कैसी है भारत की डिजिटल तस्वीर?

मैं आपको पाँच अलग-अलग तरह का काम कर रहे लोगों के बारे में बता रहा हूँ, आप सोचिए कि इनमें समानता क्या है?

पहला व्यक्ति- एक नामी कंपनी के ऐशो-आराम छोड़कर लगभग सवा अरब लोगों को डिजिटल पहचान पत्र जारी करने के प्रोजेक्ट में लगा है.

दूसरा- हर महीने डिजिटल दुनिया में लोग 100 अरब सर्च कर रहे हैं, लोगों को उसके बेहतर नतीजे कैसे मिलें, उस पर काम कर रहा है.

तीसरी- एक युवा महिला जिसने दुनिया की सबसे लोकप्रिय मानी जाने वाली सोशल नेटवर्किंग कंपनी के प्रमुख फ़ीचर बनाए.

चौथा- टेक्नॉलोजी और सामाजिक संस्थाओं को साथ लाकर किसानों के फ़ायदे के लिए काम कर रहा है.

और पाँचवाँ- लगभग 30 लाख लोगों को नौकरी खोजने में मदद कर रहा है.

अगर पाँचवें व्यक्ति के बारे में पढ़कर भी आप न समझ पाए हों तो बता दूँ कि ये वे भारतीय हैं जो भारत और दुनिया में डिजिटल इनोवेशन के क्षेत्र में अग्रणी होकर काम कर रहे हैं.

डिजिटल इनोवेशन यानी डिजिटल दुनिया में लगातार कुछ नया रचने और नया करने की कोशिश.

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संघर्ष का जोखिम

दिल्ली के उस युवा को देखिए जिसने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी छोड़ी और लगभग एक दशक तक बिना तनख़्वाह के संघर्ष किया.

इसके बाद 1997 में जब संजीव बिखचंदानी ने नौकरी खोजने के लिए एक वेबसाइट बनाई तो उसे लोगों के बीच ऐसी लोकप्रियता मिली कि आज वह भारत के प्रमुख वेब बिज़नेस के मालिक हैं.

ऐसी वेबसाइट के बारे में वह इसलिए सोच पाए क्योंकि उन्होंने अपने साथियों को बिज़नेस पत्रिकाएँ आगे के बजाए पीछे से पढ़ते देखा था जहाँ नौकरियों के बारे में जानकारी छपी होती थी.

उस समय पूरे भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या महज़ 15 हज़ार थी.

आज यह तादाद लगभग साढ़े सात करोड़ है और हर साल 30 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ रही है. ऐसे में आज से 16 साल पहले इंटरनेट से जुड़ा बिज़नेस शुरू करने के लिए काफ़ी मज़बूत कलेजा चाहिए था.

अच्छा 26 साल के उस युवा को लीजिए, जिसने बैंगलोर में सॉफ़्टवेयर की एक कंपनी अपने एक सहयोगी के साथ शुरू की और आज टेक्नोलॉजी की दुनिया में उसकी एक अलग पहचान है.

उसके 28 साल बाद, नंदन नीलेकणी ने इन्फ़ोसिस छोड़ी और वो काम शुरू किया जिसमें उनका विश्वास था- एक अरब से ज़्यादा भारतीयों को डिजिटल पहचान देने का काम.

नंदन की शुरू की हुई उस कंपनी और उसकी जैसी कई अन्य कंपनियों ने भारत के आईटी-बीपीओ उद्योग को 2012 में 100 अरब डॉलर से ज़्यादा का कर दिया.

दुनिया सुधारने की कोशिश

टेक्नोलॉजी जगत के संगठन नैसकॉम के मुताबिक़ उसका लगभग 70 फ़ीसदी निर्यात से आया था और दुनिया में जो भी आईटी-बीपीओ सर्विसेज़ हैं उसका 60 प्रतिशत भारत देता है.

यही कहानी पुणे की उस 23 साल की युवा की भी है जिसने उस नई कंपनी में काम शुरू किया, जो कॉलेज जाने वालों के लिए डेटिंग सर्विस जैसी लगती थी.

उसने वहाँ बतौर पहली महिला इंजीनियर काम शुरू किया था. रुचि सांघवी फ़ेसबुक में प्रिंसिपल प्रॉडक्ट मैनेजर बनीं और उसकी न्यूज़ फ़ीड की प्रमुख रहीं.

इस उभरते सितारे ने 29 साल की उम्र में नौकरी छोड़ी और फिर एक नई कंपनी शुरू की. सिलिकन वैली में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ जो कंपनी शुरू की उसे ड्रॉपबॉक्स ने ले लिया.

ड्रॉपबॉक्स इंटरनेट से जुड़ी वो जगह है जहाँ आप अपने अहम दस्तावेज़ और तस्वीरें रख सकते हैं.

उसी सिलिकन वैली में मौजूद हैं बैंगलोर के बेन गोम्स भी. कभी ब्रितानी ज़ेडएक्स स्पेक्ट्रम कंप्यूटर के साथ घर में जोड़-तोड़ करने वाले बेन आज दुनिया की सबसे बड़ी वेब सर्च कंपनी में हैं.

