ईद भी कुछ चेहरों पर नहीं लाती मुस्कान

  • 9 अगस्त 2013
Image caption अरशी के पति सात साल से बिस्तर पर पड़े हैं.

आज दुनिया में धूमधाम से ईद मानाई जा रही है. हर कोई एक-दुसरे को ईद की मुबारकबाद दे रहा है, लेकिन खुशी और मोहब्बत के इस माहौल में हज़ारों ऐसे परिवार हैं जो आज भी मुस्कुरा नहीं पा रहे हैं.

गरीबी और महंगाई की मार झेल रहे इन परिवारों के लिए ईद खुशी और मोहब्बत बांटने की बजाय परेशानी का दिन है.

पढ़िए दिल्ली की जामा मस्जिद इलाके में रहने वाली एक मुस्लिम महिला अर्शी की ईद की कहानी.

सहरी के लिए परांठे और दूध

महंगाई और गरीबी के इस दौर में रमज़ान और ईद परिवार के लिए दुखों का सबब बन जाता है. परिवार की ज़रूरतों को पूरा करना एक चुनौती है.

महंगे फल नहीं खरीद पाने के कारण हम सहरी के लिए परांठे और थोड़े दूध से काम चलाते हैं.

दूध भी 40-50 रुपए लीटर आता है. ऐसे में कई बार केवल चाय पीकर ही हम काम चला लेते हैं. इफ़्तार के लिए भी हम कुछ ख़ास नहीं कर पाते हैं.

रमज़ान और ईद के समय जब भी वे आते हैं तो कुछ लेकर आते हैं ताकि कि मुझे परेशानी न हो. महंगाई के इस ज़माने में मेरे जैसे गरीब लोगों के लिए फल खरीदना बहुत ही मुश्किल है.

सात साल से बिस्तर पर हैं पति

सरकार भी ऐसे गरीब लोगों के लिए कुछ नहीं करती. सात साल से मेरे पति बिस्तर पर पड़े हैं, लेकिन आज तक उनका पेंशन नहीं बनी.

जब मेरे पति ठीक थे और कमाते थे तो हम पहले ही खरीददारी कर लेते थे. रमज़ान और ईद अच्छे से मनाते थे.

इस मौके पर कहीं चले जाते थे. पहले हम इफ्तार में फल और दूध लेते थे लेकिन अब सब कुछ बदल गया है. अब हर चीज बहुत सोच-समझकर खरीदनी पड़ती है.

खाने की ज़रूरतों को पूरा करने में ही इंसान परेशान है, आटे, चीनी, दूध लाने में ही इतने पैसे खर्च हो जाते हैं कि नए कपड़े खरीदने का सवाल ही पैदा नहीं होता.

16 साल पुराना बुर्का

Image caption बुर्का पहनने की शौकीन आरशी के पास है 16 साल पुराना एक बुर्का.

मुझे बुर्का पहनने का शौक है लेकिन मेरे पास केवल एक बुर्का है और वह भी 16 साल पुराना.

इंसान का मन तो नया चीज खरीदने का करता ही है लेकिन गरीब अपने मन का कहां सुन पाते हैं.

ईद के मौके पर हर इंसान की इच्छा नया कपड़ा पहनने की होती है, लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाते. सात साल पहले मेरे पति की आमदनी अच्छी नहीं थी.

वह तीन हजार रुपये कमाते थे, लेकिन हम इतने में परिवार का खर्च ठीक तरीके से चला लेते थे. अब चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोई वज़ह नहीं दिखती. हम इतने दुखद दिन देख चुके हैं कि अब मुस्कुराना शायद संभव नहीं हो.

( बीबीसी संवाददाता वर्तिका तोमर से बीतचीत पर आधारित)

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