विदेशी डिग्री पर गिरते रुपए का बोझ

 भारतीय छात्र

भारतीय रुपए की अंतरराष्ट्रीय क़ीमत से बाज़ार और निवेशक तो हलकान हैं ही, विदेश में पढ़ने जा रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवार के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती बन गया है.

दिल्ली में नेहरु प्लेस स्थित उच्च शिक्षा के लिए सलाह देने वाली कंसलटेंसी 'चोपड़ाज़' के संस्थापक नवीन चोपड़ा कहते हैं, "पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाले कुल बच्चों की संख्या में कमी नहीं आई है, बस वे अपनी पढ़ाई का स्थान बदल रहे हैं. अमरीका या ब्रिटेन अगर उन्हें महंगा पड़ रहा है तो अब वे जर्मनी, रूस फ़्रांस, मलेशिया और चीन जैसे देशों में पढ़ने जा रहे हैं. अमरीका में तब भी स्कॉलरशिप अच्छी मिल जाती है लेकिन मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा अब ब्रिटेन की तरफ कम जा रहा है."

ऑल इंडिया बैंकर एसोशिएसन के महासचिव अश्वनी राणा बताते हैं , "फिलहाल विदेश में पढ़ाई के लिए लोन लेने वाले छात्रों की संख्या में कुछ असर नहीं पड़ा है. लेकिन अगर इसी तरह रुपए का गिरना जारी रहा तो अगले साल के लिए लोन चाहने वालों की संख्या में कमी आ सकती है."

अगर कुछ देशों को छोड़ दिया जाए तो विदेश में पढ़ाई भारत की तुलना में महंगी तो होती ही है. लेकिन हाल ही में रुपए में आई भारी गिरावट की वजह से कई छात्रों का बजट अब बिगड़ गया है.परेशान सभी हैं, कोई कम तो कोई ज़्यादा.

बीबीसी ने बात की विदेश में पढ़ाई करने के इच्छुक कुछ विद्यार्थियों से :

'मैं फँस गया हूँ'

Image caption कार्तिक शर्मा : हॉस्टल में ही रह कर काम चलना पड़ेगा

कार्तिक शर्मा दिल्ली से हैं लेकिन आज कल बंगलौर में हैं. वे हॉस्पिटल मैनजमेंट की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जा रहे हैं.

कार्तिक बताते हैं, "मैंने ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड ब्रुक्स यूनिवर्सिटी के लिए अप्लाई किया. मेरे कोर्स की फीस 11 हज़ार 600 पाउंड है. जब मैंने बाहर जाकर पढ़ने की योजना बनाई थी तब पाउंड का रेट 89 रूपए प्रति पाउंड था. अब 106 रूपए प्रति पाउंड हो गया है. पहले ट्यूशन फ़ीस लगभग साढ़े दस लाख लगभग आ रही थी लेकिन अब उसमें भी बढ़ोतरी हो गई है. अब मेरा बजट लगभग चार लाख और बढ़ गया है जो बहुत ज़्यादा है. मैंने इतना बजट बढ़ जाने की उम्मीद नहीं की थी. मैंने यह भी नहीं सोचा था कि मेरे पैरेंट्स इतना अरेंज कर लेंगे. खर्च अपने आप में बढ़ गए हैं लेकिन क्योंकि मैं अपनी तीन महीने की फीस भर चुका था इस वजह से मेरे पास कोई पीछे हटने का कोई मौका ही नहीं बचा."

उन्होंने कहा, "मैं तो फँस गया हूँ. पहले मैंने सोचा था था कि जब पाउंड रेट थोडा नीचे आ जाएगा तब अपनी बाक़ी फीस भर दूंगा. इससे अच्छा तो मैं पहले ही और पाउंड खरीद लेता तो कम से कम अब इतनी दिक्कत तो नहीं आती. अब जो हालत है उसे देखते हुए मुझे अपने रहने के तरीक़े में भी बदलाव करना पड़ेगा. पहले मैंने सोचा था एक अच्छे बड़े घर में रहूँगा लेकिन अब सोचता हूँ कि हॉस्टल में ही रह कर काम चलना पड़ेगा. हर चीज़ पर खर्च सोच समझ कर करना पड़ेगा."

'एक करोड़ से ज़्यादा खर्च होंगे'

Image caption मोहम्मद अर्सलान : कोर्स पर अब एक करोड़ से ज़्यादा रूपए खर्च होंगे

मोहम्मद अर्सलान लंदन की रीजेंट्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं. वे वहां ग्लोबल मैनेजमेंट में बीए ऑनर्स की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं. यह कोर्स लगभग साढ़े तीन साल का है.

