वो शख्स जिसकी किताब 20 साल से बेस्टसेलर है

एक झुग्गी झोपड़ी से देश के बड़े अर्थशास्त्री तक नरेंद्र जाधव ने बहुत लंबा सफर तय किया है.

एक ज़माने में अछूत कहलाने का दंश झेलने वाले नरेंद्र जाधव की उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. अपने जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्ष को जब उन्होंने आत्मकथा की शक्ल दी तो उसने भी इतिहास रच दिया.

पिछले 20 साल से नरेंद्र जाधव की किताब 'आम्ही आणि आमचा बाप' (हम और हमारे पिता) बेस्ट सेलर बनी हुई है.

161 संस्करण

बीते 20 सालों में इस किताब के 161 संस्करण निकल चुके हैं. इसकी करीब छह लाख से ज़्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं.

अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, कोरियन और थाई समेत करीब 20 भाषाओं में पुस्तक का अनुवाद हो चुका है. हिंदी में नरेंद्र जाधव के संघर्ष की कहानी 'असीम है आसमां' के नाम से प्रकाशित हुई है.

नरेंद्र जाधव का कहना है, “इस किताब से मुझे आज भी रॉयल्टी मिलती है, लेकिन ये पुस्तक मैंने अपने पिता और उनके जैसे हज़ारों दलितों की जुझारू प्रवृत्ति दर्शाने के लिए लिखी थी. इसलिए दो करोड़ रुपये की रॉयल्टी भी मैं नहीं लेता हूं बल्कि इसे सामाजिक संस्थाओं के लिए दान कर देता हूं.”

इस किताब के पंजाबी संस्करण को साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है.

'झुग्गी से रिज़र्व बैंक तक'

डॉ. जाधव का जन्म मुंबई के वडाला की एक झुग्गी में हुआ था. उनके पिता दामुरुदा जाधव रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे.

उन्होंने अपने चारों बेटों को पढ़ाने के लिए पूरी ज़िंदगी संघर्ष किया. उनके संघर्ष का ही नतीजा है कि उनके चारों बेटे विभिन्न सरकारी महकमों में बड़े अधिकारी हैं.

जाधव बताते हैं, “हम चारों भाई सरकारी अधिकारी बने. अगर हम कॉरपोरेट क्षेत्र में जाते तो काफी सारा पैसा कमा सकते थे. लेकिन हमने ऐसा नहीं किया, क्योंकि हम अपने पिता की मानसिकता से प्रभावित थे और हमारे पिता बाबा साहेब से.”

अपनी आत्मकथा की भूमिका में डॉ. जाधव ने कहा है, “यह कहानी उस परिवार की है, जिसकी अस्मिता डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर के कारण जागृत हुई. हमें हमारे माता-पिता ने जन्म दिया लेकिन उन्हें और हमें मनुष्य के तौर पर हक दिलाया बाबा साहेब ने. व्यापक अर्थ में वे हम सबके बाप हैं.”

Image caption नरेंद्र जाधव डॉ. अंबेडकर को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं

पुस्तक के पहले संस्करण में डॉ. जाधव ने अपनी मां की भूमिका में बारे में ज़्यादा कुछ नहीं लिखा था, जिसे लेकर सवाल भी पूछे गए. इसके बाद उन्होंने अपनी मां सोनुबाई पर एक अध्याय पुस्तक में शामिल किया.

छात्र जीवन में कमाल

28 मई, 1953 को मुंबई में जन्मे नरेंद्र जाधव ने मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया. इसके बाद 'राष्ट्रीय विद्वान' के तौर पर चुने जाने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए 1981 में अमरीका गए.

1983 में उन्हें इंडियाना यूनिवर्सिटी के सबसे बेहतरीन छात्र का अवॉर्ड मिला. तीन साल बाद उन्होंने 4.00 में से 3.93 का रिकॉर्ड ग्रेड अंक हासिल करते हुए पीएचडी की उपाधि हासिल की.

अमरीका में उन्हें उस वक्त शानदार नौकरी मिल सकती थी, लेकिन वे भारत लौट आए. 31 साल तक रिज़र्व बैंक के साथ काम किया.

2008 में उन्होंने रिज़र्व बैंक से स्वेच्छा से अवकाश लिया तो 'बैंक ऑफ़ इथियोपिया' से जुड़ गए. इसके बाद 'बैंक ऑफ़ अफगानिस्तान' के साथ काम किया.

इस दौरान उन्हें पुणे विश्वविद्यालय से जुड़ने का मौका मिला. जाधव बताते हैं, “मुझे अफगानिस्तान में सवा करोड़ रुपए सालाना का वेतन मिल रहा था जबकि पुणे में साढ़े छह लाख रुपये वेतन मिलना था. लेकिन मैं आ गया क्योंकि किसी दलित का पुणे विश्वविद्यालय में कुलपति होना क्रांति से कम नहीं था.”

पुणे विश्वविद्यालय में दो साल का उनका कार्यकाल मिले-जुले अनुभव वाला रहा. हालांकि इस दौरान वे इस विश्वविद्यालय की शाखा को दुबई तक ले जाने में कामयाब हुए.

चुनाव लड़ने का इरादा

नरेंद्र जाधव के पूरे सफर में उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे ऊंची जातियों से समझौता कर लेते हैं.

इस आरोप के जवाब में जाधव कहते हैं, “बाबा साहेब ने कहा था कि शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो. मैं उसी सीख का पालन कर रहा हूं. संघर्ष करना शिक्षा और ज्ञान से ही संभव है. अगर हम अपनी बुद्धिमता साबित करें तो जाति कभी आड़े नहीं आती.”

फिलहाल योजना आयोग और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य जाधव अब लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “अगले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से सकारात्मक संदेश मिला है, दो चुनाव क्षेत्रों पर बात चल रही है, देखते हैं आगे क्या होता है.”

दूसरी ओर उनकी आत्मकथा पर एक फ़िल्म और टीवी सीरियल भी बन रहा है. कहा जा रहा है कि उनके जीवन पर बनने वाली फ़िल्म में मुख्य किरदार नाना पाटेकर निभाएंगे.

जाधव अब भी रुकना नहीं चाहते. वे मानते हैं कि महत्वाकांक्षा की कोई सीमा नहीं होती. जाधव कहते हैं, “जिन परिस्थितियों में मैं पला-बढ़ा, उनमें ज़िंदा रहना भी एक सपना था. आज इस स्थान पर हूं. हो सकता है, कल मैं मंत्री बनूं और क्या पता राष्ट्रपति भी बन सकता हूं.”

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