रुपयाः कैसे संभलेगा? संभलेगा क्या?

रुपया

भारत के साथ ही बहुत से देशों की मुद्रा अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर हो गई है.

मुद्रा कमज़ोर होने के कई कारण होते हैं. लेकिन इसका अकेला कारण अमरीकी केंद्रीय बैंक की नीति नहीं है. दरअसल हमारी अर्थव्यवस्था बहुत कमज़ोर हो गई है.

चालू खाते का घाटा लगातार बढ़ रहा है. इसका मतलब है देश के पास विदेशी मुद्रा कम आ रही है और उससे भुगतान ज़्यादा करना पड़ रहा है.

यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद के पांच फ़ीसदी के आसपास पहुंच गया है.

इसकी मुख्य वजह यह है कि वाणिज्यिक घाटा भी बढ़ गया है. वाणिज्यिक घाटे का मतलब है कि आयात बढ़ गए हैं और निर्यात कम हो रहे हैं.

आर्थिक विषचक्र

निर्यात कम होने की वजह यह है कि पश्चिमी देशों में भारत के सामान, जैसे की पॉलिश किया हुआ हीरा, दूसरे नग या जेवरात, कपड़े, हस्तशिल्प की वस्तुएं, की मांग अंतर्राष्ट्रीय कम या ख़त्म हो गई है.

पश्चिमी देशों में इनकी मांग कम हो गई है. पूर्वी यूरोप में तो ख़ुद ही आर्थिक दिक्क़त में है. हमारा आयात कम नहीं हो रहा है. क्योंकि जो हम आयात करते हैं उसमें से 33 फ़ीसदी कच्चा तेल है.

उसके बाद सोने का नंबर आता है. हम अपने उपभोग का 80 फ़ीसदी तेल आयात करते हैं.

भारतीय तेल कंपनियों को ज़्यादा भुगतान करना पड़ता है. सरकार ने दाम बढ़ाने की इजाज़त दे दी है तो पैट्रोल, डीज़ल के दाम बढ़ जाते हैं. इससे महंगाई बढ़ जाती है, मुद्रास्फ़ीति बढ़ जाती है.

महंगाई बढ़ने से लोग परेशान तो होते ही हैं लेकिन इसका एक और असर पड़ता है.

सोने के दाम भी बढ़ रहे हैं, यहां तक कि सरकार ने सोने के आयात पर प्रतिबंध भी लगा दिया, फिर भी लोग सोना खरीद रहे हैं.

इसलिए कि वह सोचते हैं कि सोने में उनका निवेश मुद्रास्फीति से ज़्यादा तेजी से बढ़ेगा. अंग्रेजी में इसे मुद्रास्फ़ीति के खिलाफ़ बाड़बंदी कहते हैं.

सोने में निवेश करने से चालू खाते का घाटा बढ़ता है, वाणिज्य घाटा बढ़ता है.

तो इस तरह देश एक आर्थिक विषचक्र में फंस गया है.

अस्थाई उपाय

लग रहा है कि सरकार इस पर कुछ नहीं कर पा रही है. पांच साल पहले भारतीय अर्थव्यस्था कमज़ोर नहीं थी इसलिए विश्वव्यापी आर्थिक संकट का हम पर कोई असर नहीं पड़ा. लेकिन पांच साल में देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर हुई है.

मुद्रास्फीति बढ़ गई है. विदेशी निवेशक भारत नहीं आ रहे हैं. देश के इतिहास में पहली बार भारतीय उद्योगपति, पूंजीपति देश से बाहर निवेश कर रहे हैं, देश में नहीं.

हम लोग आत्मविश्वास की कमी के संकट से भी जूझ रहे हैं. सकल घरेलू उत्पाद कम हो गया है 2004-8 के 9 फ़ीसदी की दर से बढ़ रहा था लेकिन अब यह 4.5-5 फ़ीसदी तक पहुंच गया है.

बेरोज़गारी कम नहीं हुई है लेकिन सरकार कह रही है कि बहुत सारे लोग गरीबी रेखा से ऊपर चले गए हैं- हालांकि यह एक बेहद विवादित विषय है. लेकिन अगर हम सरकार की यह बात मान भी लेते हैं तो यह भी सच है कि अमीरों और गरीबों के बीच फ़र्क भी बढ़ गया है. इसीलिए सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लाना चाहती है.

देश के इतिहास में पहली बार भारतीय उद्योगपति, पूंजीपति देश से बाहर निवेश कर रहे हैं. भारत में विदेशी पूंजी लगने के बजाय भारतीय पूंजी बाहर लग रही है. हमारे उद्योगपति देश में उद्योग लगाने को तैयार नहीं है वह विदेश में पैसा लगा रहे हैं.

औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक एकदम गिर गया है. मुझे ऐसा नहीं लगता कि आज की स्थिति में भारत के पास बहुत ज़्यादा विकल्प हैं. आरबीआई कुछ विदेशी मुद्रा खर्च कर रुपये के गिरने को रोक सकता है.

लेकिन यह अस्थाई उपाय है. जब तक हमारा निर्यात नहीं बढ़ेगा, आयात कम नहीं होगा, सकल घरेलू उत्पाद नहीं बढ़ेगा, देश में अस्थिरता कम नहीं होगी तब तक रुपया मजबूत नहीं हो सकता.

(बीबीसी संवाददाता स्वाति बख्शी से बातचीत पर आधारित)

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