84 कोसी परिक्रमा: क्या भाजपा है सूत्रधार?

  • 26 अगस्त 2013
अयोध्या तोगड़िया गिरफ़्तारी

क्या विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) अकेले ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को बहस के केंद्र में ला सकती है?

क्या उसे इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी से ज़्यादा श्रेय दिया जाना चाहिए?

क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक है कि आम चुनाव से पहले वीएचपी हमेशा ही मंदिर निर्माण का मुद्दा उठा देती है?

चलिए वीएचपी और भाजपा के संबंधों पर एक नज़र डालते हैं.

वीएचपी संगठन

अगस्त 1964 में जन्माष्टमी के दिन मुंबई में विश्व हिंदू परिषद का गठन किया गया था (इसीलिए हर साल यह इस समय के आसपास सक्रिय हो जाती है. इस साल जन्माष्टमी 28 अगस्त को है).

इसके पहले अध्यक्ष स्वामी चिन्मयानंद थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तर्ज पर तय किया गया कि वीएचपी एक ग़ैर-राजनीतिक संगठन रहेगा और किसी भी राजनीतिक दल का कोई पदाधिकारी वीएचपी का सदस्य नहीं बन सकता.

वीएचपी के 1964 के वक्तव्य में इसके ग़ैर-दल और ग़ैर-राजनीतिक रहने का तो उल्लेख किया ही गया, यह भी साफ़ कहा गया कि यह हिंदुओं के सामाजिक ढांचे में सुधार के लिए काम करेगा.

लेकिन पिछले चार दशकों का वीएचपी का उभार इसके हिंदू एजेंडा की राजनीति को साफ़ कर देता है. पहले हम यह समझ लें कि वीएचपी दरअसल है क्या. इसका ढांचा दो स्तर का है.

पहला, प्रमुख अधिकारी के रूप में धर्म संसद के लिए धर्म प्रमुखों की सभा. दूसरा, हर पंथ, समाज और विचारधारा के प्रतिनिधियों का मार्गदर्शक मंडल.

Image caption अयोध्या, फाइल फोटो

इसके अलावा दो समितियां भी हैं. पहली, केंद्रीय प्रबंध समिति. और दूसरी, स्थायी समिति. संगठन के काम को पाँच हिस्सों में बांट दिया गया है, जिनमें से हर एक की ज़िम्मेदारी एक संगठन सचिव के पास होती है.

हर राज्य को इकाइयों में बांट दिया गया है और हर इकाई को ज़िलों और शाखाओं में. इसकी 176 इकाइयां, 640 ज़िले और 6724 शाखाएं हैं. 141 इकाइयों, 38 ज़िलों और 1778 शाखाओं के संगठन सचिव हैं. वीएचपी के 3,000 पूर्णकालिक कार्यकर्ता देश भर में सक्रिय हैं.

विदेश में वीएचपी संगठन की आधारशिला इसके संस्थापक सचिव एसएस आप्टे ने रखी थी. वीएचपी ने दुनिया को पांच खंडों में बांटा है, जिसका मुखिया खंड प्रमुख होता है.

वीएचपी संगठन ने 1984 में न्यूयॉर्क, 1985 में डेनमार्क, 1988 में नीदरलैंड, 1988 में नेपाल, 1988 में सिंगापुर, 1989 में इंग्लैंड में सम्मेलन आयोजित किए. स्वामी विवेकानंद के 1893 को अमरीका में दिए गए प्रसिद्ध भाषण की याद में 1993 में सम्मेलन अमरीका में किया गया.

श्रोता भाजपा

वीएचपी का ढांचा तो प्रभावशाली लगता है, लेकिन सवाल यह है कि वीएचपी भारतीय राजनीति में कितनी महत्वपूर्ण है और हमें उसे कितनी गंभीरता से लेना चाहिए.

भाजपा-शासित राज्य गुजरात में वीचपी की गतिविधियों पर गौर कीजिए, जिसके मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदुओं को मज़बूत करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति माना जाता है.

Image caption (फाइल फोटो- एल के आडवाणी और अशोक सिंघल)

कुछ हफ़्ते पहले अहमदाबाद की एक कला दीर्घा, अहमदावाद-नि-गुफ़ा, में कुछ पाकिस्तानी कलकारों को अपनी कलाकृतियां दिखाने के लिए बुलाया गया था.

