खाद्य सुरक्षा बिल: कहीं खुशी तो कहीं ग़म

  • 27 अगस्त 2013

खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने से पहले यह समझने की ज़रूरत है कि मनरेगा के लिए देश में नए सिरे से एक सेटअप की स्थापना की गई थी. दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा क़ानून पहले से चल रहे कार्यक्रम में केवल कुछ बदलावों की बात करता है.

इसके तहत कोई नया सिस्टम नहीं खड़ा होना है. खरीद की वही पुरानी प्रणाली है. सरकारें पहले की तरह ही अपनी राशन की दुकानों में अनाज बांटेंगी.

यानी कोई नया कार्यक्रम नहीं शुरू हो रहा है. पुराने कार्यक्रम को ही ठीक-ठाक करके पेश किया जा रहा है.

पूरा खाद्य सुरक्षा क़ानून सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर निर्भर है. इस प्रणाली के बारे में हम आज तक कहते आए थे कि ये डिलीवर नहीं कर रहा है और अब हम उम्मीद कर रहे हैं कि वो डिलीवर करेगा.

तकनीक का इस्तेमाल

Image caption नए कानून के तहत सस्ती दरों पर प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज दिया जाएगा.

इसमें दो बातें समझने वाली हैं. पिछले दो तीन सालों से तकनीक में काफी सुधार हुआ है. अब पीडीएस के रिसाव को रोकने के लिए तकनीकी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

जब ट्रक गोदाम से चलता है तो एक एसएमएस से लाभार्थियों को पता चल जाता है कि उनका अनाज कहां तक आ गया है. तकनीक के बेहतर इस्तेमाल से पिछले दो तीन सालों में हमने देखा है कि कई राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में काफी अधिक सुधार हुआ है. इसमें हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और उड़ीसा शामिल हैं.

आपूर्ति प्रणाली इतनी बेहतर हो गई है कि आज तमिलनाडु में शत प्रतिशत आपूर्ति की जा रही है जबकि छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत है.

आधार कार्ड के आने से दूसरे शहरों में काम की तलाश में जाने वाले लोग उस शहर में राशन पा सकते हैं. ये सुधार इस क़ानून में किया गया है.

सिटीजन चार्टर

नए क़ानून में शिकायत दर्ज कराने के लिए एक खास प्रणाली बनाई गई है. इसमें सिटीजन चार्टन का प्रावधान है कि आपको कहां शिकायत दर्ज करानी है, उसके लिए कितने साल की सजा मिल सकती है. इसमें वो सभी प्रावधान किए गए हैं कि आपका क़ानूनी अधिकार आपको मिले.

लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि मनरेगा में भी आय की गारंटी थी. अगर आपको रोजगार नहीं मिलता है तो आप उसको चुनौती दे सकते थे, लेकिन हम जानते हैं कि 100 के बजाए औसतन 54 दिन ही रोजगार मिला है.

गारंटी का औचित्य

Image caption तकनीकी के बेहतर इस्तेमाल से ज़रूरतमंदों तक खाद्य सुरक्षा कानून के फायदों को पहुंचाया जा सकता है.

इसका मतबल है कि क़ानूनी गारंटी होने के बावजूद 100 दिन का रोजगार तो वहाँ भी नहीं मिला.

ये सोचकर चलना कि पीडीएस के माध्यम से 100 प्रतिशत डिलीवरी होगी, तो वह तो समय ही बताएगा कि कितना हो पाया.

नए क़ानून से 67 प्रतिशत यानी 81 करोड़ लोगों को फायदा मिलेगा, जबकि इससे पहले जो पीडीएस था, उसमें 90 करोड़ लोग शामिल थे. वो घटकर अब 81 करोड़ हो गया है.

पहले सात किलो प्रति व्यक्ति अनाज मिल सकता था, अब उसे घटाकर पांच किलो कर दिया है. बस अंतर यह है कि अब अनाज पहले से कम कीमत पर दिया जाएगा.

खाद्य सुरक्षा के तहत वितरण के लिए प्रति वर्ष 620 लाख टन अनाज की ज़रूरत होगी. इस समय देश में करीब 700 लाख टन का भंडार है. लेकिन इसमें समझने की बात है कि वितरण को कृषि उत्पादन के साथ नहीं जोड़ा गया है और यही इसकी सबसे बड़ी खामी है.

आपूर्ति की अनदेखी

खाद्य सुरक्षा विधेयक की एक बहुत बड़ी कमी यह है कि इसमें सिर्फ वितरण की तरफ ध्यान दिया गया है कि गरीबों तक अनाज कैसे पहुंचेगा?

आज अगर किसान की हालत दयनीय है तो आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो आपकी खाद्य सुरक्षा की ज़रूरतों को पूरा कर पाएगा.

कल संसद में कहा गया कि 2500 लोग हर दिन खेती छोड़ रहे हैं. पहली बार हिन्दुस्तान में भूमिहीन किसानों की संख्या खेतिहर किसानों से बढ़ गई है.

विधेयक में कहा गया है कि खाद्यान्न का इंतजाम करना राज्यों की जिम्मेदारी है और वो कहीं से भी लाना चाहें तो ला सकते हैं. यह पूरी कोशिश बताती है कि आपने अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात का एक रास्ता छोड़ा हुआ है. ऐसे में निर्यात बढ़ने से चालू खाता घाटा और बढ़ेगा.

किसानों को एक नुकसान यह हो सकता है कि जब आने वाले दिनों में खरीद मूल्यों को सुधारने की बात की जाएगी तो कहा जाएगा कि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ा जाएगा.

(बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी के साथ बातचीत पर आधारित)

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