प्याज़ : ना मोदी बोले ना मनमोहन ने कुछ कहा

Image caption प्याज़ की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं लेकिन नेताओं के भाषणों में इसका असर नहीं दिख रहा है.

प्याज़ की क़ीमतें भले ही आसमान छू रही हों लेकिन लगता है सत्ता के गलियारे में उसकी अब कोई क़ीमत नहीं रही. आम आदमी भले ही प्याज़ की बढ़ी हुई क़ीमत की तपिश झेल रहा है लेकिन नेताओं के भाषणों में अब उसकी कोई जगह नहीं है.

लाल क़िले की प्राचीर से दिए अपने भाषण में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश हित से जुड़े तमाम मुद्दों को छुआ लेकिन महंगाई के मुद्दे के क़रीब से भी नहीं गुज़रे. उन्होंने राष्ट्र निर्माण की बात की, सीमाओं की सुरक्षा करने का प्रण किया लेकिन प्याज़ जैसे ‘आम’ मसले से दूरी बनाए रखी.

कमोवेश ऐसा ही रहा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण. वो चाहते हैं कि उनकी छवि विकास पुरुष की हो लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने भाषण में उनका सारा ध्यान टिका रहा मनमोहन सिंह के भाषण की समीक्षा में, ये समझाने में कि किस तरह मनमोहन सिंह देश को प्रोत्साहित करने से चूक गए हैं.

लेकिन मोदी ख़ुद महंगाई का ज़िक्र करना भूल गए फिर सुलगते प्याज़ की बात तो भूल ही जाइए. ये तब जब गुजरात ख़ुद प्याज़ का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है.

एक समय था जब प्याज़ में इतनी ताक़त थी कि उसकी बढ़ी क़ीमतों ने सत्ता हिला कर रख दी थी. 1998 में दिल्ली की सत्ता में काबिज़ भाजपा महंगे प्याज की वजह से विधानसभा चुनाव हार गई थी और तब से सत्ता से बाहर है.

क़ीमतें आसमान पर

Image caption निर्यात मूल्य निर्धारित करके प्याज़ की क़ीमतें नियंत्रित करने की कोशिशें हो रही हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ जुलाई महीने में सरकार और रिज़र्व बैक रूपये की क़ीमत को लुढ़कने से बचाने की जुगत में लगे थे लेकिन प्याज़ की बढ़ती क़ीमतों ने मुद्रास्फीति को 5.79 फ़ीसदी पर पहुंचा दिया.

ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के खुदरा बाज़ारों में प्याज़ की क़ीमत 80 रूपये तक पहुंच गई है. विभिन्न थोक बाज़ारों में भी क़ीमतें 46 से 55 रूपये के बीच हैं.

भारत सरकार ने क़ीमतों पर लगाम लगाने के लिए प्याज़ के निर्यात न्यूनतम निर्यात मूल्य साढ़े छह सौ डॉलर निर्धारित कर दिया है जबकि मई महीने में निर्यात मूल्य निश्चित न करने का फ़ैसला किया गया था.

भारत ने अप्रैल-जुलाई तिमाही में 6.39 लाख टन प्याज़ का निर्यात किया जबकि पिछले वर्ष इसी तिमाही में निर्यात 6.94 लाख टन था.

खोखली आलोचना

स्वतंत्रता दिवस पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण इस बात का ताज़ा उदाहरण है कि विपक्ष और ख़ासकर भारतीय जनता पार्टी इस मसले पर सिर्फ़ ज़बानी जमाख़र्च करती है और वो भी संसद में हंगामा के रूप में.

हालांकि विपक्ष ने बढ़ी हुई क़ीमतों और अर्थव्यवस्था में आए धीमेपन का हवाला देते हुए अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की सरकार पर हमले किए हैं लेकिन ये मुद्दा सिर्फ़ आलोचना तक ही सीमित होकर रह गया है. इसका रचनात्मक इस्तेमाल करने में विपक्ष भी विफल रहा है.

भाजपा, सीपीआई-एम, सीपीआई, टीएमसी, टी़डीपी जैसी विपक्षी पार्टियां प्रशासनिक विफलता और सघन पूंजीवाद को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराती हैं. भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने 'नीतिगत लकवे' को आर्थिक मोर्च पर विफलता की वजह बताया है.लेकिन स्थिति ये है कि इस प्रमुख विपक्षी पार्टी ने महंगाई से निपटने का अपना कोई कार्यक्रम पेश किया हो ऐसा भी दिखाई नहीं देता.

प्याज़ भारतीय खाने की थाली का एक अहम हिस्सा है और उसमें राजनैतिक पार्टियों की आंखों में आंसू लाने की ताक़त है. इसे समझने के लिए सिर्फ़ 15 साल पहले दिल्ली की राजनैतिक परिस्थितियों की ओर मुड़कर देखने की ज़रूरत है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें)

संबंधित समाचार