तलवार की धार पर चलने को मजबूर यूपीए

भारतीय संसद
Image caption हालिया घटनाक्रम ने संसद सत्र के दौरान सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं

चार दिन की गहमा-गहमी के बाद संसद सोमवार तक के लिए स्थगित हो गई. पिछले सोमवार को आशा थी कि इस मॉनसून सत्र में कुछ कुछ संजीदा काम संभव होगा. पर चार दिन में सरकार केवल खाद्य सुरक्षा विधेयक पेश कर पाई.

दूसरी ओर राज्यसभा ने कंपनी कानून पास कर दिया. लोकसभा उसे पहले ही पास कर चुकी है.

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कॉरपोरेट गवर्नेंस को बेहतर और पारदर्शी बनाने के लिए इस विधेयक का पास होना शुभ समाचार है. लगभग 57 साल पुराने इस कानून में बदलाव की जरूरत लम्बे अर्से से महसूस की जा रही थी.

राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रगति और प्रशासनिक सुधार के लिए संसद के सामने पड़े दूसरे विधेयकों का निस्तारण भी इतना ही जरूरी है.

इस काम के लिए यूपीए को राजनीतिक समझदारी का परिचय देना होगा. और इतनी ही समझदारी पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने में दिखानी होगी. यह बेहद संवेदनशील मसला है. और इसमें जोखिम उठाने होंगे.

चार दिन की राजनीतिक गतिविधियाँ इस बात का संकेत दे रही हैं कि आर्थिक उदारीकरण की गाड़ी को गति देना और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को बेहतर बनाना तलवार की धार पर चलने के समान है.

दोनों में भारी राजनीतिक जोखिम हैं और दोनों का दक्षिण एशिया के आर्थिक-सामाजिक विकास के साथ गहरा रिश्ता है.

रिश्तों में फिसलन

विदेश नीति के संदर्भ में तीन दिन की गतिविधियाँ भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य बनाने के काम को धीमा कर गईं. सितंबर के तीसरे हफ्ते में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की भेंट को लेकर संशय पैदा हो गया है. सचिव स्तर की वार्ता भी फिलहाल शुरू नहीं होगी.

हालांकि प्रधानमंत्रियों की मुलाकात को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है, पर लगता है कि इस माहौल में इसका ज़िक्र करने का मतलब है, मुसीबत मोल लेना.

Image caption रक्षा मंत्री एके एंटनी के बयान पर खासा विवाद हुआ

बहरहाल रिश्तों को बेहतरी की राह पर लाने के लिए 14 अगस्त को संयुक्त रूप से शांति-समारोह मनाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है. पाकिस्तानी सूफी गायक सनम मारवी का दिल्ली में आयोजन भी अब नहीं हो पाएगा.

दोनों देशों के अंदर ऐसी प्रवृत्तियाँ और शक्तियाँ हैं जो रिश्तों को सामान्य बनाने से रोकती हैं. उसके वाजिब कारण भी हैं. पर यह काम ज़रूरी भी है और बेहद जटिल भी. राजनेताओं की व्यापक सहमति और भागीदारी के बगैर यह पूरा भी नहीं होगा.

पिछले तीन दिन के घटनाक्रम को पाकिस्तान में भी महसूस किया गया है. गुरुवार को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने एक आपात बैठक बुलाई और पाँच भारतीय सैनिकों की हत्या पर अफसोस जताया.

उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के नेताओं का फर्ज़ है कि स्थितियों को बिगड़ने से बचाएं और यह भी कि 'मैं मनमोहन सिंह से मिलना चाहता हूँ.' हमें याद करना चाहिए कि नवाज़ शरीफ़ के एक अखबारी इंटरव्यू के जवाब में अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर-यात्रा पर चल पड़े थे.

भारतीय जनता पार्टी पाकिस्तान के साथ बातचीत के दर-खिलाफ़ है. यह उसकी राजनीति है. और कांग्रेस के भीतर इस राह पर आगे बढ़ने का साहस नहीं है.

पर यह भी सच है कश्मीर के हालात कभी एकदम साफ़ नहीं हुए. कोई नहीं बता पा रहा है कि सीमा पर जो हुआ वह क्या और क्यों था. इस साल के शुरू से सीमा पर कोई न कोई घटना क्यों हो रही है.

भाजपा की राजनीतिक उपलब्धि

राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और रस्साकशी के साथ-साथ संसद राष्ट्रीय विमर्श और आमराय बनाने सबसे महत्वपूर्ण मंच भी है. राजनीतिक दृष्टि से इस सत्र का लाभ भाजपा ने उठाया. रक्षा मंत्री एके एंटनी के वक्तव्य में बदलाव भाजपा अपनी उपलब्धि मान सकती है.

