किन्नर बने काँवड़िए..

  • 5 अगस्त 2013

हरिद्वार से दिल्ली आने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 58 पर लगभग दस किन्नरों का एक दल आगे बढ़ा चला जा रहा था.

दोपहर के तीन बजे के आस-पास सूरज ठीक सिर के ऊपर चमक रहा था.

कंधे पर भारी काँवड़ उठाए, तेज़ी से आगे बढ़ते हुए, पसीने से तर-बतर इन किन्नरों को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि आस-पास उन्हें देख रहे लोग छेड़ रहे हैं.

दिल्ली के पल्लीपार यानी यमुना पार रहने वाली 32 साल की रजनी भी इसी किन्नरों के झुंड का हिस्सा हैं.

पिछले तीन दिनों से उनका समूह लगातार चल रहा है. सिर्फ रात को ही रुकता है, जब पैरों की टूटन उन्हें आगे बढ़ने से रोक देती है.

रजनी बताती हैं कि पिछले दस साल से वो हर साल काँवड़ ले जा रही हैं.

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भगवान सबके

इस सवाल पर कि आप काँवड़ क्यों उठाती हैं, रजनी बिना रुके तेज़ तर्रार जवाब देती हैं, “क्यों हम क्यों नहीं उठा सकते. हम किन्नरों के क्या भगवान नहीं होते, समाज में भगवान का ठेका भी बाकी लोगों ने ले रखा है.”

तो इस बार क्या मन्नत मांगी है, रजनी कहती हैं, “इस बार उत्तराखंड में जो इतने लोग मरे हैं, बर्बादी हुई है, तो उन सबकी शांति के लिए.इसके अलावा माता-पिता हमेशा अच्छे रहें, उन्हें कभी किसी बात की कोई दिक्कत ना हो.”

रजनी आगे कहती हैं कि किन्नर साल के 11 महींने 20 दिन ऊधम मचाते हैं, लेकिन साल के दस दिन शांत रह कर सबकी शांति के लिए कामना करते हैं.

रजनी के परिवार में उनके माता-पिता है, चाचा-चाची, बच्चों समेत परिवार में करीब दस लोग शामिल हैं.

रजनी कहती हैं कि मेरे माता-पिता मुझे बेटा बुलाते हैं क्योंकि मैं पैदा तो लड़का ही हुई थी.

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मुश्किल सफर

किन्नर बताते हैं कि काँवड़ लेकर चलना इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि लोग उन्हें छेड़ते हैं, तरह-तरह की बातें बोलते हैं, लेकिन इस पर भी उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता.

रजनी फिर से सवाल पूछतीं हैं, “क्या हम आम लोग नहीं हैं, दूसरे लोगों की तरह हमारा भी अलग समाज हैं, तो फिर लोगों को दिक्कत किस बात की है?”

काँवडि़ए इतना ज़्यादा गुस्से में क्यों चलते है, छोटी सी बात पर भिड़ जाते हैं, तोड़-फोड़ करते हैं.

रजनी कहती हैं कि वो लोग सही मायनों में भोले के भक्त नहीं हैं जो दंगा करते हैं, आम जनता को परेशान करते हैं.

लेकिन लोग तो जबरन पैसा वसूलने, दूसरों को परेशान करने का आरोप तो किन्नरों पर लगाते हैं,

रजनी कहती हैं, “हमें तो सिर्फ़ बदनाम किया जाता है. हमारी ज़िंदगी ही आप लोगों से चलती है. लेकिन हमें रोज़ छेड़ा जाता है, लोग हमसे अजीब सा बर्ताव करते हैं, तो एक आध बार हम भी जवाब दे देते हैं, वो करें तो सब ठीक लेकिन हम करें तो गलत. ये भला कौन सी बात हुई”

हम किन्नरों से कुछ और सवाल पूछना चाहते थे, लेकिन उन्होंने हमसे कहा कि वो ज़रा जल्दी में हैं क्योंकि सोमवार सुबह होने तक उन्हें दिल्ली पहुंच कर शिव जी को गंगा जल चढ़ाना है. इसलिए विदा...

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