करियर कॉर्नर: आईपीएस अजित के साथ एक दिन

बीबीसी की खास पेशकश करियर कॉर्नर में कल हमने आपको मिलावाया था अजित से जो आईपीएस हैं. क्या आप जानना चाहेंगे एक आईपीएस अधिकारी अपना एक दिन कैसे बिताता है. अजित ने अपनी दिनचर्या का एक दिन बीबीसी हिंदी फेसबुक पर हमारे साथ साझा किया.

सुबह 9 बजे- एक आईपीएस के लिए दिन की शुरुआत का कोई तय समय नहीं है. हमारा काम तो 24 घंटे चलता है. लेकिन आमतौर पर दिन शुरु होता सुबह 6:30 बजे जब मेरे एडिशनल एसपी मुझे फ़ोन कर पिछले 24 घंटे की जानकारी और ब्रीफ़िंग देते हैं. इसके बाद लगभग 7:30 बजे मैं अपने आईजी को फ़ोन करता हूं और अपनी तरफ़ से उन्हें जानकारी देता हूं. ये जानकारियां ज्य़ादातर क्रिमिनल एक्टिविटी से ही जुड़ी होती हैं. शुक्र है आज कोई खास घटना नहीं है. अब 10.30 बजे तक दफ़्तर पहुंचना है. देखते हैं आज का दिन कैसा रहता है. आपसे बात होती रहेगी.

सुबह 11:30 बजे- रोज़मर्रा के काम का एक बड़ा हिस्सा हेडक्वार्टर में होने वाली बैठकें भी होती हैं. फिलहाल भोपाल पुलिस मुख्यालय में हूं. कुछ नए पुराने मामलों पर ब्रीफिंग के लिए. सामान्य काम के दिन में आम लोगों से मिलता हूं. महत्वपूर्ण एफआईआर और दस्तावेज देखता हूं. उनसे जुड़े फैसले करता हूं. थाने के मुख्य थानेदारों से संपर्क में रहता हूं और इलाके के बारे में जानकारी लेता रहता हूं

दोपहर 1 बजे- आईपीएस अधिकारी के रोज़मर्रा कामकाज के दौरान स्थानीय नेताओं और आम लोगों की अलग-अलग तरह की मांगों से भी निपटना पड़ता है. कई बार ये मांगे जनता के हित में जायज़ होती हैं लेकिन पुलिस व्यवस्था के नियमों के तहत इन्हें पूरा नहीं किया जा सकता. कई बार ये मांगें सही नहीं होती. इन परिस्थितियों और दबावों से बड़ी सावधानी से निपटना पड़ता है. खाने का वक्त हो रहा है लेकिन फिलहाल काम में व्यस्त हूं.

दोपहर 3:30 बजे- तमाम मीटिंग्स से निपटकर अब वक्त हुआ है खाना खाने का. पुलिसवालों के लिए खाने का आमतौर पर कोई वक्त नहीं होता. हममें से ज्यादातर लोग दोपहर को खाना नहीं खाते. किसी भी वक्त कहीं भी जाना पड़ता है इसलिए कोई तय लंच-ब्रेक नहीं होता. पुलिस वालों की खराब होती सेहत और बढ़ती तोंद की एक वजह अक्सर ये वक्त-बेक्त खाना भी है. परिवार वाले भी अक्सर इस बात को लेकर खफ़ा रहते हैं.

शाम 5:30 बजे-आईपीएस अधिकारी के लिए ड्यूटी का कोई समय नहीं लेकिन मैं आमतौर पर शाम सात बजे तक थाने में रहता हूं. इसके बाद मैं अपने इलाके के किसी भी एक थाने में अचानक पहुंचकर निरीक्षण करता हूं. कॉंस्टेबल मुस्तैद रहें और काम सही होता रहे इसके लिए ये ज़रूरी है. आज भोपाल पुलिस मुख्यालय में हूं इसलिए औचक परीक्षण नहीं हो पाएगा. कुछ देर में आपसे साझा करूंगा अपनी ड्यूटी से जुड़ी एक घटना.

रात 8:30 बजे- अपनी आखिरी पोस्ट में आपके साथ एक छोटी सी घटना साझा करना चाहता हूं. एक महीने पहले अचानक रात को आए एक फ़ोन कॉल के ज़रिए मुझे एक बच्ची के साथ बलात्कार और एफ़आईआर न लिखे जाने की ख़बर मिली. अगले दिन मैं सीधे उस बच्ची के घर गया. मामले की पुष्टी होने पर मैंने न सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज की बल्कि थाने के एसएचओ को सार्वजनिक रुप से निलंबित किया. मुझे लगता है आम लोगों में विश्वास जगाने के लिए इस तरह के काम ज़रूरी हैं. जो लोग मेरी तरह आईपीएस बनना चाहते उन्हें मेरी तरफ से शुभकामनाएं.

संबंधित समाचार