क्या पप्पू यादव पास हो पाएँगे?

  • 9 अगस्त 2013
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भारी बदन वाले, लंबे-तगड़े पप्पू यादव बिहार की राजनीति में अपने कई विरोधियों पर भारी पड़ते थे - कुछ अपनी क़द-काठी के कारण मगर ज़्यादा अपनी आपराधिक छवि की वजह से.

अब वही पप्पू यादव, जो एक हत्या के सिलसिले में कुछ साल की जेल भी काट चुके हैं, अब अपनी आपराधिक छवि बदलना चाहते हैं. और इसके लिए उन्होंने क़लम का सहारा लिया है.

अब कुछ ही हफ़्तों में आप मिलेंगे दबंग पप्पू यादव से नहीं बल्कि एक "लेखक" पप्पू यादव से जो अपनी आत्मकथा के ज़रिए ख़ुद को "द्रोहकाल का पथिक" बताते हैं.

पप्पू यादव कभी राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव के बेहद क़रीब हुआ करते थे. उन्हीं के प्रसाद से पप्पू यादव मधेपुरा के सांसद भी रहे.

‘द्रोहकाल का पथिक’ पप्पू यादव की आत्मकथा का नाम है. मगर किताब के बाज़ार में आने से पहले ही पप्पू यादव को लेकर विवाद खड़ा हो गया है.

कुछ साहित्यकारों का आरोप है कि मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ की 28वीं सालगिरह का समारोह पप्पू यादव की तरफ से ‘प्रायोजित’ था और इसके लिए ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव ने बाक़ायदा उन्हें संपर्क किया था.

अहम बात यह है कि राजेंद्र यादव ने ही अपनी टीम के ज़रिए पप्पू यादव की आत्मकथा का संपादन कराया है और वो इस तथ्य की पर्दापोशी भी नहीं करते.

राजेंद्र यादव ने बीबीसी को बताया, "खाली आपराधिक छवि कहने से बात नहीं होती. पप्पू यादव का संघर्ष और लगन उस छवि से बाहर निकलने की कोशिश है. हमें यह देखना चाहिए."

उन्होंने कहा, ''पप्पू यादव को हर घटना का, उनके किरदारों का नाम और हुलिया याद है. उन्हें यह भी याद है कि किस मंच से उन्होंने क्या बोला. पप्पू यादव की जो छवि मीडिया में है वह हम भी जानते हैं और उन्होंने अपनी किताब इसी की सफ़ाई देने के लिए लिखी है, जिसमें वो काफी सफल रहे हैं.''

‘पैपिलॉन’ की याद दिलाती है यह कहानी'

राजेंद्र यादव पप्पू यादव की तुलना फ़्रांस के मशहूर अपराधी हैनरी शैरर से करते हैं, जिसने 1969 में पैपिलॉन नामक किताब लिखी थी.

''हैनरी शैरर एक अपराधी था. उस पर हत्या का मुक़दमा चला था. वो कहता था कि उसने कोई हत्या नहीं की. उसे फंसाकर फ़्रांस की सबसे भयंकर जेलों में डाला गया. उसने एलान किया था कि दुनिया की कोई जेल मुझे बांधकर नहीं रख सकती. उसने छह बार जेलों को तोड़ा. पानी में मीलों तैरकर वो निकला. वो साहस की, संकल्प की, दुर्धर्ष संघर्ष की कहानी है. जब उसकी आत्मकथा छपी, तो फ़्रांस में वह इतनी लोकप्रिय हो गई कि फ़्रांस सरकार ने तुरंत दो आदेश दिए. एक तो यह कि लड़कियां ऊंचा स्कर्ट नहीं पहनेंगी और युवक पैपिलॉन नहीं पढ़ेंगे.''

'हंस की संगोष्ठी ‘प्रायोजित'

Image caption लेखक राजेंद्र यादव के मुताबिक़ पप्पू यादव की कोशिश है कि उनकी छवि बदले और इसमें कुछ भी बुरा नहीं है.

