खाद्य सुरक्षा बिल की आलोचना कितनी जायज़?

खाद्य सुरक्षा बिल

यूपीए सरकार का ऐतिहासिक लेकिन विवादास्पद खाद्य सुरक्षा विधेयक सोमवार रात लोकसभा में पारित हो गया. राज्य सभा से भी इस बिल के पारित होने की पूरी संभावना है.

संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक के पारित होने के बाद एक से तीन रुपए प्रति किलो की रियायती दर पर देश की दो तिहाई आबादी को हर महीने 5 किलो तक अनाज मिल सकेगा.

इस महत्वाकांक्षी योजना में 82 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने का प्रावधान है.

लोकसभा में इस योजना पर विपक्ष ने कई सवाल उठाए और संसद के बाहर भी इसकी आलोचना की जा रही है.

एक तर्क ये है कि सरकार का घाटा पहले ही काफी ज़्यादा है, ऊपर से इस योजना पर अरबों डॉलर का खर्च देश की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख देगा.

पक्ष-विपक्ष के तर्क

Image caption कांग्रेस पर आरोप लगे हैं कि वो चुनावों को ध्यान में रखकर खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई है.

इस योजना के पक्ष में अभियान चलाने वालों में से एक रीतिका खेड़ा कहती हैं कि इस योजना पर होने वाले खर्च को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है.

उनका कहना है, "इस बिल के तहत तीन योजनाएं पहले ही चालू हैं जिन पर सरकार पैसे खर्च कर रही है. इस बिल पर सरकार का जो खर्च बढ़ेगा वो केवल 30 हज़ार करोड़ का है. सरकार हर साल पाँच लाख करोड़ के टैक्स माफ कर देती है. हर साल सिर्फ सोना और हीरा उद्योग को 60 हज़ार करोड़ की टैक्स माफ़ी का लाभ मिलता है. इस लाभ को आधा क्यों नहीं कर सकते?"

विपक्ष ने सरकार की नीयत पर भी शक जताया है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सरकार की एक निगाह आम चुनाव पर टिकी है. दूसरे अन्य नेताओं ने सवाल उठाया है कि ये बिल चार साल पहले क्यों नहीं लाया गया.

इस पर रीतिका खेड़ा कहती हैं, "देर आयद, दुरुस्त आयद. देर से आया लेकिन ठीक तरह से आया."

सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व नौकरशाह हर्ष मंदर का कहना है, "अगर कोई सरकार चुनाव में वोट हासिल करने के लिए कोई क़दम उठाती है तो लोकतंत्र में ये चलता है."

हर्ष मंदर भी इस बात को मानते हैं कि बिल देर से आया लेकिन कम से कम आया तो.

कालाबाज़ारी

इस योजना के तहत राशन की दुकानों से अनाज आम लोगों को दिया जाएगा. लेकिन आम धारणा ये है कि राशन की दुकानों से अनाज की कालाबाज़ारी होती है.

भ्रष्टाचार का ये हाल है तो आम लोगों को लाभ आखिर किस तरह से मिल सकेगा. रीतिका खेड़ा कहती हैं राशन की दुकानों के सिस्टम में सुधार लाने की ज़रूरत है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इस योजना में कोई खामी है.

सरकार ये दावा करती है कि इस योजना से 82 करोड़ लोगों को फायदा होगा लेकिन क्या बेघर लोगों को इस का लाभ होगा? क्या उन लाखों लोगों के पेट भरेंगे जो सड़कों पर या ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते हैं?

रीतिका के अनुसार इस बिल में ऐसे लोगों के पेट भरने का कोई प्रावधान नहीं है और ये "इस बिल की एक बड़ी कमजोरी है."

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