तेलंगाना पर कौन सा दल कहाँ खड़ा है ?

तेलंगाना

अब जब ये लगभग तय हो चुका है कि कांग्रेस पार्टी आंध्र प्रदेश के बटवारे और अलग तेलंगाना राज्य की मांग को पूरा करने वाली है, यह देखना दिलचस्प होगा की इस विषय पर राज्य का कौन सा राजनैतिक दल कहाँ खड़ा है.

कांग्रेस:

साल 1956 में आंध्र और तेलंगाना राज्यों को मिलाकर आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना का फैसला पंडित जवाहर लाल नेहरु और दूसरे कांग्रेसी नेताओं ने ही किया था . हालाँकि तेलंगाना राज्य के लोग इस विलय के खिलाफ थे और बार बार उसके खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे, लेकिन गत 50 वर्षों से कांग्रेस के सभी नेता आंध्र प्रदेश की एकता को बचाए रखने के लिए हर संभव कोशिश करते रहे.

Image caption अलग तेलंगाना राज्य की मांग में बीते कई वर्षों में प्रदर्शन तेज़ हुए हैं.

तेलंगाना राज्य की मांग करने वालों का यह कहना की कांग्रेस ही उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट थी. साल 1969 के हिंसात्मक आन्दोलन के बाद भी, जिसमें 400 छात्र और युवा मारे गए थे, तेलंगाना बनने से रोकने का श्रेय, आंध्र प्रदेश के लोग इंदिरा गाँधी को देते हैं.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस ठंडी पड़ी हुई मांग को साल 1999 में किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस ने ही उठाया, जबकी राज्य में तेलुगु देसम सत्ता में थी और कांग्रेस के 42 तेलंगाना विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक ज्ञापन देकर तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए कदम उठाया जाने की मांग की.

साल 2004 के चुनाव में तो कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य बनाने के वादे के साथ तेलंगाना राष्ट्र समिति से गठबंधंन भी किया. लेकिन केंद्र और राज्य में सत्ता में आने के बाद पार्टी ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

साल 2009 के चुनाव में भी पार्टी ने तेलंगाना के लोगों से दुबारा वही वादा किया, लेकिन यह सबको मालूम था कि मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी तेलंगाना के कड़े विरोधी हैं.

इस बीच कांग्रेस क्षेत्रीय आधार पर बुरी तरह खंडित हो गई. जहाँ तेलंगाना के कांग्रेसी नेता अलग राज्य मांग रहे थे, आंध्र प्रदेश के नेता उसका विरोध कर रहे थे.

सितम्बर 2009 में वाई एस आर की अचानक मौत के बाद स्थिति नाटकीय ढंग से बदल गई. उसी वर्ष नवंबर में टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन ने कांग्रेस को अपनी नीति बदलने पर मजबूर किया और 9 दिसम्बर 2009 की रात पी चिदंबरम ने घोषणा की कि केंद्र, तेलंगाना राज्य के स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर रही है .

इसके बाद भी पार्टी को इस फैसले को लागू करने में लगभग चार वर्ष का समय लगा. वो भी इसलिए कि उसे से महसूस हुआ कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो साल 2014 के चुनाव में पूरे आंध्र प्रदेश में उस का सफाया हो जाएगा.

अब भी उसे आंध्र प्रदेश में चुनावी हार का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन कम से कम वो तेलंगाना राज्य बनाने का श्रेय लेकर इस क्षेत्र में लोक सभा की 17 में से अधिकतर सीटें जीतने की उम्मीद कर सकती है.

तेलुगु देसम

Image caption चंद्रबाबू नायडू व्यक्तिगत रूप से राज्य के बटवारे के खिलाफ रहे हैं

मुख्य विपक्षी दल तेलुगु देसम को भी तेलंगाना के विषय ने क्षेत्रीय आधार पर बाँट दिया है. पार्टी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू व्यक्तिगत रूप से राज्य के बटवारे के खिलाफ रहे हैं. अब तक भी उनका विचार यही रहा है कि यह एक राजनैतिक मांग है और तेलंगाना के लोगों का एक बड़ा हिस्सा अलग राज्य नहीं चाहता. लेकिन तेलंगाना में लगातार चुनावी हार और तेलंगाना के नेताओं के दबाव ने उन्हें यह कहने पर मजबूर कर दिया की तेदपा तेलंगाना राज्य के खिलाफ नहीं है. लेकिन उन्होंने अब तक यह नहीं कहा है की वो तेलंगाना राज्य के पक्ष में हैं.

