उत्तराखंड: अलमोड़ा के एसडीएम नदी के तेज़ बहाव में बहे

Image caption हिमालय की केदार घाटी में जो जल प्रलय आया उसमें करीब 6000 लोग मारे गये

केदारनाथ में आपदा के डेढ़ महीने बाद भी हादसों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. प्रदेश सरकार का इस बात पर जोर है कि कैसे केदारनाथ में जल्दी से जल्दी सफाई करके किसी भी तरह से सावन के महीने में वहां पूजा शुरू हो जाए.

इसी सिलसिले में आज दिन में एमआई 17 हेलीकॉप्टर से वहां 31 लोगों का दल भेजा गया था उनमें अलमोड़ा के एसडीए अजय अरोड़ा भी शामिल थे.

चार बजे के करीब जब अजय अरोड़ा मंदाकिनी नदी को पार कर केदारनाथ मंदिर तक पंहुचने की कोशिश कर रहे थे तो उनका पांव फिसल गया और वो मंदाकिनी के तेज बहाव में बह गये.

गढ़वाल के आयुक्त सुवर्धन ने बीबीसी को फोन पर बताया कि, “आपदा के बाद केदारनाथ मंदिर तक जाने के लिये लकड़ी का अस्थाई पुल बनाया गया है और उसी के रास्ते मंदिर तक पंहुचा जाता है.आज मौसम काफी खराब था और नदी का बहाव भी बहुत तेज था.”

उन्होंने बताया कि, “पुल पर जाते हुए शायद अजय अरोड़ा का संतुलन बिगड़ गया और वो नदी में गिर गये.केदारनाथ में तैनात एनडीएरएफ के गोताखोर उनकी तलाश कर रहे हैं.”

16 जून और 17 जून को मध्य हिमालय और ऊंचे हिमालय की केदार घाटी में जो जल प्रलय आया उसमें करीब 6000 लोग मारे गये.

बारिश और भूस्खलन

इस आपदा के बाद भी लगातार हो रही भारी बारिश और भूस्खलन से राहत और बचाव का काम बहुत चुनौती पूर्ण रहा है और दुर्गम रास्तों से जान जोखिम में डालकर सेना और नागरिक सुरक्षाकर्मियों के जवान इस काम को अंजाम दे रहे हैं. इस दौरान अब तक तीन हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं .

ध्यान देने की बात है कि केदारनाथ का अध्ययन करने गये भारतीय पुरात्त्व सर्वेक्षण विभाग की टीम पहले ही कह चुकी है कि केदारनाथ टापू की तरह हो गया है और वहां अभी काम के हालात ही नहीं हैं.

Image caption ऐसे ही अस्थाई पुलों से बाढ़ग्रस्त इलाके में सैकड़ों लोगो को बचाया गया.

दरअसल केदारनाथ में सबसे बड़ी चुनौती वहां बाढ़ और भूस्खलन से दूर-दूर तक बहकर आया मलबा है जिसे कैसे हटाया जाएगा और कहां डाला जाएगा. क्योंकि इस मलबे को हटाए बिना कोई काम शुरू ही नहीं किया जा सकता.

मलबा हटाने के लिये जेसीबी मशीनों को ले जाने की बात कही जा रही है लेकिन वहां जेसीबी जा ही नहीं पा रही है और भूविज्ञानी भी इस बारे में चेतावनी दे चुके हैं कि ये एक ग्लेशियल डिपोजिट है और उसे हटाने की हड़बड़ी फिलहाल नहीं करनी चाहिये.

इस बीच आपदा के कारणों को समझने और हिमालयी भूगर्भ के बारे में बुनियादी अध्ययन के लिये भूगर्भविज्ञानी, भूकंप के जानकार, पर्यावरणविद और दूसरे कई विशेषज्ञों की वाडिया इन्स्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलजी में एक बैठक बुलाई गई.

हिमालय से छेड़छाड़

Image caption बारिश और भूस्खलन से आपदाग्रस्त इलाके के पुनर्निर्माण में बाधा पहुंची है.

देहरादून में हुई इस बैठक में कहा गया है कि हिमालय से छेड़छाड़ की रोकथाम हो और एक दीर्घकालीन विकास का ढांचा बनाया जाए जिसमें कुदरत और इंसान दोनों के लिए जगह हो.

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि सरकार को धार्मिक पर्यटन का स्वरूप भी अब इस लिहाज से रखना चाहिए कि उससे हिमालयी इकोलॉजी और पर्यावरण को किसी भी तरह की ठेस न पहुंचे.

मिसाल के लिए पर्यटकों की आमद और वाहनों को नियंत्रित किया जा सकता है. निर्माण कार्य नियंत्रित किए जा सकते हैं और इकोफ्रेंडली विकास को तरजीह दी जा सकती है.

हिमालय क्योंकि नया पहाड़ है और लगातार तिब्बत की ओर खिसक रहा है तो उसके नीचे भूगर्भीय हलचलें लगातार जारी हैं. भूकंप और भूस्खलन और त्वरित बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील पहाड़ों में विकास और निर्माण के कदम फूंकफूंक कर रखे जाने की जरूरत है. तभी हिमालय बचा रह पाएगा, पहाड़ बचे रह पाएंगे तो मैदान भी बचेंगे. वरना नहीं.

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