ख़ुद रो रहे हैं दूसरों को हँसाने वाले भांड

भांड कलाकार
Image caption राजस्थान की परंपरागत भांड कला, दर्शकों के अभाव में अब ख़त्म होने के कगार पर आ गई है.

राजस्थान के भांड कलाकार पुरखों से विरासत में मिली अपनी इस कला को दुःख और अभावों के बावजूद भी सीने से लगाए बैठे हैं.

इनमें से ज़्यादातर कलाकार मुसलमान हैं और हिंदू देवी-देवताओं के किरदारों का मंचन करते हैं. वे अपनी इस कला के ज़रिए सांप्रदायिक सदभाव का संदेश देने की भी कोशिश करते हैं लेकिन अब इन भांड कलाकारों के मुताबिक़ "न तो पहले जैसे जजमान रहे और ना ही क़द्रदान".

(ख़ामोश अदाकारी)

अपनी कला के साथ गाँव-देहात और कस्बों की फेरी लगाते इन कलाकारों को अब आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है लेकिन कला के प्रति उनका पुश्तैनी लगाव इस फन से उन्हें बांधे हुए है.

फ़िरोज़ ख़ुद को रावण के किरदार में ऐसे पेश करते आए हैं जैसे वह सिनेमा और रंगमंच के मंझे हुए कलाकार हों.

(सुनिए: भांड कलाकारों की दास्तां)

वह एक भांड हैं और उन्हें अपने पारंपरिक काम से सुकून मिलता है लेकिन फ़िरोज़ कहते हैं कि सुकून के ये लम्हे अब छोटे होते जा रहे हैं.

(देखिए: रंगों से कलाकारी)

फ़िरोज़ बताते हैं, ''पहले मेरे पिताजी और बुज़ुर्ग, इस कला के साथ गांव-देहातों में जाते थे तो बड़ी इज़्ज़त और शोहरत मिलती थी. हमें भी लगता था कि लोग कला को प्रोत्साहित कर रहे हैं लेकिन अब बहुत दुःख होता है जब हम मंच के लिए तरस जाते हैं. हमें कोई मंच नहीं मिल रहा जहाँ हम अपनी कला का प्रदर्शन करें."

सुनहरा दौर

ये भांड कलाकार अपनी ध्वनि से ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं जैसे कोई नर्तकी घुंघरू और पायल के साथ नृत्य कर रही हो. वे सायरन और बच्चे की आवाज़ें निकालकर भी लोगों का मनोरंजन करते हैं. दौसा ज़िले के सुबराती, भारत के अनेक भागों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं.

सुबराती ने वो दौर भी देखा है जब सामंत और श्रीमंत भांड कलाकारों की इज़्ज़त करते थे और भेंट देकर प्रोत्साहित करते थे. अब तमाशबीन तो हैं मगर कद्रदान नहीं मिलते.

(आर्ट फेस्टिवल)

गुज़रे दौर को सुबराती याद करते हैं तो भावुक हो जाते है, ''उस दौर में जजमान हमारी बड़ी इज़्ज़त करते थे. हमें मुंहमांगी चीज़ दे देते थे. कभी ज़मीन का टुकड़ा और एक-दो बोरी अनाज तक इनाम मिल जाता था. इनाम अब भी मिलता है मगर अब पहले जैसी बात नहीं है."

Image caption भांड कलाकारों को मेक-अप से लेकर दर्शकों को जुटाने तक के सारे काम अकेले ही करने पड़ते हैं.

सुबराती के मुताबिक़ एक भांड को सब काम अकेले ही करना पड़ता है. थिएटर में कलाकार को मदद के लिए मेकअप मैन मिलते हैं और सहायक भी होते हैं. मगर भांडों को रूपसज्जा से लेकर दर्शक जुटाने तक के सारे काम ख़ुद ही करने पड़ते हैं.

सांप्रदायिक सौहार्द

बांदीकुई के अशोक शर्मा भांड कला में पठान का अभिनय करते हैं.

वह कहते हैं, "जब मैं एक मुस्लिम किरदार करता हूँ तो उससे सदभाव का पैग़ाम जाता है. ये सौहार्द पैदा करता है और इस कला के ज़रिए हम धर्मों के बीच एकता का संदेश देते हैं."

औरों को हंसाने वाला ये कलाकार जब अपनी दुनिया में लौटता है तो ख़ुद उदास हो जाता है.

(कागज़ के टुकड़ों से चित्रकारी)

भांड शमशाद कहते हैं, "भांड रोते हुए को हंसा देता है. जब तक सामने वाला हँसे नहीं भांड खुश नहीं होता. मगर भांड जब घर लौटता है तो रोना आ जाता है. हमें अपने भविष्य की चिंता रुला देती है."

कभी लोगों के दिल बहलाव का सबसे बड़ा ज़रिया होने वाली भांड कला अब दर्शकों के अभाव में विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी है. मनोरंजन के मंच पर अब कलाकार बदल चुके हैं.

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