अर्सलान कहते हैं, "पाउंड का रेट बढ़ जाने से बहुत ज़्यादा फ़र्क पड़ा है. जब मैंने बाहर पढ़ने की योजना बनाई तब पाउंड पाउंड 85 रूपए का पड़ता था लेकिन अब 105 लगभग है. पहले मैं जहाँ रहने की सोच रहा था वहां की बजाय अब कहीं और रहना पड़ेगा जो ज़्यादा महँगा ना पड़े. फ़ीस की लागत भी बढ़ गई है. पहले 18 से 20 हज़ार पाउंड प्रति वर्ष का खर्चा आ रहा था जो साढ़े तीन साल में क़रीब 75-80 लाख रुपए का खर्च बैठता लेकिन अब पाउंड रेट बढ़ जाने की वजह से 15 से 20 लाख रूपए का खर्च और बढ़ गया है."

उन्होंने कहा, "कुल साढ़े तीन साल के कोर्स पर अब एक करोड़ से ज़्यादा रूपए खर्च होंगे. कुल मिलाकर सभी चीज़ों फ़र्क पड़ा है. मेरे पापा मेरे कोर्स को के लिए पैसे दे रहे हैं. कहीं बाहर से पैसे लेने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी लेकिन मेरे पापा ने जैसे सोचा था वैसे नहीं हो पाएगा. 20 लाख रुपए का ये फर्क बहुत ज़्यादा है. जो मध्यम वर्गीय परिवार हैं उनका तो पूरा बजट बिगड़ जाएगा. हो सकता है कि वो बाहर पढ़ने जाने की अपनी योजना बदल दें या हो सकता है कि वो बाहर जाने का ख्याल ही छोड़ दें. या फिर मध्यम वर्गीय परिवार से जो पढ़ने के लिए बाहर चले भी जाएंगे उनके ऊपर एक दबाव बना रहेगा पार्ट टाइम काम करने का. इस वजह से उनकी पढ़ाई पर भी असर पड़ सकता है. जो लोग इसके बाद करेंसी में चेंज आने की वजह से बाहर पढ़ने जाने वाले हैं सभी लोगों पर फ़र्क पड़ेगा."

'प्लान कैंसिल हो सकता है'

निशा गोयल विदेश में पढ़ाई करने जाने लिए बहुत उत्सुक हैं. वह अपने रिज्यूमे के हिसाब से यह पता कर रही हैं कि उनके पास कौन कौन से कोर्स करने का विकल्प है.

उच्च शिक्षा में सलाह देने वाली कंसलटेंसी से बात करने पर इन्हें पता चला है कि एचआर मैनेजमेंट, सप्लाई चेन मैनेजमेंट या मास्टर ऑफ कॉमर्स जैसे कोर्स इनके लिए सबसे बेह्तर रहेंगे. लेकिन जो भी कोर्स इन्हें बताया गया उसपर वार्षिक खर्च 32 से 35 लाख आ रहा है. इनका जो कोर्स करने का मन है वो दो साल का कार्यक्रम है. इसके हिसाब से पूरे कार्यक्रम पर 60 से 65 लाख रूपए का खर्च आएगा.

निशा रूपए की गिरती क़ीमत से लगभग घबरा गई हैं. निशा कहती हैं, "मेरा बजट 22 से 25 लाख था. मैंने न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में से किसी एक देश में पढ़ने जाने का सोचा था. अब हो सकता है कि मुझे अपना प्लान बदलना पड़े, हो सकता है कि मुझे पढ़ाई के लिए देश भी बदलना पड़े या फिर हो सकता है कि अब प्लान रद्द ही करना पड़ जाए."

निशा कहती हैं, "मुझे लगता है कि पैसों की वजह से अब मैं अच्छी यूनिवर्सिटी में ना पढ़ पाऊं. रूपए में गिरावट का असर झेलना पड़ेगा. जितना बजट हमारे पास था उससे तो ज़्यादा पैसों की ही अब ज़रुरत पड़ेगी. भारतीय छात्रों के लिए बाहर पढ़ने जाने के लिए मौके या तो बहुत कम होते जा रहे हैं और उन्हें बहुत दिक्कत पेश आने वाली है. अब बस यही उम्मीद है कि रूपए की कीमत में सुधार हो और कोई अच्छा और आसान विकल्प निकाल सकें. विदेश में पढ़ाई के लिए मिलने वाला लोन एक सहारा है लेकिन पेरेंट्स की प्रॉपर्टी भी है, हो सकता है की वह भी दाँव पर लगानी पड़े. अभी तक कुछ निश्चित नहीं है. देखते हैं क्या होता है."

'अचानक इंतजाम कहाँ से हो'

Image caption राजकुमार गिरघर: इंतज़ाम नहीं होता तो बेटे का वीज़ा कैंसिल हो जाता

राजकुमार गिरधर अपने बेटे हिमांग गिरधर के भविष्य को लेकर परेशान हैं. उनके बेटे का यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट लंदन में होटल मैनेजमेंट के लिए एडमिशन हो चुका है. हिमांग का वीज़ा लग चुका है. छह सितम्बर को कॉलेज जाना है. चार सितंबर की दिल्ली से लंदन की टिकट भी खरीदी जा चुकी है. राजकुमार बताते हैं, "जिस समय वीज़ा के लिए अप्लाई किया था तब 10 लाख रुपए का फंड काफी था लेकिन दो दिन पहले ही मुझे एक मेल मिली कि फंड कम पड़ रहा है. तीन लाख रूपए की और ज़रुरत पड़ेगी. डॉलर और पाउंड के मुक़ाबले रूपए की कीमत कम होने से बहुत परेशानी हो रही है."

