मिड-डे मील: समस्याओं की बोरी और 'चुटकी भर पैसा'

  • 25 जुलाई 2013

बिहार के छपरा ज़िले में विषाक्त भोजन खाने से हुई 23 स्कूली बच्चों की मौत ने पूरे देश को हिलाकर रख लिया है. स्कूल में मुफ़्त भोजन देने की दुनिया की इस सबसे बड़ी योजना में प्रतिदिन 12 करोड़ बच्चों को खाना मुहैया कराया जाता है.

लेकिन इस मिड डे मील योजना में लगे लोगों की कई परेशानियां हैं. बीबीसी ने देश के कुछ राज्यों में इस योजना से जुड़े लोगों की समस्याएं जानने की कोशिश की.

छत्तीसगढ़ से आलोक प्रकाश पुतुल

छत्तीसगढ़ के बिल्हा के एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक अवधेश विमल का कहना है कि हजार रुपए का मानदेय पाने वाले रसोइए धान बुवाई के समय नहीं आते.

विमल मध्याह्न भोजन के बजट पर भी सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, “शासन प्राइमरी स्कूल में 3.65 रुपए प्रति बच्चे के हिसाब से बजट भेजती है और आप खुद ही सोचिए ऐसा संभव कैसे हो सकता है. क्योंकि आज की तारीख में तो चाय भी पाँच रुपए में मिलती है और उसमें आपको दाल, चावल, सब्जी, अचार, पापड़ मेनू के अनुसार देना होता है. संभव नहीं हो पाता. प्लस उसमें लकड़ी का भी दाम आता है.”

मध्याह्न भोजन में रसोइए को हजार रुपए का मानदेय मिलता है. खाना पकाने वाले रसोइयों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मानदेय मिलता है जो कि एक बड़ा मुद्दा है.

बिलासपुर के तारबाहर स्थित प्राथमिक शाला में रसोइए का काम करने वाली कमला बाई यादव तब से काम कर रही हैं जब से मध्याह्न भोजन की योजना शुरू हुई थी. लेकिन जिस धीमी गति से उनका मानदेय बढ़ता हुआ एक हजार रुपए तक पहुंचा है, वो इसे अपर्याप्त मानती हैं.

शासकीय अंबेडकर प्राथमिक बालक शाला की रोहतिन बाई बताती हैं कि वे हर दिन दोपहर 12 बजे से आ जाती हैं और कम से कम चार बजे तक काम करती हैं. रोहतिन कहती हैं, “ मुझे हज़ार रुपए मिलते हैं लेकिन हज़ार रुपए में होता क्या है? अपने यहां तो मज़दूरों को रोजाना 200 रुपए से अधिक मिलते हैं. कम से कम हमें 3000 रुपए तो हर महीने मिलने ही चाहिये.”

राजस्थान से नारायण बारेठ

राजस्थान में जयपुर ज़िले के ग्रामीण इलाके के देवनगर हर्षूलिया सरकारी स्कूल की शिक्षिका गायत्री मिश्रा ने कहा, "पहली बात तो ये है कि जो गेहूं आता है वो सही नहीं आता. चावल भी साफ नहीं रहता है. हाल में एक ऐसा कट्टा आया था जिसमें गेहूं और चावल दोनों भरे थे. उसमें हम क्या करें?"

उन्होंने कहा, "हमारा कोई दोष नहीं है. हल्की क्वालिटी के गेहूं और चावल की आपूर्ति करते हैं. जितने पैसे मिलते हैं उसमें पोषाहार नहीं आता है. खाना बाहर से बनकर आए तो सबका फायदा है."

साथी शिक्षिका लक्ष्मी मोदवानी कहती हैं, "इससे पढ़ाई भी प्रभावित होती है. सारा टाइम तो प्लेटें धुलवाने और बच्चों को कतारबद्ध तरीके से बैठाने में लग जाता है. धुंआ उठता है तो बच्चों को परेशानी होती है. स्कूल में किचन नहीं है और सारा सामान एक कमरे में रखा गया है. इतनी महंगाई में पोषाहार बहुत मुश्किल हो गया है."

शिक्षा संघ के रामकृष्ण अग्रवाल ने कहा, "मिड डे मील योजना शहर में तो एनजीओ द्वारा संचालित होती है लेकिन गांवों में सारा इंतजाम टीचरों को ही करना पड़ता है. नमक, मिर्च, मसाला, लकड़ी सब कुछ लाना पड़ता है."

उन्होंने कहा, "स्कूल एक रसोईघर बन जाता है. शिक्षक पढ़ाने के बजाए नून-तेल के जुगाड़ में रहता है. स्कूलों में जिला परिषद द्वारा तैनात कुक हेल्पर भी होता है लेकिन सारा काम टीचरों को ही करना पड़ता है."

ओडिशा से संदीप साहू

बीते गुरुवार को ओडिशा के बालेश्वर जिले एक आश्रम स्कूल में खाना खाने के बाद 36 बच्चे बीमार हो गए. इसके अगले ही दिन ढेनकनाल जिले के एक स्कूल में मिड डे मील में एक बिच्छू पड़ा मिला, जिसके चलते खाना खाने वाले 39 बच्चों को अस्पताल ले जाना पड़ा.

इनमें 36 को प्राथमिक जांच के बाद ही वापस भेजा गया लेकिन तीन बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई.

लगातार दो दिनों में दो ऐसी घटनाओं के बाद शनिवार को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने मिड डे मील कार्यक्रम की समीक्षा के लिए ज़रूरी बैठक बुलाई.

बैठक में फ़ैसला लिया गया कि बच्चों को खिलाने से पहले रसोई करने वाली औरत और स्कूल कमेटी के एक सदस्य उसे खाएंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि बच्चों को ज़हरीला या ख़राब खाना न परोसा जाए.

लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि फ़ैसले के ठीक दो दिन बाद यानि सोमवार को बेरहामपुर शहर के एक स्कूल में मिड डे मील में दो सर वाला जीव पाया गया, जिसे बच्चे सांप बता रहे हैं जबकि स्कूली अधिकारी केंचुआ.

भुवनेश्वर के सीतानाथ स्कूल के हेडमास्टर बिपिन बिहारी नायक इस योजना से जुड़ी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहते हैं, “निगरानी में समस्या है. अगर रसोइए जागरूक हों तभी ऐसे मामलों पर अंकुश लगेगा. मेरे ख्याल से अगर बच्चों को पके हुए भोजन के बजाए उनके माता-पिता को पैसे दे दिए जाते तो वे अपना खाना घर से लेकर आते और ये समस्या ही उत्पन्न नहीं होती.”

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