छत्तीसगढ़: 'ये पावर प्लांट जीवन में अंधेरा ही लाए हैं'

  • 2 अगस्त 2013
छत्तीसगढ़ में बिजली उत्पादन.

छत्तीसगढ़ को 'पावर हब' बनाने की मुख्यमंत्री रमन सिंह की योजना से जांजगीर-चंपा ज़िले के किसान नाराज हैं. किसानों का कहना है कि राज्य को 'पावर हब' में बदलने की कोशिश छत्तीसगढ़ के किसानों को बदहाल कर देगी.

असल में पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में 68,460 मेगावॉट बिजली उत्पादन के लिए कुल 73 समझौते किए हैं और 29 कंपनियां ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पावर प्लांट के लिए अकेले जांजगीर-चंपा ज़िले को चुना है.

इससे पहले औद्योगिक घरानों की पहली पसंद रायगढ़ और कोरबा ज़िले हुआ करते थे लेकिन पिछले कुछ सालों से इन दोनों जिलों में प्रदूषण के कारण बुरा हाल है.

एक गाँव जो टापू में बदल रहा है

जांजगीर-चंपा ज़िले में 30,932 मेगावॉट बिजली का उत्पादन किया जाएगा. भारत सरकार के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि जांजगीर-चंपा देश का पहला जिला होगा, जहां इतनी मात्रा में बिजली का उत्पादन किया जायेगा.

हालांकि राज्य के ऊर्जा सचिव अमन सिंह का कहना है कि भले जांजगीर-चंपा में पावर प्लांट के लिए बड़ी संख्या में समझौते हुए हों लेकिन कई कंपनियों को तो केंद्र सरकार की ओर से अभी कोल ब्लॉक का आवंटन नहीं हुआ है.

क्या मिला भूमिहीन गरीबों को?

अमन सिंह कहते हैं, "आज की तारीख में अधिकतम सात से आठ हजार मेगावॉट बिजली के उत्पादन की ही स्थिति जांजगीर-चंपा में है. ऐसे में ज़िले की आबादी के सामने जल, जंगल और जमीन के संकट जैसी आशंका निर्मूल है."

बिजली किसके लिए?

अपने इलाके में एक के बाद एक पावर प्लांट लगने से दुखी अकलतरा के ब्रजेश गौराहा देश के 18वें ऊर्जा सर्वे के हवाले से बताते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य को 2017 तक अधिकतम 4325 मेगावॉट बिजली की जरुरत होगी. जबकि राज्य में 5650 मेगावॉट क्षमता के पावर प्लांट पहले से ही अकेले कोरबा ज़िले में स्थापित हैं.

ब्रजेश कहते हैं, "केंद्रीय विद्युत अभिकरण के अनुसार 1000 मेगावॉट बिजली उत्पादन के लिए एक साल में पाँच करोड़ घनमीटर पानी की जरूरत पड़ेगी. जबकि छत्तीसगढ़ की 2.6 करोड़ की आबादी के पीने के लिए साल में 3.8 करोड़ घनमीटर पानी की जरूरत होती है. मतलब साफ है कि राज्य में 68,460 मेगावॉट बिजली के उत्पादन के लिए एक साल में उतना पानी चाहिए होगा, जितनी छत्तीसगढ़ की आबादी लगभग सौ साल में उपयोग करेगी. इसके अलावा पावर प्लांट से पैदा होने वाली राख से तो यह पूरा जिला ही पट जायेगा."

अधिकारियों कंपनियों की मिलीभगत

जाहिर है, बिजली उत्पादन के लिए लगने वाले पानी और इन पावर प्लांट से होने वाले प्रदूषण को लेकर ज़िले के किसान डरे हुए हैं. किसानों की ज़मीन जा रही है सो अलग.

राज्य के ऊर्जा सचिव अमन सिंह का कहना है कि पड़ोसी ज़िले रायगढ़ और कोरबा में कोयला खदानों की उपलब्धता के कारण ही जांजगीर-चंपा ज़िले में पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं.

वे कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में ये अवधारणा बनी है कि जहां कच्चा माल उपलब्ध हो, उसी के आस-पास छोटे संयंत्र लगाए जाएँ, जिससे परिवहन में लगने वाला श्रम, समय और धन तो बचे ही, पर्यावरण का भी न्यूनतम नुकसान हो."

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के नेता नंद कश्यप बताते हैं, "जांजगीर-चंपा राज्य में सर्वाधिक 78 प्रतिशत सिंचित इलाका है. यहां 10 बड़े और मध्यम औद्योगिक उपक्रम पहले से ही हैं, जो प्रदूषण फैला रहे हैं."

कोयले को लेकर हायतौबा क्यों?

