'मैं वो चूहा हूँ जो पटना से भाग गया'

बिहार
Image caption ये किताब पटना शहर पर लिखी गई है. लेखक हैं अमिताव कुमार.

लेखक अमिताव कुमार सालों से अमरीका में रह रहे हैं. वहीं अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं और कई विषयों पर लिखते रहे हैं.

हाल ही में उन्होंने पटना शहर पर एक किताब लिखी है, 'ए मैटर ऑफ रैट्स'. उनके शब्दों में ये किताब लिखना उस शहर को दोबारा पाने और जीने की कोशिश है जिसे वो पच्चीस साल पहले छोड़ आए थे.

इस किताब के बहाने अमिताव कुमार बीबीसी हिंदी के दफ़्तर आए. बीबीसी से उनकी हुई बातचीत का ब्यौरा .

पटना पर लिखने का फैसला क्यों ?

दरअसल ये विचार मेरा नहीं था. ये पब्लिशर डेविड डेविडार का आइडिया था. उन्होंने अमरीका में मुझे फोन करके कहा कि हम आठ लेखकों से अपने गृह नगर के बारे में एक छोटी सी किताब लिखने को कह रहे हैं, आप भी लिखिए.

मैंने ये आइडिया झट से पकड़ लिया. क्योंकि मुझे लगा कि अब पटना मुझसे दूर होता जा रहा है. मैं 26-27 साल से बाहर हूं. हर साल आता हूं घर, मेरे मां-बाप पटना में रहते हैं, मेरी बहन भी वहां रहती है. लेकिन मुझे लगता है कि पटना से जैसे मेरा साथ छूट रहा है. तो, मैंने सोचा ये अच्छा मौका है कि पटना में फिर से कुछ जगहों पर वापस जाकर कुछ लोगों से बात करूं या कुछ नई चीजों के बारे में जानूं.

शीर्षक ‘ए मैटर ऑफ रैट्स’ क्यों?

'हुआ यूं कि मेरी मां जो काफी बूढी हैं, वे अपने नकली दांत बिस्तर के बगल में रखकर सोई थीं, एक रात चूहे उसे लेकर भाग गए. तो मुझे बड़ा अजूबा सा लगा.

फिर एक दिन अखबार में पढा कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि बिहार में जो चूहे हैं वे ‘ड्रंकन रैट’ हैं. मतलब शराबी चूहे क्योंकि पुलिस द्वारा ज़ब्त की गई शराब चूहे पी गए.

मैंने सोचा कि अगर ये कहानी दोहराई जाए तो लोगों को पसंद आएगी. मुझे इसमें अपने लिए एक उपमा भी नज़र आई. कोई जहाज़ जब डूबने लगता है तो सबसे पहले वहां से चूहे भागते हैं. इसी तरह मुझे लगता है कि मैं पटना शहर से भाग गया. मैं ही वो चूहा हूँ जो अपने बूढ़े मां-बाप को छोड़कर भाग गया. बस ‘ ए मैटर ऑफ रैट्स’ हो गया.

पटना छूटने का ग़म ?

जी हां, ख़लिश है कि पटना छोड़ दिया है हमने. अपने मां-बाप को छोड़ दिया. दूसरी बात है कि पटना में रह कर जो लोग संघर्ष कर रहे हैं, चाहे वो बिज़नेस में हो या शिक्षा के क्षेत्र में, मैं उनका बेहद सम्मान करता हूं. कुछ लोग बहुत मेहनत करते हैं. मैं जब अमरीका में अपने छात्रों को पढ़ाता हूं, तो उनके साथ बहुत मेहनत करता हूं. प्रोफेसर हूं वहां, अंग्रेज़ी का. उन्हें पढ़ाते-पढ़ाते कभी लगता है कि मैं ये क्या कर रहा हूं. ये कौन लोग हैं? अगर अपने लोगों के बीच रह कर पढ़ाता तो खुद हमारे लेखन की जड़ें मजबूत होतीं. हमारे लोग बड़े बनते, किताबें लिखते. मौका मिला तो पटना यूनिवर्सिटी में आप मुझे देखेंगी.

किताब वाले ख़ास कवि का नाम क्यों नहीं?

Image caption अमिताव कुमार का पटना से बेहद जुड़ाव है. वे पिछले 26-27 साल से पटना से बाहर रह रहे हैं.

सबसे पहले ये बता दूँ कि मैंने उनके बारे में क्यों लिखा. यह एक कवि और उनके प्रेम की कहानी है. एक शादी, जो खत्म हो गई उसके बारे में है. वे मेरे दोस्त हैं. मैंने कहीं इस किताब में ज़िक्र किया है कि अगर आपको लेखक बनना है तो दोस्त आपसे कुछ कहें भी, तो भी आपको बेफिक्र उसके बारे में लिख देना चाहिए.