कांग्रेस की ही तरह तेलुगु देसम के आंध्र और रायलसीमा के नेता भी बटवारे से खुश नहीं हैं लेकिन उम्मीद कर रहे हैं की उससे उन्हें अगले चुनाव में आंध्र और रायलसीमा में फायदा होगा क्योंकि वो बटवारे की जिम्मेवारी कांग्रेस पर डाल सकते हैं. तेदपा को उम्मीद है कि वो आंध्र और रायलसीमा के 25 लोकसभा सीटों में से अधिकतर जीत सकती है.

भारतीय जनता पार्टी:

तेलंगाना पर भारतीय जनता पार्टी अपनी नीति समय के साथ बदलती रही है. साल 1998 के चुनाव से पहले उसने तेलंगाना का वादा किया था, लेकिन जब उसे केंद्र में सरकार बनाने के लिए तेदपा के समर्थन की ज़रुरत पड़ी तो उसने तेलंगाना राज्य के नारे को भुला दिया. लेकिन 2004 की चुनावी हार के बाद से वो तेलंगाना का समर्थन कर रही है.

बीते कुछ वर्षों में उसने बार बार कहा की अगर 2014 में वो केंद्र में सरकार बनाती है तो सब से पहले तेलंगाना राज्य की स्थापना का कदम उठाएगी.

अब जबकी कांग्रेस ने आश्चर्यजनक गति से ये फ़ैसला ले लिया है, तो भाजपा को इससे बड़ी निराशा हुई है. तेलंगाना भाजपा के लिए अहम् क्षेत्र रहा है और उसे उम्मीद थी कि अगले चुनाव में उसे यहाँ काफ़ी जन समर्थन मिलेगा और कुछ न कुछ सीटें उसकी झोली में गिरेंगी लेकिन अब यह उम्मीद कम हो गई है.

वाई एस आर कांग्रेस :

तेलंगाना बनने से अगर सबसे ज्यादा किसी पार्टी को हानि होती दिखाई दे रही है तो वो वाई एस आर कांग्रेस पार्टी है, जो जगनमोहन रेड्डी ने अपने पिता की याद में स्थापित किया था. इसके 17 में से 16 विधायक तेलंगाना का विरोध करते हुए त्याग पत्र दे चुके हैं और इस पर नाराज़ होकर उसके तेलंगाना के बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. अब पार्टी की रणनीति यही हो सकती है की वो तेलंगाना का विरोध करते हुए आंध्र और रायलसीमा में चुनावी लाभ उठाने की कोशिश करे.

वाम दल:

Image caption असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं कि अलग तेलंगाना राज्य में सांप्रदायिकता बढ़ेगी

वाम दलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और चार छोटे दल तेलंगाना के समर्थन में हैं जबकी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी उसका विरोध कर रही है. लेकिन एक बार तेलंगाना बन गया तो फिर मार्क्सवादी दल भी उसे स्वीकार कर लेगी.

मजलिस-इ-इत्तेहादुल मुस्लिमीन

यह मुस्लिम राजनैतिक दल, जिसका आधार अधिकतर हैदराबाद में ही है, तेलंगाना का विरोध करती रही है. उसके अध्यक्ष और सांसद असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं कि अलग तेलंगाना राज्य में सांप्रदायिकता बढ़ेगी, भाजपा शक्तिशाली बनेगी और उससे मुसलमान अल्पसंख्यक को नुक्सान होगा. तेलंगाना की जगह मजलिस ने "रॉयल तेलंगाना" की मांग की जिसमें रायलसीमा के चार ज़िले भी शामिल हों. अगर ऐसा होता तो नए राज्य में मुसलमान जनसंख्या कर प्रतिशत ज्यादा होता.

जहाँ मौजूदा आंध्र प्रदेश की जनसंख्या में मुसलमानों की संख्या नौ प्रतिशत है, वहीं तेलंगाना में वह बढ़ कर 16 प्रतिशत हो जाएगी. इससे आगे चल कर मजलिस को भी अपनी शक्ति बढाने का मौक़ा मिल सकता है. इस समय मजलिस के पास संसद की एक और विधान सभा की सात सीटें हैं और हैदराबाद नगर पालिका पर भी उसका नियंत्रण है.

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