अजमेर शरीफ: अदालत ने कहा दीवान को मिलेगा चढ़ावे में हिस्सा

Image caption दरगाह में तकरीबन करोड़ो रुपए का चढ़ावा चढ़ाया जाता है.

सूफी संत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह में चढ़ावे के हक़ की लड़ाई में अदालत के आदेश से कानूनी मोड़ आ गया है.

अजमेर की एक अदालत ने दरगाह कमेटी को चढ़ावे के मामले में रिसीवर नियुक्त किया है.

अदालत ने कमेटी को 1933 में तत्कालीन रियासत दौर में जारी किए गए अदालत के आदेश पर तीन सप्ताह में अमल शुरू करने को कहा है.

इस आदेश से चढ़ावे में दरगाह के दीवान जेनुअल आबेदीन को भी हिस्सा मिलने लगेगा.

अदालत के इस फरमान से कोई दो दशक पुराने विवाद का निपटारा हो गया.

दरगाह के सज्जादा नशींन आबेदीन ने अदालत से 1933 में जारी एक अदालत के हुकम की तामील के लिए गुहार लगाई थी क्योंकि दरगाह दीवान को चढ़ावे में हिस्सा नहीं दिया जा रहा था.

विवाद का निपटारा

दरगाह के खादिम और उनकी संस्था अंजुमन ने दीवान की दलील का विरोध किया था. अब अंजुमन के सचिव वाहिद हुसैन चिश्ती कहते है कि वो अदालत के फैसला देखने के बाद ही कुछ कह सकते हैं.

Image caption अदालत के आदेश के बाद अब दरगाह के दीवान को हिस्सा मिलेगा

वाहिद हुसैन का कहना था, ''हम फैसला देखने के बाद अपने वकीलों से सलाह मशिवरा करेंगे, उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है.''

उधर दरगाह दीवान के दफ्तर ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है.

शांति और मजहबी भाईचारे की प्रतीक दरगाह में दुनिया भर से श्रद्धालु आते है और दुआ करने के साथ ख़्वाजा की शान में भेंट चढाते हैं. इस चढ़ावे में नगदी से लेकर बेशकीमती चादर और आभूषण भी होते हैं.

दरगाह दीवान की गुहार थी कि साल 1933 में तत्कालीन अजमेर मेरवाडा की अदालत ने चढ़ावे में उनके हिस्से के लिए आदेश जारी किए थे. मगर अर्से से उस आदेश का पालन नहीं हो रहा है. लिहाजा इसकी अनुपालन कराया जाए. खादिमो की संस्था ने इसके विरोध में दलीलें दी.

जानकर सूत्रों ने बताया कि साल 1940 से लेकर 1990 तक सब कुछ ठीक रहा लेकिन इसके बाद चढ़ावे को लेकर दोनों पक्षों में कानूनी जंग छिड़ गई.

दरगाह में कितना चढ़ावा आता है इसकी सही-सही जानकारी नहीं मिल सकी है पर ये माना जाता है कि ये राशि करोड़ो में आती होगी.

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