और मैंने जिस लेखक का उदाहरण दिया है वे एक आयरिश लेखक हैं, ‘कॉम टोयबीन’. वे कहते हैं कि अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो लेखक मत बनिए. अगर आप लॉ स्कूल में दाखिला लेना चाहते हैं तो मैं आपके लिए सिफारिशी खत लिख दूंगा.

आपकी नैतिकता कोर्टरूम में काम करेगी. आप अगर लेखक हैं, तो आपकी नैतिकता लेखन से है. आपको जो नज़र आता है वह सब मटिरियल है. उसी नैतिकता के साथ मैं आगे बढ़ा.

मैंने सोचा कि इस शादी के बारे में बात करूंगा तो उससे पता लगेगा कि आदमी-औरत के बीच क्या होता है. कुछ और भी. जैसे कि बिहारी सोसायटी में औरतों की क्या जगह है. नाम इसलिए बदल दिया कि ये एक निजी मामला है. और मैं उनको ब्रीदिंग स्पेस' देना चाहता था, ताकि उन्हें दिक्कत ना महसूस हो.

दूसरो की निजता ?

कई बार ऐसे द्वंद से सामना होता है. इस बार भी वह सवाल सामने आया मगर मैंने उसे छिपा दिया. मैंन दोबारा इस पर नहीं सोचा. मैं यह सब सोच कर ही चला था और मैने उस कवि से बाद में बात भी की. उन्हें इस ज़िक्र से आपत्ति नहीं थी.

पटना से रिश्ता ?

पटना से मोहब्बत है और थोड़ा थोड़ा गिला-शिकवा भी है.

शिकवा ये है कि विकास के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसे थोड़ा असहज महसूस करता हूं.

जैसे सब कहते हैं पटना में मॉल बन गया है. इतनी तरक्की हो गई है. पर मैने अपनी आंखों से देखा एक बार एक पिता मॉल से बच्ची को लेकर बाहर निकले. सामने से बस बहुत तेज़ आ रही थी. पिता ने बच्ची को तो बचा लिया पर खुद बस के नीचे आ गए. एक ओर ये आलीशन मॉल. मगर लोगों के चलने लायक सड़क नहीं. तो इस तरह की तरक्की से थोड़ी उलझन में हूं.

अमरीका में भी तो ऐसी तरक्की के काफ़ी नमूने हैं ?

अमरीका में असमानता बहुत ज्यादा है. मुझे लगता है, अमरीका भारत का मिरर इमेज है. एकदम आईना.

वहां के अंबानियों के पास बहुत ज्यादा पैसा है और जो सबसे गरीब हैं उनके पास कुछ नहीं.

बात ये है कि अमरीका को मैं कभी घर नहीं मान सका. इसलिए जो दुख पटना में इन चीजों को देख कर होता है वो कही ज़्यादा है. एक निकटता है इस समस्या से जो मुझे वहां नहीं महसूस होती. इसलिए उस बारे में किताब नहीं लिख पा रहा हूं.

लेखक के रूप में शुरुआत कैसे ?

Image caption अमिताव कुमार मानते हैं कि पटना पर लिखना उनके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रहा.

मैं शुरू शुरू में काफी खराब स्टूडेंट था. समझ ही नहीं आ रहा था कि मुझे करना क्या चाहिए.

दिल्ली में जार्ज आरवेल के कुछ लेख पढने का मौका मिला. जैसे जैसे पढ़ता गया, भाषा का ज्ञान हुआ. अपने इर्द-गिर्द की चीजों को नाम देने लगा. भाषा से लगाव हुआ.

कौन सी किताब सबसे मुश्किल ?

कारगिल युद्द के समय मेरी शादी एक पाकिस्तानी लड़की से हो गई. उस समय न्यूयार्क में एक हिंदू ग्रुप ने अपने हिट लिस्ट में मुझे रख दिया. खैर, तो उससे एक कहानी शुरू हुई जो मुझे गुजरात, कश्मीर, फिर करांची वगैरह ले गई. उसमें मज़ा आया.

अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदू मुसलमान, भारत-पाकिस्तान के संबंधों को समझने का एक मौका मिला. और मैंने वो किताब लिख डाली, ‘हसबैंड ऑफ ए फैनैटिक’.

पर पटना पर लिखना सबसे चुनौतीपूर्ण था मेरे लिए.

बिहार में इतना आकर्षण क्यों ?

मैंने खुद को अमरीका में कभी 'इनसाइडर' नहीं माना. कभी नहीं लगा घर में हूं.

शायद किसी लेखक को थोड़ी हद तक तो 'आउटसाइडर' होना चाहिए. मगर पटना में लगता है कि मैं अपने घर आया हूं. और शायद इसीलिए बिहार के तरफ इतना खींचा चला आता हूं.

इस बातचीत को अगर आप रेडियो पर सुनना चाहें तो 11 अगस्त के बीबीसी हिंदी 'संडे दिनभर' को सुनना न भूलें.

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