वंजारा का असली निशाना मोदी नहीं शाह

नरेंद्र मोदी

गुजरात के आईपीएस अधिकारी वंजारा के उन आरोपों का नतीजा क्या होगा, जिनमें उन्होंने कहा है कि उनकी कार्रवाइयां नरेंद्र मोदी सरकार के इशारे पर अंजाम दी गई थीं?

वंजारा, सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल में बंद हैं. गुजरात के अखबारों ने अपनी खोजी पत्रकारिता से दिखाया कि सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी.

बाद में पता चला कि सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर और तत्कालीन गवाह तुलसीराम प्रजापति को भी मार दिया गया था.

उस समय न्यायालय सक्रिय हुआ और इसके बाद अधिकारियों पर आरोप लगे और उन्हें जेल हुई.

वंजारा उस समय गुजरात एंटी टैररिस्ट स्क्वाड (एटीएस) के मुखिया थे और इस पद के लिए मोदी ने खुद उनको चुना था.

'किसके आदेश'

जेल में हताश कर देने वाले छह साल के बाद दिए गए अपने त्यागपत्र में वंजारा ने गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह के सिर ठीकरा फोड़ा है.

वह कहते हैं कि शाह ही हैं जो न्यायालय को दिग्भ्रमित कर रहे हैं और उनकी और जेल में बंद अन्य पुलिसकर्मियों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं, जबकि वे केवल अपनी ड्यूटी बजा रहे थे.

यह सब किए जाने के पीछे शाह की मंशा क्या है? वंजारा कहते हैं कि यह खुद को सुरक्षित करने के लिए है. लेकिन किसके खिलाफ?

यदि वंजारा कहते हैं, जैसा कि उन्होंने अपने पत्र में लिखा है, कि उनकी कार्रवाइयां कानूनी थीं, तो उनके पूर्व बॉस को चिंता करने की क्या जरूरत है?

इसका मतलब है वंजारा कुछ छुपा रहे हैं.

उनकी दलील है कि गुजरात सरकार ने ''जेहादी आतंकवाद'' के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और इसको नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने की नीति अपनायी हुई थी.

Image caption वंजारा के आरोपों से अमित शाह का बच निकलना आसान नहीं है

वह बताते हैं कि मुठभेड़ों (या गैर न्यायिक हत्याओं, अगर हम दूसरा नज़रिया अपनाएं) के पीछे का कारण यही था, जिसके लिए वह जेल में हैं.

जब न्यायालय ने पाया कि ये कार्रवाइयां जारी हैं, पुलिसकर्मी मुश्किल में पड़ गए और राज्य सरकार ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया.

वंजारा कहते हैं कि वह केवल आदेशों का पालन कर रहे थे लेकिन वह यह बताने से इनकार करते हैं कि उन्हें जारी किसने किया था.

तथ्य यह है कि इसके पीछे गुजरात के गृहमंत्री थे और नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने शुरू से ही इस मंत्रालय को अपने पास ही रखा.

हमारे पास कारण हो सकते हैं कि यह शरारत या तो मोदी की जानकारी में नहीं थी (यह दिखाते हुए कि उनके सबसे प्रिय विषय, आतंकवाद, पर उनकी पकड़ कम थी) या जो भी हुआ वह सब उनके संज्ञान में था.

दूसरा मामला उन्हें निश्चित रूप से गवाह बनाने के लिए काफ़ी है और संभवतः इस आपराधिक कृत्य में उन्हें आरोपी बनाता है.

'और होंगे खुलासे'

अभी तक यह मामला केवल अमित शाह तक ही पहुंचा है, जिनका मोदी ने उनके जेल जाने के बावजूद समर्थन किया. शाह फिलहाल जमानत पर हैं.

अपने आदमी के समर्थन में मोदी के खड़े रहने के पीछे हो सकता है कि मुख्यमंत्री को विश्वास हो, जो ठीक ही है, कि जनता उन लोगों पर भरोसा नहीं करती जो इन हत्याओं को नापसंद करते हैं.

Image caption वंजारा की हताशा बढ़ने के साथ ही वह गुजरात एटीएस के बारे में और राज़ खोल सकते हैं.

यह विचार कि, देश में एक न्यायिक प्रक्रिया मौजूद है- जिसे अपनी कार्रवाई करनी है और एक संविधान है- जिसे हर हाल में लागू होना चाहिए, हमेशा ही जल्द नतीजे हासिल करने लिए की जाने वाली मुठभेड़ों के सामने दोयम दर्जे का होता है.

इस हमले के साथ ही वंजारा के असल शिकार अमित शाह होंगे.

हालांकि वर्तमान में शाह भाजपा में मजबूत स्थिति में हैं (उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान के मुखिया हैं). लेकिन वह उलझने से नहीं बच पाएंगे.

उनके खिलाफ आरोप इतने संगीन हैं कि उसे नकार पाना उनके लिए मुश्किल होगा.

जब तक अदालत में चल रहे मामलों में वह बरी नहीं हो जाते तब तक उनके लिए राजनीति की आगे की सीढ़ी चढ़ पाना या मंत्रालय में जगह हासिल कर लेना दूर की कौड़ी होगी.

उनके लिए दूसरी समस्या है वंजारा का त्यागपत्र (गुजरात सरकार ने जिसे अस्वीकार कर दिया है) और उनका इस बात के लिए स्वतंत्र होना कि वह आगे भी कोई खुलासा कर सकेंगे.

उनकी हताशा जितनी बढ़ती जाएगी, गुजरात एटीएस- जो बहुत छोटा हो चुका है- के अन्य कारनामों के बारे में हमें और जानकारियां मिल सकेंगी.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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