उत्तराखंड: गर्भवती महिलाएँ- दो ज़िंदगी बचाने की जंग

आपदा के एक महीने बाद भी सड़क संपर्क न होने के चलते कस्बों और गाँवों की गर्भवती महिलाओं पर दोहरी मार पड़ रही है. दो ज़िंदगियां बचाने की जद्दोजहद में वे दुर्गम इलाकों में पैदल चलने को मजबूर हैं.

उत्तराखंड के मुनसियारी क्षेत्र से अब तक कम से कम छह गर्भवती महिलाओं को हेलिकॉप्टर के ज़रिए उन अस्पतालों में पहुंचाया जा चुका है, जहाँ प्रसव की सुविधा है.

इन दुर्गम इलाकों में स्थितियाँ गर्भवती महिलाओं के लिए डराने वाली हैं.

सुकुमा देवी की कहानी

Image caption आठ माह की गर्भवती सुकुमा देवी को हेलिकॉप्टर से बंगापानी से निकाला गया

सड़क संपर्क टूट जाने के चलते प्रसव के समय उनके पास विकल्प है कि या तो घर पर प्रसव कराएं या फिर पहाड़ों पर घंटों लगातार चढ़ते हुए अस्पताल पहुंचें.

मुनसियारी के उप ज़िलाधिकारी अनिल कुमार शुक्ला ने बीबीसी को बताया, “हेलिकॉप्टर के ज़रिए दो गर्भवती महिलाओं को मल्ला जोहार से, एक को गोल्फा, एक को बौना से बाहर लाया गया है. इसी तरह बंगापानी में दो महिलाओं को अस्पताल पहुंचाया गया है.”

अनिल कुमार शुक्ला कहते हैं कि अब चूंकि कहीं-कहीं रास्ता भी खुलने लगा है, तो डॉक्टरों का दल वहाँ जाकर उनकी देखभाल कर रहा है.

जीतेंद्र सिंह स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जिन्होंने बंगापानी में फँसी एक गर्भवती महिला सुकमा देवी को बाहर निकाला. वह बताते हैं कि सड़क संपर्क न होने के चलते इलाकों तक पहुंचना बेहद कठिन है.

जीतेंद्र सिंह ने बताया, “दो जुलाई को जब हमारी टीम बंगापानी पहुंची तो गर्भवती सुकुमा देवी की हालत बहुत ख़राब थी. उनके दाहिने पैर में ऊपर से नीचे तक सूजन थी, वह ज़रा भी चलने की हालत में नहीं थीं.”

सुकुमा का गर्भ आठ महीने का था. “तो उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें हेलिकॉप्टर से बाहर निकाला गया. उन्हें पिथौरागढ़ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ से उन्हें हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल ले जाया गया.”

हेलिकॉप्टर का ही भरोसा

दुर्गा उप्रेती, मदकोट के देवी प्रखंड के शिविर में विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की सेहत की देख-रेख करती हैं. इस शिविर में एक गर्भवती महिला है, जिनके प्रसव की तारीख करीब है.

वह कहती हैं, “ये महिला प्रसव के लिए मुनसियारी जाना चाहती है लेकिन मदकोट से मुनसियारी सिर्फ हेलिकॉप्टर ही पहुंचा सकता है. वैसे शायद इसकी नौबत न पड़े क्योंकि ये उनका दूसरा बच्चा है.”

सड़क की स्थिति तो ये है कि मदकोट से जॉलजीबी तक का पूरा रास्ता बनने में साल भर से कम नहीं लगेगा.

मदकोट में तो हेलिकॉप्टर उतारने की भी जगह नहीं है, वहाँ से पैदल चलकर अस्पताल पहुंचने में कम से कम 30 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ेगा. वो भी जंगल-जंगल पहाड़ चढ़ते और उतरते हुए.

इसी तरह, गोठी के राहत शिविर में दो गर्भवती महिलाएं थीं लेकिन इममें से एक को पिथौरागढ़ के अस्पताल ले जाया गया है.

आशा कार्यकर्ता कृष्णा फिरवाल कहती हैं, “भगवान का शुक्र है कि जब तक धारचुला से पिथौरागढ़ का रास्ता कटा रहा, तब तक इस तरह का कोई मामला नहीं हुआ.”

बलुआकोट के राहत शिविर में भी एक गर्भवती महिला थीं, जिन्हें पिथौरागढ़ में भर्ती कराया गया है.

शिविर के प्रभारी जयंत बताते हैं कि आशा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आपातकालीन एंबुलेंस 108 की सेवा भी ली जा रही है. ताकि गर्भवती महिलाओं को तत्काल पास के अस्पलातों में ले जाया जा सके.

गर्भवती महिला के लिए इसलिए भी दिक्कतें हैं क्योंकि वे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जा नहीं सकतीं, घर पर इंजेक्शन उन्हें लग नहीं सकते. प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं के पास दो ही चारे हैं. या तो भगवान भरोसे गाँव में ही बच्चे को जन्म दें या फिर हेलिकॉप्टर के ज़रिए अस्पताल पहुंचें.

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