चार-चार प्रधानमंत्रियों के विश्वासपात्र रहे लक्ष्मीकांत झा

  • 22 सितंबर 2013
चार प्रधानमंत्रियों का विश्वास प्राप्त था आईसीएस अधिकारी लक्ष्मीकांत झा को.

लक्ष्मीकांत झा शायद अकेले इंसान थे जिन्हें जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी और मोरारजी देसाई सभी का विश्वास प्राप्त था.

1937 बैच के आईसीएस ऑफ़ीसर लक्ष्मीकांत झा न सिर्फ़ शास्त्री के प्रधान सचिव रहे, बल्कि उन्होंने रिज़र्व बैंक के गवर्नर, अमरीका में भारतीय राजदूत और कई सालों तक जम्मू कश्मीर के राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद सँभाले.

दरभंगा में जन्मे लक्ष्मीकांत झा ने पहले बनारस हिंदू विश्व विद्यालय और फिर केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में अपनी पढ़ाई की थी. जहाँ उनके प्रोफ़ेसर डेनिस रॉबर्टसन उनके वहाँ से पढ़ कर आने के बीस साल बाद भी उन्हें अपने सबसे काबिल शिष्य के तौर पर याद करते थे.

खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा ट्रुथ, लव एंड लिटिल मैलिस में लिखते हैं कि जिस पानी के जहाज़ ‘कौंटे रोसो’ से वो इंग्लैंड गए थे उस पर लक्ष्मीकांत झा भी सवार थे. बकौल खुशवंत झा को हाथ देखने और जन्म पत्री बनाने की कला में महारत हासिल थी. इसलिए ख़ासे लहीम शहीम होने के बावजूद लड़कियाँ उनकी तरफ खिचीं चली आती थी.

शास्त्री के सचिव

पचास के दशक में झा ने वाणिज्य मंत्रालय में लाल बहादुर शास्त्री के साथ काम किया था. ज़ाहिर था कि शास्त्री उनसे ख़ासे काफ़ी प्रभावित थे.

इसलिए जब वो प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने झा को अपना प्रधान सचिव बनाने की पेशकश की. शुरू में शास्त्री प्रधानमंत्री सचिवालय में दो सचिव रखना चाहते थे.

आर्थिक मामलों के लिए लक्ष्मीकांत झा और प्रशासनिक मामलों के लिए उतने ही क़ाबिल लल्लन प्रसाद सिंह. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. झा को ये विचार जंचा नहीं कि बराबर रैंक का अफ़सर प्रधानमंत्री कार्यालय की ज़िम्मेदारी उनके साथ बांटे और दूसरे गुलज़ारीलाल नंदा भी एल पी सिंह को गृह मंत्रालय से छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे.

इंदर मल्होत्रा कहते हैं कि शास्त्री के काम के भारी बोझ, उनकी अव्यवस्थित कार्य शैली और उनकी बैठकों को ज़रूरत से ज़्यादा लंबा खींच जाने की स्थिति ने झा की ताक़त और प्रभाव को और बढ़ा दिया.

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में लक्ष्मीकांत झा बेहद पॉवर पुल अधिकारी माने जाते थे.

शास्त्री की बढ़ती व्यस्तता के कारण सरकार के दूसरे विभागों के सचिवों और स्वयं शास्त्री के मंत्रिमंडल के सदस्यों के लिए उनसे मिल पाना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा था.

झा अब एक विभाग के सचिव नहीं रह गए थे बल्कि शास्त्री सरकार के सारे बड़े निर्णय उनकी सलाह के बग़ैर नहीं लिए जा रहे थे.

ज़ाहिर है कि कैबिनेट सचिव को झा का ये बढ़ा रुतबा पसंद नहीं आ रहा था खास कर उस समय जब झा आर्थिक मामलों के साथ साथ घरेलू नीतियों और विदेशी मामलों में भी शास्त्री को गाइड कर रहे थे जबकि विदेशी मामलों का उस समय तक उन्हें कोई खास अनुभव नहीं था.

अमरीका के नज़दीक

शास्त्री बहुत दिनों तक भारत के प्रधानमंत्री नहीं रह पाए. ताशकंद में उनका अचानक निधन हो गया.

इंदिरा गाँधी झा को पसंद तो करतीं थी लेकिन उनकी नज़र में वो अमरीका और पश्चिम के समर्थक थे और ऐसे शख़्स का उनका सचिव बने रहना उनकी छवि के लिए परेशानियाँ खड़ी कर सकता था.

इसलिए उन्होंने कुछ दिनों तक अपने पास रखने के बाद इंदिरा ने उन्हें रिज़र्व बैंक का गवर्नर बनाने का फ़ैसला किया.

मोरारजी के साथ नाइट क्लब में

जानेमाने पत्रकार जॉर्ज वर्गीज़ ने अपनी आत्मकथा फ़र्स्ट ड्राफ़्ट में लक्ष्मीकांत झा के बारे में बहुत दिलचस्प किस्सा लिखा है.

वर्गीज़ लिखते हैं कि झा ने मोरारजी देसाई के साथ भी काम किया था और उनकी उनसे अच्छी बनती भी थी. जब मोरारजी उप प्रधानमंत्री थे तो वो झा के साथ कनाडा के दौरे पर गए. उस समय कनाडा में एक और आईसीएस ऑफ़ीसर सीएस वैंकटाचार भारत के उच्चायुक्त थे.

मोरारजी देसाई भी लक्ष्मीकांत झा को काफी मानते थे.

