झनको बाई के बच्चे की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

आदिवासी महिला झनको अपने परिवार के साथ

एक गर्भवती महिला, जिसका प्रसव कभी भी हो सकता है, उसे अगर सात अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ें तो राज्य के स्वास्थ्य विभाग पर सवाल उठना लाज़मी है.

उस पर अगर ये घटना मुख्यमंत्री के गृह ज़िले की हो तो ये साफ़ हो जाता है कि सरकारी अस्पतालों की हालत कितनी खस्ता है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िले कबीरधाम में सरकारी डॉक्टरों की कथित लापरवाही के कारण एक बैगा आदिवासी महिला के बच्चे की गर्भ में ही मौत हो गई.

झनको बाई नाम की ये महिला कबीरधाम ज़िले के जंगलों में बसे धुरसी गांव में रहती हैं.

कैसे बचेंगे बैगा?

Image caption आरोप है कि बिलासपुर के छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट के डॉक्टर झनको के प्रसव के लिए तैयार नहीं हुए.

एक ओर सरकार बैगा आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ाने के लिए तमाम उपाय कर रही है.

लेकिन झनको बाई के साथ जो कुछ हुआ, उससे पता चलता है कि सरकारी योजनाओं और वादों के बावजूद अभी इन लोगों के लिए बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं कराई गई हैं.

झनको बाई 4 अगस्त को अपने पति रामादीन बैगा के साथ गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके रूखनी दादर उपस्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं.

उपस्वास्थ्य केंद्र में कोई डॉक्टर न होने से वो निराश होकर लौट गईं.

इसके बाद झनको बाई पाँच अगस्त को 40 किलोमीटर का सफ़र बस से तय करके पंडरिया के उपस्वास्थ्य केंद्र में पहुंचीं.

पंडरिया में सरकारी डॉक्टर ने प्रशिक्षित सर्जन नहीं होने का हवाला देते हुये उन्हें कबीरधाम के ज़िला मुख्यालय कवर्धा के सरकारी अस्पताल भेज दिया.

कवर्धा के इस सरकारी अस्पताल में भी डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. तब तक झनको बाई की हालत बिगड़ चुकी थी और उनके शरीर से बच्चे का हाथ बाहर आ गया था.

लेकिन इसी हालत में झनको बाई को 110 किलोमीटर दूर बिलासपुर के छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट भेज दिया गया.

झनको बाई छह अगस्त को बिलासपुर के छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट पहुंचीं, लेकिन यहां भी उनके प्रसव के लिए डॉक्टर तैयार नहीं हुए.

थक हार कर 7 अगस्त की सुबह उसी हालत में झनको बाई और उनके पति रामादीन बस से अपने गांव लौट आए.

निजी अस्पताल का सहारा

झनको बाई विकासखंड मुख्यालय पंडरिया के सरकारी अस्पताल में पहुंचीं, लेकिन यहां से उन्हें फिर ज़िला अस्पताल कवर्धा जाने को कहा गया.

कवर्धा के ज़िला अस्पताल ने तो झनको बाई को भर्ती करने से ही इनकार कर दिया.

आख़िरकार मामला ज़िला कलेक्टर तक पहुंचा, जिनके कहने पर झनको बाई को कवर्धा के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया.

इस निजी अस्पताल में बिना सर्जरी के ही झनको का प्रसव हुआ लेकिन तब तक बच्चे की मौत हो चुकी थी.

कवर्धा के इस निजी अस्पताल के डॉक्टर केपी जांगड़े बताते हैं, “जब झनको बाई को मेरे अस्पताल में लाया गया तो उनके शरीर से बच्चे का हाथ बाहर निकला हुआ था. मुझे लगता है कि समय पर प्रसव हुआ होता तो ये नौबत नहीं आती.”

हालांकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का कहना है कि सरकार के हस्तक्षेप के बाद झनको बाई का प्रसव निजी अस्पताल में हो सका और उनकी जान बच गई.

Image caption छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का कहना है कि वो दोषियों के ख़िलाफ कार्रवाई करेंगे.

अमर अग्रवाल का दावा है कि इस मामले में रिपोर्ट मांगी गई है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी.

झनको बाई के पति रामादिन कहते हैं, “अब किसी बात का क्या मतलब. मेरे बच्चे को तो कोई वापस लौटा नहीं सकता. लेकिन अगर मेरी पत्नी को दवा-दारू सही समय पर मिल गई होती तो मेरा बच्चा पेट में नहीं मरता.”

अस्पताल दर अस्पताल

झनको बाई के गांव धुरसी के पड़ोसी उपस्वास्थ्य केंद्र पर कोई डॉक्टर नहीं है.

पंडरिया के विकासखंड अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी पीएल कुर्रे कहते हैं, “झनको बाई जब हमारे अस्पताल में पहुंची तो उनका हीमोग्लोबिन का स्तर 3-4 के आस-पास था. हमारे यहां कोई महिला चिकित्सक नहीं है, इसलिए हमें उन्हें ज़िला अस्पताल रेफर करना पड़ा.”

कबीरधाम ज़िला अस्पताल के सिविल सर्जन आरके भुवार्थ का कहना है, “जब तक झनको ज़िला अस्पताल पहुंचीं, तब तक बच्चे का हाथ शरीर से बाहर आ गया था. हमें लगा कि महिला का ऑपरेशन करना पड़ेगा. हमारे पास ऐसे प्रशिक्षित डाक्टर नहीं थे, जो इतने कम हीमोग्लोबिन के बाद ऑपरेशन कर सकें. इसलिए हमें उन्हें छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट रेफर करना पड़ा.”

छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट, बिलासपुर के स्त्री रोग विभाग की अध्यक्ष डॉक्टर मीना आर्मो ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि छत्तीसगढ़ मेडिकल इंस्टीट्यूट में अलग-अलग दिन अलग-अलग डॉक्टरों की ड्यूटी होती है. ऐसे में ये बता पाना मुश्किल है कि महिला के साथ क्या हुआ होगा.

यह बताने पर कि उस वक्त उनकी ही ड्यूटी थी, डॉक्टर आर्मो ने कहा “मैं खुद आदिवासी हूं, ऐसे में मैं किसी दूसरी आदिवासी महिला के साथ ऐसा कैसे कर सकती हूं. हो सकता है, महिला खुद अस्पताल से चली गई हो.”

वहीं छत्तीसगढ़ बैगा महापंचायत की संयोजक रश्मि इसे सीधे-सीधे हत्या का मामला बताती हैं.

रश्मि का कहना है, “सरकार को ज़िम्मेदारी तय करनी पड़ेगी कि आख़िर झनको के बच्चे की मौत का ज़िम्मेदार कौन है. दोषियों के ख़िलाफ तो हत्या का मामला चलना चाहिए.”

और इस सब के बाद झनको बाई का क्या हाल है?

हीमोग्लोबिन में गिरावट और गर्भाशय के संक्रमण की आशंका के बावजूद झनको बाई बच्चे की मौत के बाद उसी दिन अपने गांव लौट आईं.

अब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने आदेश दिया है कि झनको बाई की पूरी जांच और इलाज हो.

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