शत प्रतिशत विदेशी निवेश से किसका फायदा?

टेलीकॉम
Image caption भारतीय टेलीकॉम क्षेत्र क़र्ज़ में डूबा है और मुनाफ़ा घटता जा रहा है.

भारत सरकार ने टेलीकॉम यानी दूरसंचार, बीमा और कई अन्य क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा दी है.

मंगलवार को ये फ़ैसला प्रधानमंत्री और वरिष्ठ मंत्रियों की एक बैठक में लिया गया और अब इस पर मंत्रिमंडल की सहमति ली जानी है.

इस फ़ैसले के तहत दूरसंचार क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी निवेश को मंज़ूरी दे दी गई है जो अभी तक 74 प्रतिशत तक सीमित था.

बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी गई है. सिंगल ब्रांड रिटेल में भी निवेश की सीमा को भी 100 प्रतिशत कर दिया गया है.

'ग्राहक को बेहतर सुविधा'

नए निर्णय के बाद विदेशी दूरसंचार कंपनियों को भारत में व्यापार करने के लिए किसी भारतीय कंपनी से साझेदारी नहीं करनी होगी.

मसलन अब ब्रितानी कंपनी वोडाफ़ोन या नॉर्वे की टेलेनोर को भारत में काम करने के लिए भारतीय साझीदार की ज़रूरत नहीं होगी.

टेलीकॉम क्षेत्र के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार मनोज गैरोला का कहना है कि जिस क्षेत्र पर 2.5 लाख करोड़ रूपए का क़र्ज़ है, उसके लिए ये बहुत राहत की ख़बर है.

मनोज गैरोला का कहना है कि दूरसंचार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की वजह से कंपनियों का मुनाफ़ा कम हो गया है. लेकिन दूसरी ओर सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीक में पैसे लगाने की ज़रूरत है, जो फिलहाल भारतीय कंपनियों के पास नहीं.

वो मानते हैं कि इन कंपनियों को विदेशी निवेश से बहुत मदद मिलेगी. साथ ही विदेशी कंपनियां अपने साथ तजुर्बा और बेहतर तकनीक भी लेकर आएंगी जिसका फ़ायदा ग्राहकों को बेहतर सेवा के तौर पर मिलेगा.

केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि वो दूरसंचार के क्षेत्र में चार से पांच लाख करोड़ रूपयों के निवेश की उम्मीद करते हैं.

बहुत सारी कंपनियों की ज़रूरत

Image caption सरकार के इस फैसले की वजह डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपए की खस्ता हालत बताई जा रही है.

मनमोहन सिंह सरकार ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी गई है.

भारतीय कृषि बीमा कंपनी के पूर्व अध्यक्ष सुपारस भंडारी के मुताबिक़ ये एक सकारात्मक क़दम है.

हालांकि उनका मानना है कि इससे आम लोगों को बहुत अधिक फ़ायदा नहीं होगा लेकिन बड़ी कंपनियां इससे ज़रूर लाभान्वित हो सकती हैं.

उनके मुताबिक़ कंपनियों को आने में अभी थोड़ा समय लगेगा. वो कहते हैं कि भारत में अब भी बहुत सारी बीमा कंपनियों के लिए जगह है.

उनके मुताबिक़ 1973 तक देश में 100 से अधिक कंपनियां मौजूद थीं. बाद में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया.

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