बिहार: बच्चों की मौत एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना क्यों?

मिड डे मील
Image caption मुल्क भर में 12 करोड़ बच्चों को भोजन मुहैया करवाया जाता है.

मिड डे मील स्कीम दुनिया भर के स्कूलों में बच्चों को मुफ़्त भोजन दी जानेवाली सबसे बड़ी योजना है, जिसके भीतर देश में प्रतिदिन 12 करोड़ छात्रों को पका हुआ खाना मुहैया करवाया जाता है.

एक ऐसे मुल्क में जहां कुल स्कूली छात्रों में से पचास फ़ीसद अल्पपोषण के शिकार हैं, वहां ये योजना भूख और निरक्षरता की समस्या से निबटने का अहम ज़रिया है.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि योजना की वजह से प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है, भूख की समस्या से निपटा जा रहा है, और इसकी वजह से विभिन्न जाति और वर्ग से आने वाले बच्चे एक साथ बैठकर खाना खा पा रहे है.

उनका कहना है कि इस प्रोग्राम को सफ़ल माना जा सकता है.

शायद यही वजह है कि बिहार के स्कूल में विषाक्त भोजन खाने की वजह से 22 बच्चों की हुई मौत एक दुखद घटना है.

अलग-अलग स्तर

भारत में सरकार की मदद से चलाई जाने वाली दूसरी स्कीमों की तरह इस मामले में भी अलग-अलग राज्यों में योजना के लागू होना का स्तर अलग-अलग है.

दक्षिणी राज्य तमिलनाडु, केरल और ओड़िसा में ये बेहतर तरीक़े से लागू हो रहा है, तो बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में इसके कार्यान्वयन को बहुत बेहतर किया जा सकता है.

स्कूल में मुफ़्त भोजन दिए जाने की योजना की शुरूआत चेन्नई (मद्रास) में 1925 में हुई थी.

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि सारन के स्कूल में भोजन विषाक्त कैसे हुआ - चिकित्सकों का कहना है कि उन्हें भोजन में कीटनाषक के संकेत मिले हैं. कुछ रिपोर्टों में खाने के तेल में दोष की बात की गई है.

Image caption सारन ज़िले में हुई घटना को लेकर राजनीति भी गर्म हो गई है.

सप्लाई मे मिलावट और रसोई की सफाई सुथराई इसकी एक वजह हो सकती है.

गुणवत्ता से नाख़ुश

वजह चाहे जो भी हो बिहार को अपने 70,000 स्कूलों में मिड डे मील योजना को बेहतर तरीक़े से लागू करने की ज़रूरत है.

साल 2010 में योजना आयोग की एक स्टडी में पाया गया कि बिहार के स्कूलों के 70 प्रतिशत छात्र भोजन की गुणवत्ता से नाख़ुश थे. उनमें से बहुत सारे बच्चों की शिकायत थी कि उन्हें खाने की मात्रा कम मिलती है. एक तिहाई स्कूलों का कहना था कि उनके पास भोजन तैयार करने के लिए बर्तन मौजूद नहीं है.

इस स्टडी में स्कूलों को अनाज की सप्लाई में आने वाले दिक़्कतों की बात भी सामने आई. लेकिन इन सबके बावजूद ये पाया गया कि योजना के आठ साल पहले लागू किए जाने के बाद से अधिक छात्रों ने स्कूल आना शुरू कर दिया है.

अर्थशास्त्री ऋतिका खेड़ा ने योजना के क्षेत्र में काफी शोध किया है. वो बिहार की घटना को "बहुत दुखद" बताती हैं.

लेकिन वो कहती हैं कि ये सब एक ऐसे वक्त में हुआ है जब उत्तरी भारत में योजना के लागू होने में बहुत सुधार हुआ है. इन क्षेत्रों में योजना को नवंबर 2001 में सुप्रीम कोर्ट के एक हुक्म के बाद लागू किया गया था.

खेड़ा कहती हैं कि राजस्थान में पहले बच्चों को उबले हुए गेंहू में चीनी मिलाकर परोसा जा रहा था लेकिन अब उन्हें कई तरह के भोजन दिए जा रहे हैं.

तमिलनाडु में तो बच्चों को हर दिन उबला हुआ अंडा दिया जाता है. राजस्थान अपने बच्चों को सप्ताह में दो दिन फल मुहैया करवाता है.

खेड़ा जैसे अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बिहार में जो कुछ हुआ वो योजना पर किसी तरह से सवालिया निशान नहीं लगाता, लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि भारत में स्वच्छता के क्षेत्र में सुधार हो और स्कूलों में मौजूद रसोई घरों की सुरक्षा बेहतर की जाए ताकि मिड डे मील स्कीम पर वाक़ई गर्व किया जा सके.

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