एक गुफा जिसने बचाई 25 लोगों की जान

उत्तराखंड बाढ़ से प्रभावित, धारचुला में राहत शिविर

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के विनाश का कहर धारचूला के लोगों ने सबसे ज़्यादा झेला है.

दुर्गम पहाड़ी इलाक़े में बसे धारचूला के लिए 16 जुलाई का वो दिन बेहद खौफ़नाक था. धौली गंगा नदी अपने पूरे उफान पर थी. आसपास के गाँव में बसे लोगों ने शायद इतना पानी अपने जीवन में कभी नहीं देखा था. इस इलाके में पड़ने वाले चार गाँवों का अब नामोनिशान भी नहीं बचा है.

बर्बादी की कहानी

शोबला, कंजोती, खिम और खेत. सबसे पहले, शोबला बहा, फिर कंजौती, खिम और खेत. इन सभी गाँवों के लोगों की दास्तान एक जैसी ही है. धारचूला इंटर कॉलेज में अब इन गाँवों के करीब 158 से ज्यादा परिवार रह रहे हैं. इस स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं क्योंकि पिछले एक महीने से यहाँ बच्चे, महिलाएँ और बूढ़े सभी एक छत के नीचे रह रहे हैं.

केदारनाथ मंदिर का हाल

सरस्वती बिष्ट खिमस्वा गाँव, कंजोती की रहने वाली हैं. उनके साथ कम से कम 25 लोग किसी तरह जान बचाकर शिविर में आए. वे उस दिन को याद नहीं करना चाहतीं, लेकिन जब वे इसके बारे में सोचती हैं तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं.

घर तबाह

Image caption 16 जुलाई की रात सरस्वती देवी के लिए न भूलने वाली रात साबित हुई.

हादसे वाले दिन क्या हुआ था, इस बारे में पूछे जाने पर वह कहती हैं, "16 तारीख के दिन से ही धौली गंगा नदी में पानी बढ़ने लगा था. जिस तरह नदी में पानी बढ़ रहा था, उसे देखते हुए हमें लगा कि कुछ अनर्थ होने वाला है. हमारे घर तबाह होने जा रहे हैं. हमने अपना थोड़ा बहुत सामान बाँधा, और दूसरी जगह रखने लगे. शाम पाँच बजे के आसपास हमने देखा कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा में पड़ने वाला पुल भी ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा था."

'भुतहा' गाँव

उस लम्हें भय और आशंका के माहौल के बीच बचाव की कोशिशों के लिए तमाम विकल्पों पर विचार किया जा रहा था.

सरस्वती बताती हैं, "यही एक मात्र पुल है जो हमारे गाँव को जोड़ता है. इस पुल के टूटने के बाद तो जान बचाना असंभव था. हम सब ने जल्दी-जल्दी पुल पार किया और खिम गाँव से भागकर कंजौती आ गए. रात में कंजौती का जो झरना है, उसमें भी ज़बरदस्त पानी आ गया था."

डूबा पर्यटन उद्योग

"एक ओर नदी बढ़ रही थी तो दूसरी तरफ़ झरने से पानी और मलबा गिर रहा था. रात में बारह बजे के आसपास नदी से ऐसी भयानक आवाज़ें आने लगीं कि हम सब बहुत डर गए. मेरे साथ दस बच्चे थे. मैंने दो बच्चों को कंधे पर उठाया और एक को गोद में लिया और सारे के सारे पहाड़ की एक गुफा में छिप गए."

पूरा गाँव शमशान

"साढ़े बारह बजे भयानक तूफान आया कि सब कुछ उड़ने लगा. मकान की छतें उड़ गईं, मोटर साइकिलें बह गईं. गाय, भैंस, बकरी सब पानी में बहने लगे. मेरी 50 से ज़्यादा बकरियां ग़ायब हो गईं. बहते हुए लोगों ने नदी में जो कुछ सहारा मिला, पकड़कर अपनी जान बचाई लेकिन फिर भी दो लोग बहकर मर गए."

विकास या तबाही

"हम सब उस गुफा में बैठे रहे, बच्चे रो रहे थे. गुफा में भी डर लग रहा था कि कहीं पत्थर ऊपर से न बरसने लगें. लेकिन ऊपर वाले की कृपा है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. पूरी रात और पूरा दिन हम उस गुफा में ही छिपे रहे. वो रात अब तक की सबसे काली रात थी, सवेरा होने पर देखा कि गाँव तो है ही नहीं, पूरा गाँव बह चुका था. पूरा गाँव श्मशान बन चुका था."

"पहने हुए कपड़ों को छो़ड़कर कुछ भी नहीं बचा था हमारे पास. हम इसके बाद एक पड़ोसी गाँव न्यूसुआ गए, वहाँ लोगों ने हमें खाना खिलाया और पहनने को कपड़े दिए. कुछ दिन बाद पुलिस वाले हमें इस शिविर में ले आए. इस शिविर में रहते हुए एक महीना होने को है. हम खाना तो खा रहे हैं लेकिन बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. हमारा मकान, मवेशी सब कुछ बह गया. समझ नहीं आता क्या करें. अब आगे क्या होगा, भगवान ही मालिक है."

घटनाक्रम

यह कहानी अकेले सरस्वती बिष्ट की नहीं है. उत्तराखंड में बाढ़ से बच गए तकरीबन सभी लोगों के पास ऐसे ही कई अनुभव हैं जिससे सुनकर यह समझना मुश्किल नहीं कि कि उस रात बाढ़ की शक्ल में मौत किस तरह आई होगी.

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