Image caption गुरुवार को एंटनी के बयान के बाद सुषमा स्वराज ने कहा कि विपक्ष सरकार का समर्थन करता है

उधर राज्यसभा में हंगामा करने वाले सांसदों की सूची को लेकर पार्टी ने जो विरोध व्यक्त किया उसके बाद वह सूची वापस ले ली गई. इस सूची में 22 नाम थे, जिनमें 20 सदस्य भाजपा के थे. कांग्रेस का कोई नाम नहीं था. भाजपा के विरोध के बाद अंततः यह सूची वापस हुई.

एंटनी के वक्तव्य पर गफलत के बाद सरकार को तुरत बात समझ में आई कि इसका रुख मोड़ना होगा. इसीलिए गुरुवार को संसद की बैठक शुरू होने के पहले अनौपचारिक रूप से यह बात हवा में थी कि रक्षा मंत्री नया वक्तव्य देंगे.

अलबत्ता इसे किसी ने साफ नहीं किया कि यह ‘इरर ऑफ जजमेंट’ किस स्तर पर हुआ था.

'धन्यवाद एंटनी साहब'

बुधवार को लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के तेवर काफी तीखे थे. वे चाहती थीं कि रक्षा मंत्री अपने वक्तव्य के लिए माफी माँगें, पर एंटनी को माफी नहीं माँगनी पड़ी. बल्कि सुषमा स्वराज ने उन्हें धन्यवाद दिया.

घटनास्थल का दौरा करके लौटे सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह से इस मामले में मिले ब्योरे के बाद लोकसभा और राज्यसभा में कहा, "अब यह साफ है कि पाकिस्तान का विशेष फौजी दस्ता इस हमले में शामिल था."

Image caption जम्मू में हमले में पांच सैनिकों की मौत के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते खटास का शिकार हो गए हैं

उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तानी सेना के समर्थन, सहायता और सुविधाएं मुहैया कराए बिना और अक्सर उसकी सीधी भागीदारी के बिना कुछ नहीं होता.

सुषमा स्वराज ऐसा ही वक्तव्य चाहती थीं उन्होंने रक्षा मंत्री के बयान का स्वागत किया और कहा कि यह बयान अब पाकिस्तान के लिए जवाब है.

एंटनी ने 6 अगस्त को राज्यसभा में इस घटना के बारे में कहा था कि भारी हथियारों से लैस 20 आतंकवादियों ने, जिनमें से कुछ पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने हुए थे, हमला किया.

अपने पिछले वक्तव्य के सिलसिले में उन्होंने कहा,"जब मैंने इस घटना के बारे में सदन को सूचित किया, उसका आधार उस समय तक प्राप्त तथ्य थे."

'संयम को हल्के में न लें'

गुरुवार के बयान में रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि "स्वाभाविक रूप से इस घटना से नियंत्रण रेखा पर हमारे व्यवहार और पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा. हमारे संयम को हल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए और न सशस्त्र सेनाओं की क्षमता और नियंत्रण रेखा की गरिमा बनाए रखने के सरकार के संकल्प पर कभी संदेह किया जाना चाहिए."

इस त्रासदी और इस साल के शुरू में दो सैनिकों की निर्मम हत्या के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान में बैठे लोगों को सज़ा मिलनी ही चाहिए.

पाकिस्तान को आतंकवादी नेटवर्कों, संगठनों और ढांचे को ध्वस्त करने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए और नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए.

शोर का दोषी कौन?

Image caption प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार विपक्ष के वारों का सामना कर रही है

भारतीय जनता पार्टी का रुख इस सत्र के शुरू में यह था कि "सरकार को यह कहने का मौका नहीं मिलना चाहिए कि हमने संसद नहीं चलने दी."

पार्टी का यह भी कहना था कि सदन को चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. पर चारों दिन शोरगुल हुआ, जिसकी शुरुआत आंध्र के सांसदों ने की.

गुरुवार को राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होते ही सीमांध्र सांसदों ने शोर किया और उसके बाद बहिर्गमन किया. लोकसभा में भी आंध्र के सांसदों ने शोर किया.

इस पर लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "यह मैं क्या देख रहा हूँ." दरअसल शोर मचाने वाले आंध्र के अधिकतर सांसद कांग्रेस से ताल्लुक रखते हैं. आडवाणी इस बात को रेखांकित करना चाहते थे कि सत्तारूढ़ दल को अपने गिरेबान में भी झाँकना चाहिए.

बहरहाल संसद के पास अभी काफी समय है. राजनीतिक विरोध के मौके इस दौरान लगातार बने रहेंगे, पर विधायी कार्य भी होने चाहिए. खासतौर से वे काम जिन पर आम सहमति है.

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