अगली बार जब आप गूगल में कुछ खोजने के लिए टाइप कर रहे हों और उसमें अपने आप सुझाव दिखने शुरू हों या फिर जब उस सर्च की वजह के नतीजे सामने आएँ तो आप इसी युवा भारतीय को शुक्रिया कह सकते हैं.

हमारे अगले डिजिटल इंडियन हैं रिकिन गाँधी. उन्होंने अंतरिक्षयात्री बनने का अपना ख़्वाब महज़ कुछ क़दम की दूरी पर ही छोड़ दिया.

उन्होंने अमरीका छोड़ा और भारत आए, किसानों के साथ काम करने के लिए. इसके लिए उन्होंने डिजिटल वीडियो का इस्तेमाल किया जिससे उन किसानों की ज़िंदग़ी बेहतर की जा सके.

स्थानीय तौर पर पर बना ये वीडियो ग्रामीण भारत के लिए काफ़ी साधारण इनोवेशन है क्योंकि वहाँ तक इंटरनेट की पहुँच भी नहीं है. हाँ, मोबाइल ज़रूर वहाँ पैठ कर रहा है.

मज़बूत लोगों की कहानी

भारत के गाँवों में हर 100 लोगों पर 40 मोबाइल फ़ोन हैं. शहरों में यही औसत 139 का है. भारतीय अधिकारियों के मुताबिक़ देश में जो 90 करोड़ टेलीकॉम कनेक्शन हैं उनमें से 97 फ़ीसदी मोबाइल हैं.

मोबाइल से टेलीकॉम क्षेत्र में क्रांति आ गई है. एक शताब्दी में जहाँ लैंडलाइन फ़ोन ज़ीरो से तीन करोड़ पहुँचे थे, तो वहीं सिर्फ़ 18 सालों में मोबाइल कनेक्शन ज़ीरो से 87 करोड़ तक जा पहुँचे हैं.

वैसे भारत का इन्फ़ोटेक उद्योग टेलीकॉम जितना पुराना नहीं है लेकिन फिर भी तीन दशक से तो है ही. वहीं डिजिटल या वेब क्षेत्र और नया है.

ये सब शुरू हुआ जब 1995 में मुंबई के राजेश जैन ने प्रवासी भारतीयों के लिए इंडिया वर्ल्ड शुरू किया. उस समय भारत में आम लोगों के पास इंटरनेट नहीं था.

तो फिर आख़िर वेबसाइट शुरू ही क्यों की? जैन कहते हैं, "जब मेरा इमेज प्रोसेसिंग सॉफ़्टवेयर का बिज़नेस नहीं चला तो आख़िर मुझे करने के लिए कुछ तो चाहिए था."

तब तक भारत में लोगों को वेब की इस ताक़त का अंदाज़ा नहीं था लेकिन चार साल बाद की वो हेडलाइन शायद लोग नहीं भूले होंगे जिसमें बताया गया था कि जैन ने अपनी इंडिया वर्ल्ड वेबसाइट 499 करोड़ रुपयों में सत्यम इन्फ़ोवे को बेच दी.

इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े मीडिया ग्रुप टाइम वॉर्नर को अमरीका ऑनलाइन ने 162 अरब डॉलर में ख़रीद लिया.

डॉट कॉम क्रांति ने बहुतों को शिखर पर पहुँचाया और साल 2000 में जब इस क्षेत्र में मंदी आई तो कुछ लोग ही बचे. लेकिन वे कुछ और ज़्यादा मज़बूत डिजिटल बिज़नेस लेकर सामने आए.

यह उनकी भी कहानी है.

कुछ अलग करने वाले

यह उन भारतीयों की भी कहानी है जिन्होंने टेक्नॉलोजी की दुनिया में पंख फैलाए, इनोवेशन के क्षेत्र में नाम किया, सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति में जिन्होंने उतार और चढ़ाव दोनों देखे. यह कहानी सिलिकन वैली की भी है.

चेन्नई के राम श्रीराम को ही लीजिए जिन्होंने वहाँ नेटस्केप में तब काम किया जब उसके पास ज़्यादा उत्पाद नहीं थे और उसे छोड़कर जंगली डॉट कॉम शुरू की. फिर उसे जेफ़ बेज़ोस को लगभग साढ़े अट्ठारह करोड़ डॉलर में 1998 में अमेज़न को बेच दिया.

उन्होंने गूगल के सह संस्थापकों सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज को पाँच लाख डॉलर का उनका पहला चेक दिया था और मेनलो पार्क गराज में उन्हें नियमित तौर पर सलाह भी देते थे.

वह आज भी गूगल के बोर्ड में हैं और वहाँ की लीडरशिप टीम के 13 में से पाँच सदस्य भारतीय मूल के हैं.

डिजिटल इनोवेशन के मामले में अग्रणी इतने भारतीय चेहरे हैं कि वे एक बार में एक जगह पर आ भी नहीं सकते. ये चेहरे पूरी दुनिया में और हर उद्योग में फैले हैं.

हमने उनमें से सिर्फ़ पाँच लोग चुने हैं. ये पाँच लोग जो दुनिया को कुछ नया, कुछ अलग देने की कोशिश में लगे हैं.

ये हैं हमारे डिजिटल इंडियंस.

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