डिजिटल इंडियंस: 'इंटरनेट ने बुरे वक़्त में साथ दिया'

  • 4 सितंबर 2013
सागरिका

जब पहली बार मैंने लोगों को अपने इंटरनेट बैंड प्रोजेक्ट के बारे में बताया तो कुछ लोग हंस पड़े, कई ‘फ़ितूरी आइडिया है, कुछ नहीं होगा’ बोलकर आगे निकल गए.

गाने का शौक़ तो बचपन से ही था लेकिन मिडिल क्लास परिवार से हूँ, लिहाज़ा इतने पैसे नहीं थे कि दूसरों की तरह महंगे म्यूज़िक एल्बम बनाकर अपना शौक़ पूरा कर पाती.

सपनों और हक़ीकत के बीच झूलते हुए ख़ुद को अक्सर इंटरनेट पर पाती थी, और वहीं से मिला मुझे इंटरनेट पर बैंड बनाने का आइडिया.

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर मुझे मेरी जैसी कई लड़कियां मिलीं. कोई गाना चाहती थी, तो कोई इंस्टूमेंट प्ले करना. लेकिन सारे अलग-अलग देश के थे. मैंने सोचा कि सब एक साथ जुड़कर काम करें तो!

क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसा कोई बैंड बने जो इंटरनेट पर ही मिले, वहीं कम्यूनिकेट करे और वहीं संगीत बनाए? ऐसे कई सवाल थे मेरे मन में. पर हमने शुरू किया. कई लड़कियों को ख़ुद से जोड़ा, कोई अरब से तो कोई यूरोप से इंटरनेट के माध्यम से हमसे जुड़ी.

साल 2010 में हमने दुनिया का पहला इंटरनेट गर्ल बैंड, ‘वाइल्ड ब्लॉसम्स’ तो बना लिया लेकिन, लोगों को इसका कॉन्सेप्ट समझाने में काफ़ी समय लगा.

आइडिया का विरोध

जब वेबसाइटों पर संगीत से जुड़े लोगों को बताया कि पैसे के अभाव में हम इंटरनेट पर लड़कियों का बैंड बना रहे हैं तो मुझे पागल कहा गया, कुछ ने तो बिलकुल नकार दिया, बात करने से भी इनकार कर दिया.

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो डिजिटल दुनिया की समझ रखते थे. ऐसे ही कुछ स्क्रिप्टराइटर्स और कंपोज़र्स बड़े विश्वास के साथ हमसे जुड़े.

आज तीन साल बाद मेरे किसी भी आम दिन की शुरुआत इंटरनेट पर म्यूज़िक से जुड़ी नई ख़बरें पढ़ने से होती है और दिन का अंत फ़ेसबुक, ट्विटर या स्काइप पर कम्युनिटी इंटरेक्शन से होता है.

मोबाइल पर इंटरनेट का काफ़ी प्रयोग करती हूं. ख़ासकर मैसेजिंग ऐप्स के लिए जैसे कि ‘व्हाट्स ऐप’, ‘लाइन’. इनसे छोटी-मोटी फ़ाइल भी भेजने की सुविधा मिलती है और वॉयस चैट की भी.

कभी-कभी जब किसी कार्यक्रम के संबंध में दूसरे शहर में बैठे किसी व्यक्ति से बात करनी होती है तो स्काइप का इस्तेमाल कर लेते हैं.

अगर इंटरनेट पर म्यूज़िक बनाने के तरीक़े की बात करें तो ये हमें काफ़ी सहज लगता है. कई राउंड की चर्चाओं के बाद किसी गाने के बोल फ़ाइनल किए जाते हैं और फिर इसे म्यूज़िक कंपोज़र को भेजा जाता है. डेमो तैयार होने के बाद मैं भारत में वो गाने गाती हूं और एक कॉमन डेटाबेस में डाल देती हूं ताकि टीम के सभी लोग उसे सुनकर प्रतिक्रिया दे सकें. सबसे अंत में इसे साउंड इंजीनियर मिक्स कर देता है और गाना रिलीज़ के लिए तैयार हो जाता है. फिर लग जाते हैं हम इसको लोगों तक ले जाने की तैयारी में.

सारे दोस्त, दुश्मन और शुभचिंतक सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जुड़े हुए हैं और पल-पल की हलचल देखते और पोस्ट करते रहते हैं.

दिन का बाक़ी सारा समय म्यूज़िक और सामाजिक कार्य का.

'मिले अवार्ड तो पता चला परिवार को'

हम काम करते गए और इंटरनेट पर उसे प्रकाशित करते गए. इसी बीच लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स को हमारे काम के बारे में सूचना मिली और उन्होंने संगीत क्षेत्र में हमें पुरस्कार दिया. और भी कई अवार्ड मिले जिसके बाद हमें एक पहचान मिली. अख़बारों में पहली बारी नाम छपना बेहद सुखद अहसास था.

मेरे प्रोजेक्ट के बारे में मेरी ‘मां’ और ‘बाबा’ को भी तभी पता चला. वह सभी अचानक से यह सब देखकर आश्चर्यचकित थे क्योंकि मैंने उन्हें इसके बारे में बताया ही नहीं था.

मुझे डर था कि अगर मेरा प्रोजेक्ट फ़ेल हो जाता तो उन्हें बुरा लगता. इसलिए काम करती गई और बाक़ी भगवान भरोसे छोड़ दिया.

इंटरनेट के ज़रिए डॉक्टर किरण बेदी की सामाजिक संस्था ‘नवज्योति इंडिया फ़ाउंडेशन’ के बारे में पता चला, जिसके ज़रिए बाद में मुझे महिला सशक्तीकरण के विषय पर काफ़ी काम करने का मौक़ा मिला.

तीन वर्षों की मेहनत रंग ला रही है और अब लोग मुझे एक डिजिटल आंतरेप्रेन्यर के तौर पर भी पहचानते हैं. बेशक, इंटरनेट, कंप्यूटर और फ़ोन के बिना यह सब होना संभव ही नहीं था.

आज इंटरनेट की ताक़त को पूरी दुनिया समझ रही है, लेकिन हमारे लिए यह ऐसे दोस्त से कम नहीं जिसने बुरे वक़्त में साथ दिया और उन सपनों को पूरा किया जो सिर्फ़ मेरी आंखें देख रही थीं.

सागरिका देब की ये डायरी बीबीसी डिजिटल इंडियन सिरीज़ की पेशकश है. क्या इंटरनेट ने बदल दी है आपकी भी ज़िंदगी, बताइए हमें. फॉलो कीजिए फ़ेसबुक, ट्विटर और गूगल प्लस पर #BBCDI.

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