'जीडीपी से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं'

भारत का केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय 30 अगस्त को पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी, के आंकड़े जारी करेगा.

ऐसे वक़्त में जब भारतीय मुद्रा रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमज़ोर पड़ता जा रही है और भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई हुई है, उद्योग जगत को जीडीपी आंकड़ों से क्या उम्मीद है?

भारतीय उद्योग परिसंघ, सीआईआई, के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी कहते हैं कि उन्हें पहली तिमाही से ज़्यादा उम्मीद नहीं है.

'कम उम्मीदें'

उन्होंने कहा, "हम तो पहले से कह रहे हैं कि हमें पहली तिमाही से ज़्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि इस दौरान अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत रहे. हमें बस चाढ़े चार से पांच प्रतिशत के बीच विकास दर की उम्मीद है."

सीआईआई प्रमुख कहते हैं कि इससे उद्योग जगत में घबराहट तो नहीं है लेकिन जिस तरह से बाज़ार कमज़ोर होता जा रहा है उसके चलते निवेश पर बहुत असर पड़ रहा है. ऐसे में बाज़ार को मज़बूत करने के लिए रिज़र्व बैंक और सरकार को क़दम उठाने की ज़रूरत है.

आर्थिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर सिन्हा का भी मानना है कि सकल घरेलू उत्पाद इस बार कमज़ोर ही होगा क्योंकि बहुत से संकेत सामने आ रहे हैं जिनके अनुसार औद्योगिक उत्पादन नीचे जाने की आशंका है और सर्विस क्षेत्र में भी बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद नहीं है.

वे कहते है, ''अर्थव्यवस्था पर इसका निश्चित ही ख़राब असर पड़ेगा क्योंकि अर्थव्यस्था में उदासी आई है. ये उदासी बढ़ेगी और जो लोग निवेश की योजना बना रहे है वो रुक जाएंगे क्योंकि मांग में कमी आई है और अगर मांग नहीं बढ़ेगी तो ज़ाहिर है कि कोई भी कंपनी निवेश करने से बचेगी. लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि अगली से अगली तिमाही में शायद ये बढ़े.''

'आगे सुधार मुमकिन'

तीसरी और चौथी तिमाही से कुछ इसी तरह की उम्मीद चंद्रजीत बनर्जी को भी है.

वे कहते हैं, "इस बार मॉनसून बहुत अच्छा रहा है जिससे पैदावार बढ़ेगी. इससे ग्रामीण इलाक़ों में मांग बढ़ेगी जो औद्योगिक मांग को बढ़ाने में मदद करेगा. इस सबका अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर हो सकता है. इसलिए अगली तिमाहियों में बेहतर संभावनाएं दिख रही हैं."

वहीं प्रभाकर सिन्हा के मुताबिक़ इस साल तो स्थिति बहुत ज़्यादा नहीं बदलेगी क्योंकि सरकार ने ख़र्चा बहुत बढ़ाया है और अगर इन ख़र्चों पर अमल किया गया तो निश्चित तौर पर हमारी आर्थिक हालत बहुत ज़्यादा नहीं सुधरेगी.

लेकिन उनका कहना है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुधार आने से और भारतीय सरकार के कुछ ज़रूरी क़दम उठाने से अर्थव्यवस्था में सुधार आ सकता है.

वे कहते हैं, "अमरीकी अर्थव्यवस्था में अगर सुधार शुरू होता है तो हमारा निर्यात भी बढ़ेगा. इसके अलावा फ़ैसला न कर पाने की वजह से जिन नीतियों को लागू नहीं किया जा सका है या जो निवेश रुका हुआ है, अगर सरकार वो कुछ अच्छे निर्णय ले लेती है तो निश्चित तौर पर फिर से विदेशी निवेश शुरू हो जाएगा जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद बनती है लेकिन वो भी अगले साल चुनाव के बाद."

सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने के घरेलू कारण भी हैं.

चंद्रजीत बनर्जी का कहना था, "कई परियोजनाओं को मंज़ूरी देने की ज़रूरत है, कई निजी परियोजनाएं केंद्र और राज्य सरकारों की मंज़ूरी नहीं मिलने की वजह से रुकी हुई हैं. दूसरी बात बिजली उद्योग के लिए कोयले की सप्लाई को सुनिश्चित करना होगा. फ़िलहाल हम कोयला आयात कर रहे हैं हालांकि हमारे यहां बहुत कोयला है, हमें उसे इस्तेमाल करने की कोशिश करनी चाहिए. वैसे ही खनन उद्योग में अगर ज़्यादा प्रतियोगिता होगी तो वहां ज़्यादा उत्पादन होगा. इन सभी मामलों में क़ानून बनाने की ज़रूरत नहीं है. इन सब घरेलू कारणों से हम ख़ुद ही निपट सकते हैं."

(जीडीपी के आंकड़े भारतीय समयानुसार शाम 5:30 बजे जारी किए जाएंगे. इस पर बीबीसी की विशेष कवरेज होगी. आर्थिक विशेषज्ञों की राय, उद्योग जगत और आम लोगों की प्रतिक्रिया और इससे जुड़े तमाम पहलुओं की जानकारी के लिए बीबीसी हिंदी डॉटकॉम पर आइए शाम 4:30 बजे से.)

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