एक ब्रितानी की नज़र से भारत के छोटे शहर

मोतीहारी, बिहार
Image caption बिहार के मोतीहारी में जॉर्ज ऑरवेल का जन्म हुआ था. जैक ने वहां से ख़ूब रिपोर्टिंग की है.

जाने माने ब्रितानी पत्रकार इयान जैक ने भारत के बारे में बहुत कुछ लिखा है, ख़ासकर छोटे-छोटे शहरों के बारे में.

हाल ही में उनके लेखों पर आधारित एक किताब 'मोफ़स्सिल जंक्शन' के नाम से भी प्रकाशित हो चुकी है.

इयान जैक उन गिने चुने लेखकों और पत्रकारों में से हैं जिन्होंने भारत के छोटे-छोटे शहरों की कहानियों को लोगों के सामने लाया है.

भारत जैसे देश में जहां पत्रकार भी नौकरशाह की तरह बात करते हैं, वहीं जैक की भाषा में एक अलग तरह की ताज़गी है.

देखिए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अंतिम संस्कार को जैक कैसे बयान करते हैं.

जैक लिखते हैं, ''फूल-माला से सजी तोप गाड़ी पर उनके(राजीव गांधी) पार्थिव शरीर को रखा गया और लोगों के भारी हुजूम के साथ उनकी अंतिम यात्रा यमुना नदी के किनारे तक पहुंची. चंदन की लकड़ी से सजी चिता पर उनके पार्थिव शरीर को रखा गया और थोड़े ही देर में उसे आग की लपटों ने घेर लिया. दिल्ली की शाम में आसमान में धुआं फैल गया.''

Image caption पटना से फ़ाइल की गई जैक की रिपोर्ट तो शायद सबसे बेहतरीन हैं.

हाल के दिनों में बिहार और भारत के दूसरे शहरों में यात्रा के दौरान मैंने इयान जैक की वो किताब हमेशा अपने पास रखी थी.

बिहार का ख़ास ज़िक्र

पिछले महीने मैंने एक ट्वीट किया था, ''बिहार में घूमना आसान है अगर आप इयान जैक की किताब 'मोफ़स्सिल जंक्शन' को पढ़ते रहें, रात में उस समय तक जब तक कि बिजली न गुल हो जाए.''

मैं बोध गया और जादूगोड़ा जैसे शहरों में भी गया जिनके बारे में जैक ने ख़ूब लिखा है.

जैक ने 1970 और 80 के दशक में भारत के कई छोटे-छोटे शहरों में जाकर रिपोर्टिंग की जब यातायात के साधन उतने अच्छे नहीं थे बल्कि न के बराबर थे.

1983 में बिहार के एक शहर मोतिहारी से रिपोर्टिंग करते हुए जैक लिखते हैं कि एक बुज़ुर्ग वकील किस तरह चंपारण में नील की खेती के दिनों की याद करते हैं.

जैक लिखते हैं, ''पॉपी की ख़ुशबू मैं अब भी महसूस करता हूं और पॉपी के बीज की खनखनाहट अब भी मेरे कानों में गूंजती है.''

मेरी सबसे पसंदीदा रिपोर्ट वे हैं जिन्हें जैक ने पटना से फ़ाइल की हैं.

जैक जब पटना में अपनी बीमारी और किस तरह अजनबियों ने उनकी देख-भाल की, उसके बारे में बयान करते हैं तो उनकी पत्रकारिता एक अलग आकर्षण पैदा करती है.

मोफ़स्सिल जंक्शन में उनके बहुत सारे ऐसे लेख भी हैं जिनमें उन्होंने इंदिरा गांधी और उनके बेटों के बारे में जो लिखा था वे लगभग सारे के सारे बाद में सही साबित हुए.

'छोटे शहरों की अनदेखी'

छोटे शहरों के बारे में जैक ने उस वक़्त लिखा जब उन शहरों में रह रहे लोगों में राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं थी और वहां के लोगों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए कोई जगह नहीं बनाई थी.

Image caption भारत के छोटे शहरों से इतनी बढ़िया रिपोर्टिंग बहुत कम लोगों ने की है.

राजनीति, खेल, व्यापार इन सभी क्षेत्रों में छोटे शहरों के लोगों ने धीरे-धीरे अपने लिए जगह बनानी शुरू कर दी लेकिन उन छोटी जगहों में कोई बदलाव नहीं हुआ. वे आज भी वैसे ही हैं जैसा कि ये लोग छोड़ कर आए थे.

एक चीज़ जिसमें शायद कोई बदलाव नहीं हुआ वे ये कि 'आज भी अंग्रेज़ी भाषा में उन उपेक्षित और अज्ञात जगहों के बारे में बहुत कम लिखा हुआ मिलता है.'

विदेशी टीकाकार और शहरी भारतीय पाठक आरके नारायण की 'मालगुडी डेज़' का ज़िक्र करना नहीं भूलते. दिल्ली से लेकर चेन्नई तक साहित्य में रूचि रखने वाले कई लोग शराब के दौर में ये शिकायत करते हुए मिल जाएंगे कि आरके नारायण को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था लेकिन उन्हें नहीं दिया गया.

लेकिन वे सारी बातें बस अतीत की यादें हैं.

'मोफ़स्सिल जंक्शन' को पढ़ना भारत के दूर-दराज़ इलाक़ों में हो रही घटनाओं के बारे में जानने की भूख के एहसास को दर्शाता है. न केवल उन इलाक़ों के पिछड़ेपन या उनकी शानदार प्रगति की कहानी, बल्कि उससे भी ज़्यादा जटिल और उलझे हुए सवालात. ज़िंदगी के चौराहे पर खड़े आम इंसान की रोज़ाना होने वाली कश्मकश की दास्तान.

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