कश्यप कहते हैं, "छत्तीसगढ़ में धान की औसत पैदावार 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है लेकिन जांजगीर-चंपा में धान की पैदावार 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. सरकार किसानों की ज़मीन छीनना चाहती है और उनका पानी भी. सरकार इन पावर प्लांट के लिए 42 हजार एकड़ ज़मीन इन पावर प्लांट के हवाले करेगी."

ज़मीन अधिग्रहण का खेल

नरियरा गांव में निर्माणाधीन 3600 मेगावॉट के केएसके महानदी पावर कंपनी लिमिटेड को अपनी ज़मीन देने वाले राजीव देवांगन का कहना है कि कंपनी ने औने-पौने भाव में ज़मीन खरीदी और हमें बेदखल कर दिया गया.

असल में छत्तीसगढ़ में ज़मीन अधिग्रहण करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन और भत्ते के अलावा अतिरिक्त इंसेंटिव देने की घोषणा सरकार ने कर रखी है और भूअर्जन अवार्ड के दौरान इसके लिए 10 प्रतिशत रकम सेवा शुल्क के मद में जमा करने का प्रावधान रखा गया है.

जाहिर है, ज़मीन अधिग्रहण की होड़ ऐसी है कि अधिकारियों ने सैकड़ों एकड़ ज़मीन की सिंचाई करने वाले 131 एकड़ में फैले रोगदा बांध को भी अनुपयोगी बता कर पावर प्लांट को दे दिया.

कोयले की तह में छिपे सवाल

ज़िले में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें सरकारी अधिकारियों ने कागजों में शासकीय प्रयोजन के लिए किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया, जबकि हकीकत में ये ज़मीनें निजी पावर प्लांट के हवाले कर दी गईं. फर्जी तरीके से जमीनों को खरीदने के किस्से गांव-गांव में बिखरे हुए हैं.

बलौदा विकासखंड के केराकछार गांव को ही लें. गांव में पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के जयकुमार परस्ते नामक युवक ने आदिवासियों की सैकड़ों एकड़ ज़मीन कौड़ियों के मोल खरीद ली. गांव में जब एक निजी कंपनी ने पावर प्लांट के लिए ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरू किया तब जा कर पता चला कि परस्ते ने असल में इसी कंपनी के लिए ज़मीनें खरीदी थीं.

राजकुमार बिंझवार का दावा है कि परस्ते ने जिन आदिवासियों की ज़मीन खरीदी, उसके मालिक सही कीमत पाने से तो वंचित हुए ही, कंपनी आदिवासी की ज़मीन ख़रीदने के लिए ज़रूरी कानूनी प्रक्रिया से भी बच गई और इन आदिवासियों को नियमानुसार मुआवजा व नौकरी देने से भी.

कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार

राजकुमार कहते हैं, "अब तो पूरा गांव कंपनी को ज़मीन देने से मना कर रहा है. अगर ज़मीन गई तो जीने-खाने के रास्ते भी तो बंद हो जायेंगे."

पामगढ़ से लगे हुए भैंसो गांव से होकर कई पावर प्लांट के हाईटेंशन टावर से बिजली गुजरती है.

गांव के प्रमोद चंदेल कहते हैं, "मुझे डर है कि आने वाले दिनों में सब तरफ केवल हाईटेंशन तार-तार का ही जाल नजर आएगा. हमारे गांव में खेतों के ऊपर से बिजली के तार गुजरते हैं और खेतों में विशालकाय टावर लगा दिए गए हैं. जिन खेतों में बड़े-बड़े टावर लगे हैं, उनमें हम खेती भी नहीं कर सकते. इसका मुआवजा भी हमें नहीं मिला है."

इसी तरह तेंदूभांठा गांव के मनबोधी चौहान की शिकायत है कि उनके गाँव में पावर प्लांट लगने से पहले सरकारी अफसरों ने नौकरी देने की बात कही थी लेकिन नए आए अफसर पुरानी बातों को भूल जाने की बात कहते हैं.

बकौल चौहान, "जमीनें तो गईं, 103 लोगों के मकान भी चले गए. कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक हमने गुहार लगाई लेकिन आज तक हमारा पुनर्वास नहीं हुआ."

चंपा के मनहरण राठौर का कहना है कि पावर प्लांट के कारण राज्य से बाहर के लोगों को तो रोशनी मिलेगी लेकिन जांजगीर चंपा के किसानों के लिए तो ये पावर प्लांट जीवन में अंधेरा ही लेकर आए हैं.

राज्य के श्रम और कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू भी मानते हैं कि कृषि की ज़मीन अंधाधुंध तरीके से उद्योग या दूसरे प्रयोजनों के लिए लिए जाने का प्रतिकूल असर पड़ सकता है.

साहू कहते हैं, "हमने हाल ही में भू-राजस्व संहिता में संशोधन करते हुए कृषि की ज़मीन को गैरकृषक को देने पर रोक लगा दी है. यह एक छोटी सी पहल है और हमें उम्मीद है कि इससे खेती की ज़मीन बच पाएगी."

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