भूमि अधिग्रहण विधेयक राज्य सभा में भी पास

संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कर दिया है.

लोकसभा पहले ही इस विधेयक कोपारित कर चुकी है. खाद्य सुरक्षा विधेयक के बाद यह विधेयक मौजूदा यूपीए सरकार की दूसरी बड़ी महत्वाकांक्षी योजना है.

राज्य सभा में इस विधेयक पर लंबी बहस चली, जिसमें 26 सांसदों ने हिस्सा लिया. इस विधेयक के पक्ष में 131 मत पड़े, जबकि विरोध में 10 वोट. ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सदन में कहा कि ये विधेयक चुनावों के मद्देनज़र नहीं लाया गया है.

उन्होंने कहा, "इस विधेयक में किसानों का हित सर्वोपरि है और ये विधेयक चुनावों को देखते हुए नहीं लाया गया है."

भारतीय जनता पार्टी के नेता रविशंकर प्रसाद ने किसानों की ज़मीन के ग़लत इस्तेमाल पर चिंता जताई. लेकिन जयराम रमेश का कहना था कि इसमें उनकी चिंताओं का ध्यान रखा जाएगा.

लोकसभा ने इस विधेयक को 29 अगस्त को ही पास कर दिया था. कांग्रेस ने इस विधेयक को ऐतिहासिक बताया. कई पार्टियों ने इसका समर्थन तो किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि उर्वर ज़मीन को औद्योगिक विकास के नाम पर अधिगृहित नहीं किया जाना चाहिए.

दावा

सरकार का दावा है कि इस विधेयक में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अधिगृहित की जाने वाली ज़मीन के बदले निष्पक्ष मुआवज़े का प्रावधान किया गया है.

विधेयक में ग्रामीण इलाकों में अधिगृहित की जाने वाली ज़मीन के लिए बाज़ार मूल्य से चार गुना अधिक मुआवज़े का प्रावधान है. शहरी क्षेत्र में यह बाज़ार मूल्य से दो गुना अधिक होगा.

साथ ही विधेयक में अधिग्रहण से प्रभावित लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गई है ताकि जमीन अधिग्रहण के बाद किसानों की सामाजिक और आर्थिक दशा सुधारने में उनकी सहायता की जा सके.

इसे 'उचित मुआवज़ा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक, 2012' नाम दिया गया है. विधेयक में कहा गया है कि निजी परियोजनाओं के लिए भूमि के अधिग्रहण में 80 फीसदी ज़मीन मालिकों की सहमति ज़रूरी है.

निजी-सरकारी भागीदारी परियोजनाओं के लिए 70 प्रतिशत ज़मीन पर मालिकों की सहमति ज़रूरी होगी.

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