मगर लेखक उदयप्रकाश राजेंद्र यादव से सहमत नहीं. उदयप्रकाश का मानना है, ''हंस की संगोष्ठी स्पॉन्सर्ड थी. अगर आप हंस के पिछले सात-आठ-दस सालों को पीछे जाकर देखें, तो उसने गंभीर सामाजिक मुद्दों को सेंसेशनल ढंग से उठाया है. उन्हें डिफ्यूज़ करके रख दिया है. चाहे वो स्त्री विमर्श हो, दलित विमर्श हो या मानवाधिकारों से जुड़े मामले हों.. हंस ने इस मामले को जैसे हैंडल किया, वो बहुत सारे संदेह पैदा करता है. उनका मक़सद रहा है कि वह चर्चा के केंद्र में रहें.''

उदयप्रकाश के मुताबिक़, ''इलीट इंटेलेक्चुअल्स, क्रिमिनल्स, कॉर्पोरेट और नेताओं में एक आपसी समझदारी बन रही है. उनमें साहस आया है. बस कांड के दौरान बहुत से नेताओं ने ऐसे बयान दे डाले थे जो उनके अंदर छिपी महिला विरोधी बातों को उजागर करते हैं.''

लेखक उदयप्रकाश का कहना है कि बस कांड के आरोपी की आत्मकथा भी कल बाज़ार में आ सकती है. इस ट्रैंड को रोका जाना चाहिए.

‘हंस’ का 28वां सालगिरह समारोह 31 जुलाई को दिल्ली में हुआ, जिसमें पप्पू यादव अतिथि थे. ‘हंस’ के कार्यक्रम को ‘प्रायोजित’ मानने से संपादक राजेंद्र यादव पूरी तरह इनकार करते हैं. ''यह पूरी तरह ग़लत है. मैंने जो खर्च हुआ था, उसी के पैसे लिए थे और बाक़ी अपने एक सहयोगी के पास रखवा दिए थे.''

पप्पू यादव की आत्मकथा को राजेंद्र यादव राजनीतिक लेखन मानते हैं. ''इसका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है. सारे मुख्यमंत्री अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तो वह साहित्य नहीं हो जाता.''

बबलू का ‘अधूरा ख़्वाब’, राणा की ‘जेल डायरी’

पप्पू यादव से पहले 2008 में कई संगीन अपराधों में आरोपी बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा ‘अधूरा ख़्वाब’ नई सदी प्रकाशन ने छापी थी. फिर 2012 में हार्पर कॉलिंस ने फूलन देवी की हत्या के आरोपी शेरसिंह राणा की ‘जेल डायरी- तिहाड़ से काबुल कंधार तक’ प्रकाशित की.

मगर पप्पू यादव, बबलू श्रीवास्तव और शेरसिंह राणा से अपनी तुलना से आहत हैं. वह कहते हैं, ''इन लोगों के साथ मेरी तुलना न करें. बबलू श्रीवास्तव का तो मैं नाम ही नहीं जानता कि कौन हैं. शेर सिंह राणा को जानता हूं, वह तिहाड़ में मेरे साथ थे. मेरे आयडियल हैं सुभाष चंद्र बोस, विवेकानंद और भगत सिंह, जिनसे मैं प्रेरणा लेता हूं. ऐसे लोगों को न मैं जानता हूं न जानना चाहता हूं जो जीते अपने लिए हैं और धन उगाही अपने लिए करते हैं. ऐसे लोग मेरी डिक्शनरी का हिस्सा नहीं हैं.''

अजित सरकार हत्याकांड को लेकर जेल में रहते हुए पप्पू यादव ने आत्मकथा पर काम किया.

पप्पू यादव ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ''बड़े-बड़े लोगों की मिलीभगत से विद्रोही पप्पू यादव बाहुबली यादव बन गया. मुझे लगा कि इसे सामने लाया जाना चाहिए. एक विद्रोही को बाहुबली बना देना और लगातार 12 साल तक जेल में रखना. इस वजह से हमने सोचा कि एक आत्मकथा लिखी जाए, ताकि लोग समझें कि एक किसान परिवार का बेटा जो क्रांति करना चाहता था, जिसके मन में शोषितों के लिए चिंगारी थी, उसे कैसे लोगों ने बर्बाद किया. यह उन लोगों के लिए भी है, जो संघर्ष कर रहे हैं और आगे भी जिन्हें सामाजिक न्याय के लिए 50 साल तक लड़ाई लड़नी है.''

