समझौते की आड़ में बच नहीं सकेंगे बलात्कारी

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बलात्कार के पीड़ित और अपराधी के बीच हुए समझौते को दोषी की सजा कम करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति समुचित सजा के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाती है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अगुवाई वाली तीन सदस्यी खंडपीठ ने सामूहिक दुष्कर्म के दोषी हरियाणा के शिंभू और बालू राम की सजा कम करने की मांग को खारिज करते हुए यह फैसला दिया.

दोनों ने पीड़िता के साथ हुए समझौतों को आधार बनाते हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में उन्हें दी गई दस साल की सजा को खत्म करने का अनुरोध किया था. दोनों पहले ही लगभग तीन साल की सजा भुगत चुके हैं.

'आधार नहीं'

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक अदालत ने कहा है कि अभियुक्त या पीड़ित की नस्ल, धर्म, जाति, आर्थिक या सामाजिक हैसियत, आपराधिक मुकदमे की सुनवाई में हुई देरी या पीड़ित के साथ विवाह करने के लिए बलात्कारी की पेशकश को कानून द्वारा निर्धारित सजा को कम करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बलात्कार व्यक्तिगत अपराध नहीं है बल्कि यह समाज के विरुद्ध किया गया अपराध है.

पीटीआई की ख़बर में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को आगाह करते हुए कहा है कि सिर्फ इसलिए कि पीड़ित ने समझौता कर लिया है, बलात्कार के दोषी या आरोपी की सजा कम नहीं की जा सकती है.

अदालत ने कहा कि कुछ दुर्लभ मामलों में ही अपवाद स्वरूप सज़ा से छूट दी जा सकती है.

सामाजिक अपराध

Image caption सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपसी समझौते के आधार पर बलात्कार के दोषी की सजा को कम नहीं किया जा सकता है.

पीटीआई के मुताबिक अदालत ने कहा है कि कुछ निचली अदालतें और हाई कोर्ट इस बारे में 'नरम नज़रिया' रखते हैं और अभियुक्त की सजा को सुनवाई के दौरान भुगती जा चुकी सजा तक सीमित कर देते हैं.

अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामले में पक्षकारों में समझौता होने के आधार पर सजा कम नहीं की जा सकती. दुष्कर्म समझौते के जरिए निपटाया जाने वाला अपराध नहीं है. यह समाज के प्रति अपराध है और ऐसे मामलों को समझौते के जरिए निपटाने के लिए पक्षकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता.

अदालत ने यह आशंका भी जताई कि इस तरह सजा कम करने की प्रवृत्ति से अभियुक्त पीड़ित पर समझौता करने के लिए अनुचित दबाव बना सकते हैं.

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