कुछ ही दिन में वीचपी सदस्यों ने कला दीर्घा पर हमला कर दिया और न सिर्फ़ पाकिस्तानी बल्कि भारतीय कलाकारों की पेटिंग भी फाड़ दीं.

दीर्घा के (हिंदू) मालिक की शिकायत के बाद वीएचपी के कई सदस्यों को उसी मुख्यमंत्री की सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया, जिसे संघ परिवार दुनियाभर के हिंदुओं के प्रतिनिधि के रूप में देखता है.

इस घटना के बाद प्रवीण तोगड़िया ने एक ट्वीट में लिखा, "जब पाकिस्तानी सेना हमारे सैनिकों को मार रही थी, तब अहमदाबाद में पाकिस्तानी कलाकारों की प्रदर्शनी का विरोध करना क्या अपराध है? बजरंग दल, वीएचपी कार्यकर्ताओं को पुलिस ने वोटों के लिए उठाया है!"

उन्होंने पोस्ट में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को टैग कर उन्हें भी अपने विरोध से अवगत करवाया.

केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस (एनडीए) सरकार में देश को हिंदूपरस्त के रूप में ढालने की वीचपी की मांग पर ध्यान नहीं दिया गया था.

यह सच है कि 2003 के बजट में गायों को बचाने वाली संस्थाओं के लिए टैक्स में छूट का प्रावधान किया गया था.

वीएचपी तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लगातार यह मांग करती रही कि अयोध्या में विवादित स्थल का अधिकार हिंदुओं को दे दिया जाए, जम्मू-कश्मीर को संविधान में दिए गए विशेष दर्जे (संविधान के अनुबंध-370 में विशेष दर्जे की गारंटी दी गई है) को समाप्त किया जाए, बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम (मुख्यतः) घुसपैठियों को रोका जाए.

लेकिन एनडीए सरकार ने बस इतना किया कि वह वीएचपी की इन मांगों को धैर्यपूर्वक सुनती रही.

भाजपा की योजना

इसलिए वीएचपी के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को बहस के बीच लाने को भाजपा की बड़ी योजना, 2014 में दिल्ली में सरकार बनाने, के रूप में देखा जाना चाहिए.

यह महत्वपूर्ण है कि वीएचपी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं है.

मोदी के उभार के बारे में पूछे जाने पर तोगड़िया का कहना था (जून, 2013), "भाजपा के फ़ैसलों में विश्व हिंदू परिषद की कोई भूमिका नहीं है. वीएचपी मानती है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है और देशहित संगठन से बड़ा होता है. इसलिए संगठन को व्यक्ति के बारे में ज़्यादा चिंता नहीं करना चाहिए. हमें सिर्फ़ देशहित और हिंदू विचारधारा की चिंता है."

प्रवीन तोगड़िया ने कहा, "हम चाहते हैं कि देश का प्रधानमंत्री ऐसा हो, जो क़ानून बनाए कि मंदिर बने, और ऐसा करने में सत्ता चली जाती है तो वह इसके लिए तैयार रहे. हम चाहते हैं कि एक ऐसा प्रधानमंत्री हो जो बांग्लादेशी घुसपैठ रोके, जो गौरक्षा के लिए क़ानून बनाए, जो आतंकवाद रोकने के लिए सख़्त कानून बनाए. हम ऐसा प्रधानमंत्री चाहते हैं, जो 100 करोड़ हिंदुओं की चिंता करे. हम ऐसा प्रधानमंत्री नहीं चाहते जो 120 करोड़ लोगों की चिंता करे लेकिन 100 करोड़ हिंदुओं की नहीं और जो 20 करोड़ (मुसलमानों) की चिंता करे लेकिन 100 करोड़ हिंदुओं की नहीं. जो इन बातों को अपने चुनाव कार्यक्रम का हिस्सा बनाएगा, उसे वीएचपी का समर्थन मिलेगा."

हालांकि भाजपा खुलकर वीएचपी की मांगों का समर्थन नहीं कर रही है, वह वीएचपी को कार्यक्रम तय करने से भी नहीं रोक रही. उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन (जन्माष्टमी के साथ-साथ) इसी परियोजना का हिस्सा हैं.

संघ परिवार में शक्ति संतुलन को देखते हुए यह बहुत मुश्किल लग रहा है कि वीएचपी आने वाले चुनाव के लिए भाजपा की राजनीतिक दिशा को तय करे, चाहे यह राम मंदिर हो या जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक संरक्षण का मुद्दा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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