उन्होंने कहा, "जो फंड जमा किए हुए हैं, उनकी क़ीमत लगातार कम हो रही है. अब हमारा बजट 13 लाख का हो गया. दो-तीन दिन में तीन लाख का इंतज़ाम करना आसान बात तो है नहीं. अचानक से इंतजाम कहाँ से हो. फंड नहीं हैं तो भी मुश्किल और वीज़ा कैंसिल हो जाए तो भी मुश्किल. अब क्या करें ? बेटे के लिए इंतजाम तो करना पड़ेगा ही. रिश्तेदारों से उधार लेकर किसी तरह इन पैसों का इंतजाम किया. दो-तीन दिन में ही इन तीन लाख रुपयों का इंतज़ाम नहीं होता तो बेटे का वीज़ा कैंसिल हो जाता. अगर बेटे को पढ़ाना है तो कहीं भी, कैसे भी, पैसे का इंतज़ाम करना ही पड़ेगा. यह तो मजबूरी है."

'बिना 100 प्रतिशत स्कॉलरशिप संभव नहीं'

Image caption भ्रामरी: 100 प्रतिशत स्कॉलरशिप के लिए प्रयास

लखनऊ से भ्रामरी ने कहा, 'मैं लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से जेंडर स्टडीज़ पढ़ना चाहती हूँ. अभी रुपए की गिरावट की वजह से मैं परेशान हूँ. मैं 100 प्रतिशत स्कॉलरशिप के लिए प्रयास कर रही हूँ वरना अब लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में पढ़ने का सोच भी नहीं सकती. मुझे लगा था कि वर्क एक्सपीरिएंस के साथ मुझे आंशिक स्कॉलरशिप मिल जाएगी तो भी मैं जा पाउंगी. इसलिए मैंने तीन साल काम किया. लेकिन जनवरी में मैं आंशिक स्कॉलरशिप के साथ भी नहीं जा सकी. अगर जा सकती तो मैं जनवरी के विंटर सेशन के लिए ही अप्लाइ कर देती."

भ्रामरी कहती हैं, "एडमिशन के समय जो अपने बैंक अकाउंट में फंड होने चाहिए, वो मेरे पास नहीं थे और अब तो पाउंड रेट और भी बढ़ गया है. अब तो बिना 100 प्रतिशत स्कॉलरशिप मिले मेरा जाना संभव नहीं हो पाएगा. मैं किसी बैंक से भी लोन नहीं लेना चाहती हूँ क्योंकि अगर मेरा कोई प्रोफेशनल कोर्स होता या एमबीए जैसा कोई कोर्स होता तो शायद मुझे इतनी चिंता नहीं होती लेकिन मेरा अकादमिक विषय है. बाहर से यह कोर्स करके मिलने वाली तनख्वाह में इतनी बढ़ोतरी नहीं होती है जितनी एमबीए जैसे कोर्स को करके बढ़ती है."

'जैसे सोचा था वैसे नहीं हो पाएगा'

Image caption जय गुप्ता : मेरे पापा को परेशानी हो रही है

जय गुप्ता ने बताया, "मैं इंटरनेशनल बिज़नेस मैनेजमेंट में एमएसएसी की पढ़ाई के लिए नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी जा रहा हूँ. यह एक साल प्रोग्राम है. इसे करने के लिए 21 से 22 लाख रुपए का खर्च आ रहा है. पहले जब मैंने बाहर पढ़ने जाने की योजना बनाई थी तब लगभग 18 लाख का ख़र्च आ रहा था.

उस समय पाउंड रेट 80 रूपए प्रति पाउंड था. पहले यह 85 हुआ और अब यह बढ़ते बढ़ते 106 पर आ गया है. लगभग तीन लाख का अंतर आ गया है. पाउंड के रेट बढ़ने की वजह से यह बढ़ गया है. मेरे पापा को ज़रूर परेशानी हो रही है.

उन्होंने कहा, "जितना और जैसे मैंने सोचा था वैसे तो नहीं हो पाएगा. अंतर तो बहुत पड़ने वाला है. मेरा एक साल का कोर्स है लेकिन जिनका दो-तीन साल का कोर्स है उनको ज़्यादा प्रॉब्लम आ सकती है. मेरे पापा पहले मुझे अपने खर्च के लिए लगभग 1,000 पाउंड हर महीने भेजते तो अब 850 पाउंड लगभग ही भेज पाएंगे. अगर यह पाउंड रेट और बढ़ा तो हम पर असर पड़ेगा. बाहर पढ़ने जाने वाले सभी छात्रों को परेशानी आएगी. मैंने अपने फंड पहले से जमा किए हुए थे. जिसने अभी-अभी योजना बनाई होगी उसके लिए ज़्यादा मुश्किल हो सकती है."

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