दाभोलकर के क़त्ल पर पुणे में ग़म, गुस्सा

Image caption नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या से पुणे शहर के लोगों में काफी गुस्सा है.

पुणे शहर में इस वक्त बहुत गुस्सा है. एक ऐसे व्यक्ति के क़त्ल को लेकर, जो सवाल बहुत करता था.

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की मंगलवार को हुई हत्या एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस तरक़्क़ीपसंद और वैज्ञानिक सोच के ख़िलाफ एक कार्रवाई की तरह देखी जा रही है, जिसकी नुमाइंदगी वे करते थे.

वे महाराष्ट्र अंधविश्वास निर्मूलन समिति के मुखिया थे.

अभिनेता-निर्देशक अमोल पालेकर ने कहा, "प्रगतिशील आंदोलन का एक व्यक्ति हमारे बीच से चला गया. इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है. इस दुख के आगे सभी शब्द चुप हो जाते है."

आज पुणे बंद का आह्वान किया गया है और पुलिस वारदात के 24 घंटे बाद भी हत्यारे के बारे में कोई ठोस सुराग नहीं हासिल कर पाई है. आरोपी का स्केच जारी करने और सुराग पर एक लाख रुपये का इनाम ऐलान करने के बाद भी.

डॉ. दाभोलकर पर मंगलवार सुबह सात बजकर बीस मिनट पर दो बंदूकधारियों ने उस वक्त गोलियां चलाईं, जब वे अकेले टहल रहे थे. दो गोलियां सर के आरपार निकल गई और मौत मौक़े पर ही हो गई. वारदात की जगह के पास ही पुलिस की नाकाबंदी थी और इतनी सुबह कोई भीड़भाड़ भी नहीं थी.

पहले तो पुलिस डॉ दाभोलकर को पहचान ही नहीं सकी. मामला दर्ज होने के बाद उनकी जेब से मिले दो चेकों से डॉ. दाभोलकर की शिनाख्त हुई.

दाभोलकर के विरोधी कौन

Image caption सामाजिक कार्यकर्ता नरेन्द्र दाभोलकर की मंगलवार को अज्ञान लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी.

पुणे के पास सतारा के रहने वाले दाभोलकर सोम और मंगल को पुणे में रहते थे और अंधविश्वास निर्मूलन समिति से जुड़े साधना मीडिया सेंटर का काम देखा करते थे. पिछले 18 वर्षों से अंधविश्वास के खिलाफ़ कानून बनाने के लिए डॉ. दाभोलकर काफ़ी सक्रिय थे.

दाभोलकर की प्रमुख लड़ाई हिंदूवादी संगठन सनातन संस्था से थी, जिससे उनके अक्सर वाद-विवाद होते रहते थे. उन्हें धमकियां भी मिलती रही थी. पुलिस आयुक्त गुलाबराव पोल ने किसी भी संगठन का नाम नहीं लिया है. जिन संस्थाओं ने दाभोलकर की हत्या की निंदा की है, सनातन संस्था उसमें शामिल है.

सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक ने अपने बयान में कहा है, "नास्तिक और आस्तिक के बीच विवाद प्राचीन काल से चला आ रहा है. हमारा विरोध डॉ. दाभोलकर की नास्तिक विचारधारा से था. हमने उनका कभी भी व्यक्ति के रुप में विरोध नहीं किया."

अंधविश्वास निर्मूलन विधेयक के कारण डॉ. दाभोलकर और सतातन संस्था में अक्सर कहा-सुनी हुआ करती थी. सार्वजनिक गणेशोत्सव के दौरान गणपति मूर्तियां नदी के बजाय पानी की टंकियों में विसर्जित करने की उनकी वकालत का संस्था विरोध करती रही थी. पर्यावरण अनुकूल गणेशोत्सव विषय पर ही डॉ. दाभोलकर मंगलवार सुबह 11.30 बजे प्रेस से मिलने वाले थे.

2008 में महाभारत पर व्यंग्य करने वाले नाटक के विरोध में बम विस्फोट करने के आरोप में सनातन संस्था के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया था. राज्य सरकार ने भी इस संगठन पर पाबंदी लगाने की सिफ़ारिश केंद्रीय गृह मंत्रालय से की थी. जाति पंचायत के विरोध में भी डॉ. दाभोलकर काफ़ी सक्रिय थे. सोमवार रात को उनका आख़िरी कार्यक्रम सरकारी दूरदर्शन पर इसी विषय पर एक चर्चा का था जिसमें वे शामिल हुए. पुलिस इस हत्या के राजनीतिक कोण पर भी नजर रखे हुए है.

अंधविश्वास निर्मूलन समिति के कार्यकर्ताओं ने सीधे सनातन संस्था को निशाना बनाया है. राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता जितेंद्र आव्हाड ने सनातन संस्था जैसी सांप्रदायिक शक्तियों पर तुरंत कारवाई करने की मांग दोहराई.. वरिष्ठ नेत्री मेधा पाटकर ने कहा, कि राज्य सरकार अगर यह कानून बनाती तो शायद डॉ. दाभोलकर की जान न जाती. इस हत्या के लिए राज्य सरकार द्वारा की गई देरी ज़िम्मेदार है.

धमकी भरे फोन और दोस्तों का दुख

Image caption नरेन्द्र दाभोलकर समाज से अंधविश्वासों को ख़त्म करने के लिए के लिए काम कर रहे थे.

फिल्म अभिनेता और रंगकर्मी डॉ. श्रीराम लागू लंबे समय से डॉ. दाभोलकर के दोस्त भी हैं और अंधविश्वास के ख़िलाफ़ लड़ाई में साथी भी. उन्होंने बहुत दुख के साथ कहा, " नुक्सान पूरे महाराष्ट्र का हुआ है. वे लाखों में एक थे.वास्तविकता का आकलन, ईमानदारी, काम के लिए लगन जैसी बातों ने उन्हें विशिष्ट बनाया. डॉ. दाभोलकर के जाने की बात सुनकर मैं तो ख़त्म हो गया."

दाभोलकर के एक और साथी और अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर ने कहा, " महाराष्ट्र अराजकता की दहलीज़ पर खडा है. राज्य सरकार को चाहिए, कि कम से कम अब तो अंधविश्वास निर्मूलन विधेयक मंजूर करे. मुझे इतना दुख हुआ है, जितना मेरे पिता के गुज़रने पर भी नहीं हुआ. परिवर्तनवादी विचार की घुट्टी मैनें काफ़ी हद तक उन्हीं के हाथों से पी थी."

उनके भतीजे प्रसन्न दाभोलकर ने कहा, "डॉ. दाभोलकर को इससे पहले धमकी भरे फ़ोन आए. उन पर हमले भी हुए. लेकिन कभी सोचा न था, कि ऐसा भी कभी हो सकता है. उन्होंने पुलिस संरक्षण नहीं मांगा. यह तो कहा नहीं जा सकता, कि किस संगठन ने उन पर हमला करवाया, लेकिन उनके वैचारिक विरोधक या व्यक्तिगत दुश्मन भी इसके पीछे हो सकते है."

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