नौसेना के लिए नई दुश्वारियां पैदा हो सकती हैं

  • 15 अगस्त 2013

मुंबई पोतगाह में भारतीय नौसेना की पनडुब्बी में बुधवार को हुआ धमाका नौसेना की सामरिक तैयारियों के लिए बड़ी बाधा साबित होगा.

रक्षा मंत्रालय के अनुसार आईएनएस 'सिंधुरक्षक' में भयानक विस्फोट हुआ. डीज़ल और इलेक्ट्रिक से चलने वाली रूसी 977 ‘किलो’ वर्ग की इस पनडुब्बी में विस्फोट के समय कई अधिकारियों सहित कम से कम 18 नौसैनिक फंसे हुए थे.

भारतीय नौसेना ने इस घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं.

एक दिन पहले ही भारत ने अपना पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत लॉंच किया था.

1997 में नौसेना में शामिल

‘सिंधुरक्षक‘ को साल 1997 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था. मास्को से साल 1986 से 2000 के बीच मंगाए गए 10 ‘किलो’ वर्ग के डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की कड़ी में यह सातवीं और अंतिम पनडुब्बी थी.

हाल ही में रूस में इसमें कई बदलाव किए गए थे और इसकी विशेषताओं और क्षमताओं में इज़ाफ़ा किया गया था.

आठ करोड़ अमरीकी डॉलर की लागत से इसमें मिसाइल सिस्टम को लगाया गया था जिससे 200 किलोमीटर की दूरी तक समुद्र और ज़मीन में हमला किया जा सकता था.

Image caption हाल ही में आईएनएस सिंधुरक्षक को रूस में उन्नत किया गया था. (फ़ोटो: रॉयटर्स)

इसमें और भी कई बदलाव किए गए थे जिसके कारण 25 साल पूरा कर चुकी इस पनडुब्बी का जीवन कम से कम 10 साल और बढ़ गया था.

वित्तीय संकट और तकनीकी समस्याएं

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार भारतीय नौसेना और रूसी अधिकारियों के लिए सिंधुरक्षक पनडुब्बी को दोबारा ठीक करना संभव नहीं होगा और इस कारण नौसेना की तैयारियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.

अनुमान है कि आठ रूसी 'किलो' वर्ग और चार जर्मन 1500 (एचडीडब्ल्यू209) बेड़ों सहित भारतीय नौसेना के मौजूदा 14 डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में से 2014-15 तक केवल नौ ही बचेंगीं.

परमाणु हथियार से लैस पनडुब्बियों की क्षमता में विस्तार की योजना के बावजूद नौसेना को पानी के भीतर अपनी ताक़त विकसित करने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है.

वित्तीय संकट और तकनीकी समस्याओं की वजह से मुंबई के मज़गांव डॉकयार्ड में 2012 और 2017 के बीच 4.2 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली छह फ्रांसीसी ‘स्कॉरपीन’ डीज़ल-इलेक्ट्रिक पेट्रोल पनडुब्बी योजना भी खटाई में पड़ गई है.

विलंब से चल रही है मरम्मत योजना

भारतीय नौसेना के अधिकारियों का कहना है कि पहली ‘स्कॉरपीन’ अब पूर्व निर्धारित तारीख़ से तीन साल बाद संभवतः 2015 के अंत में और छठी ‘स्कॉरपीन’ 2019-20 तक सौंपी जा सकेगी.

साल 2012-13 में भारत के 63 फ़ीसदी बेड़े रिटायर हो रहे हैं. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी हाल की रपट में भारतीय नौसेना को यह चेतावनी दी थी कि उसे पहले से ही कमज़ोर पड़ चुकी पनडुब्बी बेड़ों के साथ अपनी क्षमता के लगभग आधे से भी कम में काम चलाना पड़ सकता है.

कैग के अनुसार, पनडुब्बियों की मरम्मत का काम भी पीछे चल रहा है.

सामरिक जीवन लगभग ख़त्म

Image caption पनडुब्बी की सुरक्षा व्यवस्था को चाक चौबंद करने के लिए इसके ढांचे तथा दूसरे अनगिनत प्रणालियों को नए सिरे से तैयार किया गया.

यह देरी इसलिए हुई है क्योंकि ‘सिंधुघोष’(877 किलो वर्ग) की श्रेणी के बेड़ों को, जिसमें सिंधुरक्षक भी शामिल है, ठीक करने के लिए रूस भेजा जाना था.

कैग की रिपोर्ट कहती है, “नई पनडुब्बियों को बेड़े में शामिल करने की योजना में गंभीर चूक के कारण अब नौसेना के पास 50 फ़ीसदी से ज़्यादा ऐसी पनडुब्बियां हैं जो अपने सामरिक जीवन का दो-तिहाई हिस्सा गुज़ार चुकी हैं. इनमें से कई पनडुब्बियों का सामरिक जीवन लगभग ख़त्म हो चुका है.”

इस कमी को दूर करने के लिए नौसेना की योजना दो पनडुब्बियों को आयात करने और चार को स्थानीय रूप से विकसित करने की है लेकिन वो योजना भी लाल फ़ीताशाही की शिकार है.

जहां एक ओर नौसेना निजी शिपयार्ड में पनडुब्बी के निर्माण की योजना बना रही है वहीं दूसरी तरफ़ भारत का रक्षा मंत्रालय चाहता है कि तीन पनडुब्बियों को मुंबई स्थित मज़गांव डॉक्यार्ड में बनाया जाए और एक पनडुब्बी को विशाखापटनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड में बनाया जाए. हालाकि ये दोनों सरकारी संस्थाएं काम के बोझ से पहले से ही दबी हुई हैं.

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