एक दिन काम ख़त्म जल्दी ख़त्म हो जाने के बाद झा और वैंकटाचार ने मोरारजी देसाई को मनाया कि वो एक नाइट क्लब चलें. देसाई ने पहले तो मुँह बनाया लेकिन इन दोनों ने तर्क दिया कि जिन चीज़ों का आप विरोध करते रहे हैं, उनको अपनी आँखों से देख लेने और उनका अनुभव कर लेने के बाद आप बेहतर ढ़ंग से उनका विरोध कर पाएंगे.

आख़िरकार तीनों लोग एक नाइट क्लब में पहुँचे. बैठते ही एक लड़की ने मोरारजी से पूछा आप क्या पीना पसंद करेंगे ? मोरारजी ने बेरुख़ी से जवाब दिया,"मैं शराब नहीं पीता." लड़की ने मोरारजी भाई की गोद में बैठने की कोशिश करते हुए चुहल की, "सो यू वॉंन्ट योर डेम टू बी सोबर." (तो आप चाहते हैं कि आपकी साथी आपके सामने सोबर रहे.)

स्तब्ध मोरारजी देसाई ने लड़की को रफ़ा दफ़ा करते हुए कहा, "मुझे लड़कियाँ पसंद नहीं हैं." इसपर वो लड़की बोली, "तो आप सज्जन पुरुष नहीं हैं." मोरारजी देसाई ने बिना कुछ पिए नाइट क्लब से उठने का फ़ैसला किया और झा और वैंकटाचार को भी बेमन से वहाँ से उठना पड़ा.

‘किशन चंदर’ का फ़ोन

अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर और राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की नीति को कामयाब नहीं होने दिया था लक्ष्मीकांत झा ने.

1971 के भारत पाकिस्तान युद्धके समय वो अमरीका में भारत के राजदूत थे. उन्हीं के ज़माने में अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने चीन की गुप्त यात्रा की थी.

एक दिन एलके अपने निवास से बाहर गए हुए थे. जब वो लौटे तो उनके सुरक्षा गार्ड ने जो एक शब्द भी अंग्रेज़ी का नहीं जानता था, उनसे कहा, "एंबेसडर बहादुर के लिए किशन चंदर जी का फ़ोन आया था."

उन्होंने अपने सचिव से कहा कि गार्ड के पास जो नंबर छोड़ा गया है उस पर फ़ोन मिलाएं. नंबर मिलाते ही दूसरे छोर पर फ़ोन हेनरी किसिंजर ने उठाया. किसिंजर ने उनसे पूछा, "रात साढ़े आठ बजे आप कहाँ होंगे." एलके ने कहा कि वो एक भोज में होंगे.

किसिंजर ने उस जगह का नंबर लिया जहाँ उन्हें भोज पर जाना था और कहा कि ठीक साढ़े आठ बजे मैं आप को फ़ोन करूँगा. झा ने खुद फ़ोन उठाया.

किसिंजर लाइन पर थे, "अब से आधे घंटे बाद राष्ट्रपति निक्सन ये घोषणा करने वाले हैं कि जब मैं भारत और पाकिस्तान की यात्रा पर था तभी मैं बिना बताए चीन भी गया था. राष्ट्रपति चाहते हैं कि आप अपनी प्रधानमंत्री को उनका ये संदेश पहुंचा दें कि अमरीका चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर रहा है और अगर भारत ने इसका विरोध किया तो इसे ग़ैर मित्रता पूर्ण हरकत माना जाएगा."

राष्ट्रपति निक्सन ये मान कर चल रहे थे कि भारत उनके इस फ़ैसले का विरोध करेगा. उनके अनुमान के ठीक विपरीत एल के ने इंदिरा गांधी को सलाह दी कि वो इस फ़ैसले का स्वागत करें और उन्होंने यही किया भी.

मूर्ति कला के पारखी

लक्ष्मीकांत झा रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया में किए गए अपने सुधार कार्यों के लिए भी ख़ासे चर्चित रहे.

अपने आईसीएस साथियों के विपरीत उन्होंने अपने होम काडर बिहार और उड़ीसा में शायद ही कुछ समय बिताया हो. झा का व्यक्तित्व बहुआयामी था.

बहुत कम लोग जानते हैं कि मध्ययुगीन भारतीय मूर्ति कला के बारे में झा जितना जानते थे, कम लोग जानते थे. वो बाल बनाने के ढंग और कपड़ों के डिज़ाइन देख कर बता सकते थे कि मूर्ति किस समय की है.

अपने करियर की शुरुआत में वो अपनी छुट्टियाँ उन पुरातत्व स्थानों में बिताते थे जिनका लोगों ने नाम भी नहीं सुना होता था. वो बहुत ही अच्छे फ़ोटोग्राफ़र थे और उनके पास पुरानी मूर्तियों की तस्वीरों का अच्छा संग्रह था.

लक्ष्मीकांत झा शौकिया होमियोपैथ डॉक्टर भी थे और उनके दोस्तों का मानना था कि बीमारी की पहचान वो एलोपोथिक डॉक्टरों से बेहतर किया करते थे. एलके को शारीरिक कसरत से काफ़ी उलझन होती थी. वो अक्सर मार्क ट्वेन को उद्धत करते थे, "अपने जीवन में अकेली कसरत मैंने उन लोगों की शव यात्रा में चलने में की थी जिनकी पूरी ज़िंदगी कसरत करते हुए गुज़री थी."

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