्री पद दिया तो वे नाराज़ होकर पार्टी से निकल गए.

Image caption तेलंगाना की मांग को लेकर सभी राजनीतिक दल टूट फूट का शिकार हुए

उन्होंने तेलंगाना राज्य के लिए पहले एक ग़ैर राजनीतिक आंदोलन छेड़ा और बाद में उसे ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ के नाम से राजनीतिक दल में बदल दिया. आहिस्ता-आहिस्ता तेलंगाना का मुद्दा आंध्र प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया.

साल 2009

जब 2004 और 2009 के चुनाव में तेलंगाना राज्य का वादा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने अपना वायदा पूरा नहीं किया तो चंद्रशेखर राव नवंबर 2009 में आमरण अनशन पर बैठ गए.

11 दिन तक चलने वाली इस भूख हड़ताल ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया. राव की बिगड़ती हालत और बढ़ते हुए तनाव को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री चिदंबरम ने नौ दिसंबर 2009 की रात यह घोषणा की कि केंद्र तेलंगाना राज्य की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर रही है.

इस घोषणा के बाद तो राजनीतिक अनिश्चितता का नया दौर शुरू हो गया. कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के आंध्र और रायलसीमा क्षेत्र के मंत्री और विधायकों ने इस घोषणा को वापस लेने की मांग करते हुए त्याग पत्र दे दिया.

चिदंबरम ने एक बार फिर अपना रुख़ बदला और कहा कि अभी इस मुद्दे पर और सलाह मशविरा बाक़ी है.

मार्च 2010 में केंद्र ने इस मांग का जायज़ा लेने के लिए ‘श्रीकृष्ण समिति’ की स्थापना की. इस समिति ने उसी साल दिसंबर में रिपोर्ट पेश की और अलग तेलंगाना राज्य का विरोध किया.

समिति ने इस बात की आशंका व्यक्त की कि छोटे राज्यों में माओवादियों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं.

साल 2010 से 2012

तेलंगाना की मांग को लेकर सभी राजनीतिक दल टूट-फूट का शिकार हुए. कई विधायक तेलुगुदेशम् और कांग्रेस छोड़कर टीआरएस में शामिल हो गए.

तेलंगाना के पक्ष में केवल टीआरएस, सीपीआई और भाजपा का रुख स्पष्ट था जबकि कांग्रेस, तेलुगु देशम् और कांग्रेस ने एक अस्पष्ट नीति अपनाए रखी.

मई 2013

Image caption गुलाम नबी आजाद को हटाकर दिग्विजय सिंह को आंध्र प्रदेश की कमान सौंप दी गई

कांग्रेस को एक और धक्का लगा जब तेलंगाना के दो सांसदों मंदा जगन्नाथ और जी विवेकानंद ने कांग्रेस नेतृत्व के तेलंगाना विरोधी रुख के खिलाफ पार्टी से त्यागपत्र दे दिया.

इसी क्रम में पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता केशव राव ने भी त्यागपत्र दिया. तीनों नेता टीआरएस में शामिल हो गए.

इस विषय पर टालमटोल की नीति रखने वाले कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद को हटाकर दिग्विजय सिंह को आंध्र प्रदेश की कमान सौंप दी गई.

इसके बाद कांग्रेस के आला कमान ने सलाह मशवरे का नया दौर शुरू किया. और मंगलवार को कांग्रेस में हुए फ़ैसले ने तेलंगाना की राह साफ़ कर दी है.

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