शाकाहारी हैं सोरेन, लेकिन मटन बनाने का शौक़

खुद शाकाहारी लेकिन यारों के लिए चिकन, मटन बनाने के शौकीन. फ़ोटोग्राफ़ी एवं स्केचिंग भी उनकी पसंद में शामिल है.

कभी खादी का लंबा कुर्ता और जींस. कभी साधारण हाफ शर्ट, पैंट. चुनौती को अवसर में बदलने का माद्दा. विषयों पर विचार- मंथन करना और धैर्य के साथ फूंक- फूंक कर कदम रखना. यही हैं हेमंत सोरेन.

13 जुलाई को उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला के बाद युवा मुख्यमंत्रियों की सूची में हेमंत का नाम भी शुमार हो गया.

सरकार चलाने की चुनौती

झारखंड को अलग राज्य बने 13 साल हो चुके हैं. हेमंत सोरेन के नेतृत्व में ये नौंवी सरकार है. मिली-जुली. कांग्रेस, राजद और निर्दलीयों के साथ. ऐसे में अहम सवाल ये है कि ये सरकार कैसे चले, कैसे निभे?

इसके अलावा हेमंत के सामने चुनौतियांएक से बढ़कर एक हैं. मसलन, गुड गवर्नेंस देना, राजनीतिक विरासत संभालना, आदिवासियों के सपने पूरा करना और सरकार की स्थिरता कायम रखना.

38 वर्षीय हेमंत सोरेन झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पुत्र हैं. दस साल में ही हेमंत सियासत की उचाइंयो को छूने में कामयाब हो गए. हालांकि ऊंचाइयां छूने के लिये उन्हें ये पंख अपने पिता शिबू से ही मिले हैं.

झारखंड आंदोलन और महाजनी प्रथा के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नेवाले शिबू को गुरुजी भी कहा जाता है. तीन बार वह झारखंड के मुख्यमंत्री बने. अभी वो दुमका से सांसद हैं.

इंजीनियरिंग छोड़ राजनीति में

हेमंत का जन्म 10 अगस्त 1975 को रामगढ़ जिले के सुदूर नेमरा गांव में हुआ था. लिहाजा वो गांव का दर्द और मर्म भी समझते हैं.

माता रूपी सोरेन चाहती थीं कि बेटा पढ़ लिखकर बड़ा इंजीनियर बनें. लेकिन हेमंत ने 12वीं तक ही पढ़ाई की. बोकारो, पटना और दिल्ली में पढ़े.

फिर बीआईटी मेसरा में इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, लेकिन बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी. वजह- राजनीति ही रास आई. छोटे भाई बसंत सोरेन कहते हैं, “हेमंत ने 2003 में छात्र मोर्चा की राजनीति शुरू की. फिर आगे ही बढ़ते चले गए.”

हेमंत सोरेन को दो पुत्र हैं निखिल और अंश. फुर्सत के क्षण बच्चों के संग खेलना उन्हें खूब भाता है. पत्नी कल्पना सोरेन निजी स्कूल का संचालन करती हैं. घर का भी काम संभालती हैं.

हेमंत सोरेन के बारे में पूछे जाने पर इतना भर कहती हैं, “वह धैर्य बहुत रखते हैं. जल्दी घबराते नहीं. घर पर आने वाले बड़े -बुर्जुगों का ख्याल भी रखते हैं. हमेशा कहते भी हैं कि चुनौती का सामना करना ही असली जिंदगी है.”

Image caption 2003 में छात्र राजनीति से हेमंत सोरेन ने अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था

हेमंत के बड़े भाई विधायक दुर्गा सोरेन भी झारखंड मुक्ति मोरचा के कद्दावर नेता थे. 2009 में उनके असामयिक निधन के बाद हेमंत राजनीति में पूरी तरह रम गए. अभी हेमंत सोरेन की भाभी ( दिवंगत दुर्गा सोरेन की पत्नी) सीता सोरेन भी विधायिका हैं.

'सियासी दांव पेंच में माहिर'

2009 में हेमंत राज्य सभा के सदस्य बने. दिसंबर 2009 में उन्होंने संथाल परगना के दुमका विधानसभा सीट से जीत हासिल करने के बाद राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया. 18 सदस्यों वाली पार्टी के वह नेता बन गए.

2009 में झारखंड की बागडोर शिबू सोरेन ने संभाली, तो पार्टी विधायकों को संतुष्ट रखने के लिए सरकार में शामिल नहीं हुए. 2010 में भाजपा के अर्जुन मुंडा की सरकार बनी, तो समर्थन के बदले हेमंत को डिप्टी सीएम बनाया गया.

मंत्री बनने के बाद वह सियासत की दांव- पेंच से रूबरू होते चले गए. राजनीतिक हवा का रुख भांपते हुए सीएम बनने का तानाबाना बुनने लगे.

दिसंबर 2012 में हेमंत ने भाजपा को सत्ता से हटाने का प्लॉट तैयार कर लिया. सात जनवरी 2013 को झामुमो ने भाजपा से समर्थन खींच लिया.

इसके बाद हेमंत रणनीति का नेतृत्व करने लगे. राजद प्रमुख लालू प्रसाद से भी मंत्रणा की. लालू प्रसाद के साथ उनका रिश्ता चाचा- भतीजा जैसा है. हालांकि सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन हासिल करने में हेमंत को करीब छह महीने का इंतजार करना पड़ा.

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को झारखंड में एक अदद साथी की जरूरत थी. हेमंत ने शर्त रखी कि समझौता तभी करेंगे, जब सरकार बनेगी और मुख्यमत्री भी वही बनेंगे. कांग्रेस रजामंद हो गई. और देखते ही देखते हेमंत झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए.

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