पप्पू यादव की आत्मकथा में क्या होगा? बीबीसी से बातचीत में पप्पू यादव ने बताया कि इसमें उनके राजनीतिक जीवन और उनकी जेल यात्राओं की जानकारी पाठकों को मिलेगी.

मगर इसमें उस केस का ज़िक्र नहीं होगा, जिसकी वजह से उन्हें कई साल जेल में बिताने पड़े. अजित सरकार केस उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग का हिस्सा बनेगा, जिसे वह न्याय प्रक्रिया पर लिखना चाहते हैं. इसके लिए उनकी तैयारी चल रही है.

'पप्पू की क़लम से उन्हें देखेंगे पाठक'

Image caption लेखक उदयप्रकाश का कहना है कि जिस पत्रिका के नाम के साथ प्रेमचंद का नाम जुड़ा हो, उस 'हंस' पत्रिका का स्तर गिरता गया है.

पप्पू यादव की आत्मकथा छापने वाले प्रकाशन शिल्पायन के मालिक ललित शर्मा के मुताबिक ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव ने ही उन्हें किताब के बारे में बताया था. इसके बाद उन्होंने पांडुलिपि देखी और उन्हें लगा कि यह इतनी रोचक है कि इसे छापा जा सकता है.

''काफी रोचक प्रसंगों में लिखा है. उन्होंने पिता के दर्शन, बचपन के संघर्ष, अपनी युवावस्था में पत्नी से प्रेम आदि की परिस्थितियों और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत के बारे में काफी विस्तार से लिखा है. मुझे लगा कि यह किताब ऐसे व्यक्ति के बारे में है, जिसे अब तक हम मीडिया के मार्फ़त देखते रहे हैं. इस बार पाठकों को खुद उनकी क़लम के ज़रिए देखने को मिलेगा.''

ललित शर्मा के मुताबिक़ उन्हें नहीं लगा कि इस किताब के ज़रिए समाज को कोई ग़लत संदेश जा रहा है. उनका काम एक प्रकाशक का दायित्व निभाना है और वह वही कर रहे हैं. ललित शर्मा को पप्पू यादव की आत्मकथा की पांडुलिपि सात-आठ महीने पहले मिली थी.

‘अधूरा ख़्वाब’ बेहद रोचक थी'

बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा ‘अधूरा ख़्वाब’ प्रकाशित करने वाले नई सदी प्रकाशन के मालिक सतीश वर्मा से बीबीसी ने सवाल किया कि आख़िर एक अपराधी प्रवृत्ति के लेखक को मंच देने के पीछे उनकी मंशा क्या थी? सतीश वर्मा का कहना था कि विदेशों में भी ऐसे लेखन को चाव से पढ़ा जाता है.

''बबलू श्रीवास्तव की क़लम से निकली बातें इतनी रोचक थीं कि शायद ही उन्हें कोई न पढ़ना चाहे. कोई भी आदमी, जुर्म करने वाला इतनी बेबाकी से नहीं लिखता कि क्या मोडस ऑपरेंडी है और उसे कैसे किया गया. हमें लगा कि शायद यह अपराधों पर रोक के लिए अच्छी चीज़ होगी. आम आदमी को इससे बचने का मौका मिलता है. आप उसे समझ सकते हैं कि उससे बचा जा सकता है.''

सतीश वर्मा के मुताबिक़ आज भी बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा ख़ूब बिकती है. उन पर बॉलीवुड में एक फ़िल्म बनाने की योजना भी है. हो सकता है कि कल पप्पू यादव के जीवन पर भी कोई फ़िल्म बने.

सीबीआई की एक विशेष अदालत ने 2008 में सीपीएम नेता अजीत सरकार हत्याकांड में पप्पू यादव, राजन तिवारी और अनिल यादव को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पप्पू यादव ने पटना हाईकोर्ट में अपील की थी, जहां से उन्हें जनवरी 2008 में ज़मानत मिली थी.

सबूत न मिलने के कारण इस साल 21 मई को पप्पू यादव को बेउर जेल से रिहा कर दिया गया. सीपीएम विधायक अजित सरकार और पप्पू यादव के बीच किसानों के मुद्दे पर तीखे मतभेद थे. सरकार को 14 जून 1998 को पूर्णिया शहर में गोली मार दी गई थी.

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