जिसने लौटाए घूस के 99,000 रुपए

आदिवासियों को मिले रिश्वत के पैसे वापस

सरकारी अफ़सरों के रिश्वत लेने के किस्से तो आपने कई बार सुने होंगे लेकिन 'रिश्वत' वापस करने का एक अनोखा मामला छत्तीसगढ़ में सामने आया है.

राज्य के कबीरधाम ज़िले में वन अधिकार कानून के तहत पट्टा दिलाने के नाम पर एक डिप्टी रेंजर ने कथित तौर पर बैगा आदिवासियों से 99,000 रुपए लिए थे. पट्टा न मिलने के बाद आदिवासियों ने अपनी शिकायतें मोबाइल फोन पर चलने वाले सामुदायिक रेडियो सीजीनेट स्वर पर अपलोड करवा दीं, जहां लोग अपने मोबाइल फोन से अपनी भाषा मे अपनी खबरें रिकॉर्ड करते हैं.

आदिवासी की शिकायत सुनने के लिए क्लिक करें

इस वेबसाइट को छत्तीसगढ़ में काफी अधिकारी लोग भी सुनते हैं. इस तरह ये शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुँची. इस पर अधिकारी ने गांव आकर सभी के पैसे वापस कर दिए और माफ़ी भी मांगी. (पढ़िए)

इस मामले की विभागीय जांच कर रहे वन विभाग के एसडीओ आरके तिवारी ने बीबीसी को बताया कि डिप्टी रेंजर त्रिलोकी लहरे ने रिश्वत लेने की बात स्वीकार की और सभी गांव वालों के पैसे वापस देने का वादा किया.

जाना पड़ा हाईकोर्ट

आदिवासी जन-वन अधिकार मंच, छत्तीसगढ़ में सचिव सामाजिक कार्यकर्ता नरेश बुनकर ने भी बैगा आदिवासियों का मामला अधिकारियों तक पहुंचाने में मदद की. (पढ़िए)

नरेश बुनकर की मोबाइल रिकॉर्डिंग सुनिए

वह बताते हैं कि 33 बैगा आदिवासियों ने वर्ष 2010 में वन अधिकार कानून के तहत वन क्षेत्र में भूमि के पट्टे के लिए आवेदन किया था. ग्राम सभा ने इनके पक्ष में वर्ष 2011 में प्रस्ताव पारित कर दिया.

पैसे वापस मिलने पर लोगों की प्रतिक्रिया

लेकिन डिप्टी रेंजर त्रिलोकी लहरे ने आवंटन के एवज़ में आदिवासियों से तीन-तीन हज़ार रुपए मांगे. ऐसा न किए जाने पर उन्होंने आवेदन पत्र जला देने की धमकी दी.

मार्च 2012 में आदिवासियों ने डिप्टी रेंजर को तीन हज़ार रुपए हिसाब से 99 हज़ार रुपए दे दिए.

करीब एक वर्ष तक आवंटन का इंतज़ार करने के बाद आदिवासियों ने मार्च, 2013 में हाईकोर्ट गए और आवंटन के लिए आवेदन कर दिया.

हाई कोर्ट ने इसी वर्ष 16 जून को आदिवासियों के हक में फ़ैसला करते हुए सभी को छह हफ़्ते के अंदर ज़मीन के पट्टे देने का आदेश दिया.

इसके बाद 24 जुलाई को वन विभाग ने पट्टों का आवंटन किया लेकिन आठ लोगों को ही भूमि के पट्टे दिए गए, बाकी को अपात्र घोषित कर दिया गया.

हो सकती है कार्रवाई

नरेश बुनकर के अनुसार कोर्ट के आदेश पर छह हफ़्ते के अंदर पालन नहीं किया जाता तो आदिवासी अदालत की अवमानना की याचिका दायर कर सकते हैं. आदिवासियों के स्वर पर शिकायत करने के बाद जांच शुरू हुई.

इस मामले की विभागीय जांच वन विभाग के एसडीओ आरके तिवारी को सौंपी गई. उन्होंने सभी गांववालों के बयान लिए. सभी ने डिप्टी रेंजर को तीन-तीन हज़ार रुपए देने की बात स्वीकारी.

तिवारी ने बीबीसी को बताया कि डिप्टी रेंजर त्रिलोकी लहरे ने रिश्वत लेने की बात स्वीकार की और सभी गांववालों के पैसे वापस देने का वादा किया.

नरेश बुनकर के अनुसार 6 अगस्त को डिप्टी रेंजर ने सभी गांववालों के पैसे वापस कर दिए. हालांकि एसडीओ अभी पैसे वापस करने की पुष्टि नहीं कर रहे हैं.

लेकिन उन्होंने कहा कि इस अगर आदिवासियों के पैसे वापस कर दिए जाते हैं तो भी डिप्टी रेंजर के ख़िलाफ़ रिश्वत लेने की जांच की जाएगी और दोषी पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाएगी.

सीजीनेट स्वर की भूमिका के बारे में उसके संस्थापक शुभ्रांशु चौधरी का कहना है, ''सीजीनेट स्वर जैसे प्रयोग में हम ग्रामीण और शहरी एक्टिविस्ट के बीच टूटा हुआ लिंक कायम करने की कोशिश में हैं. नरेश बुनकर जैसे ग्रामीण एक्टिविस्ट दूरदराज़ के इलाक़ों के हालात के बारे में स्वर के ज़रिए अपनी बात रिकॉर्ड करते हैं. शहरी एक्टिविस्ट उसे अधिकारियों के पास ले जाते हैं, जो लोगों की समस्याएं हल कर सकते हैं. इसी तरह हम समाज में आशा का संचार कर सकते हैं, जहां लोग लगातार हताश होकर हिंसा की और मुड़ रहे हैं.''

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