पुलिस की मदद कर जान गंवानेवाला 'नक्सली' था

नक्सल

बस्तर में शनिवार को कथित नक्सलियों द्वारा रखे गये बम को निष्क्रिय करने के दौरान बम फटने से एक कथित ‘पुलिस सहयोगी’ की मौत को लेकर सवाल खड़े हो गये हैं.

कुछ स्थानीय गाँववालों का कहना है कि मारा गया व्यक्ति दरअसल सीपीआई माओवादी का सदस्य था जिसने हाल ही में आत्मसमर्पण किया था.

कांग्रेस की राज्य इकाई ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने इस व्यक्ति को ढाल बनाकर इस्तेमाल किया था.

विस्फोट में दो जवान भी घायल हो गये थे.

सुकमा के पुलिस अधीक्षक अभिषेक शांडिल्य के मुताबिक पुलिस का एक बल सर्च ऑपरेशन में निकला था. इस दौरान दोरनापाल-जगरगुंडा मार्ग पर बोरगुंडा गांव के पास एक बम पड़े होने की जानकारी मिली. बम को निष्क्रिय करने के दौरान वो फट गया.

ज़िले के पुलिस अधीक्षक अभिषेक शांडिल्य के अनुसार “बम फटने से मौके पर मौजूद पुलिस सहयोगी कवासी हूंगा की मौके पर ही मौत हो गई. इस घटना में जवान अनिल टण्डन और पूनेम सन्ना घायल हो गये.”

पुलिस का इनकार

यह पूछे जाने पर कि जिस ‘पुलिस सहयोगी’ की मौत हुई है क्या उसे बम निष्क्रिय करने का प्रशिक्षण प्राप्त था, उन्होंने इस बारे में अधिक जानकारी होने से इंकार किया.

उन्होंने कहा कि मारे गये कवासी हूंगा को घटनास्थल पर जाने के लिये पुलिस ने नहीं कहा था.

उधर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने कहा कि नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले प्रेशर और आईडी बम को निष्क्रिय करना मुश्किल नहीं है और कई बार ऐसा होता है कि बम निष्क्रिय करने वाले दस्ते को देख-देख कर ही विभाग के सिपाही ऐसा करना सीख जाते हैं.

हालांकि विश्वरंजन ने इस बात से अनभिज्ञता जताई कि पुलिस विभाग में ‘पुलिस सहयोगी’ जैसा कोई पद होता है.उन्होंने कहा, “ऐसा कोई पद पुलिस में होता है, इसकी जानकारी मुझे तो कम से कम नहीं है.”

उधर इलाके के ग्रामीणों का कहना था कि बम विस्फोट में मारा गया कथित ‘पुलिस सहयोगी’ कवासी हूंगा सीपीआई माओवादी का सक्रिय सदस्य था और उसने कुछ महीने पहले ही आत्मसमर्पण किया था.

आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का भी कहना है कि पुलिस बल में ‘पुलिस सहयोगी’ जैसा कोई पद नहीं होता और पुलिस को स्पष्ट करना चाहिये कि वह उसे घटनास्थल पर किन परिस्थितियों में ले कर गई थी.

आक्रोश

Image caption बम विस्फोट में घायल जवान को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं

दूसरी और प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी ने इस घटना पर आक्रोश जताते हुये कहा है कि राज्य सरकार निर्दोष आदिवासियों को कथित तौर पर ढाल बना कर उन्हें मौत के मुंह में धकेल रही है.

उन्होंने कहा, “जिसे बम निष्क्रिय करने का कोई प्रशिक्षण नहीं हो, उसे आगे कर के इस तरह मौत के मुंह में धकेल देना एक आपराधिक कृत्य है. इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिये और इसके लिये जिम्मेवार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिये.”

इधर एक दूसरी घटना में कोंडागांव में पुलिस और नक्सलियों के बीच हुये मुठभेड़ में पुलिस के तीन जवान घायल हो गये. पुलिस के अनुसार नारायणपुर और कोंडागांव की पुलिस संयुक्त रुप से इलाके में गश्त पर निकली थी.

गश्त से लौटने के दौरान पहले से ही घात लगाये नक्सलियों ने पुलिस बल पर गोलाबारी शुरु कर दी.

जवाब में पुलिस ने भी गोलियां चलाई. इस मुठभेड़ में पुलिस के तीन जवान घायल हो गये.

दो जवानों लेबाराम कश्यप और अजय बघैल को जगदलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, वहीं गंभीर रुप से घायल सुखनाथ मरकाम को रायपुर के लिये रवाना किया गया है.

पिछले पखवाड़े ही नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में नारायणपुर के झाराघाटी में सीएएफ की 16वीं बटालियन के तीन जवान मारे गये थे. इससे पहले नक्सलियों ने 25 मई को एक हमला कर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा समेत 29 लोगों की हत्या कर दी थी.

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