प्रधानमंत्री पद पर मोदी का बयान दांव है या निराशा?

Image caption प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाने में हो रही देरी से तंग आकर मोदी ने दी धमकी.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा नेतृत्व को अल्टीमेटम दे दिया है. लगता है कि पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के नाम की घोषणा में देरी और इस मुद्दे पर कुछ नेताओं के विरोध से आजिज आकर नरेन्द्र मोदी ने एक तरह से कह दिया है कि पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार जिसे चाहे चुन ले. वे इस पद के लिए उपलब्ध नहीं है.

गांधीनगर में शिक्षक दिवस पर राज्य के शिक्षकों को सम्मानित करने के कार्यक्रम में एक बच्चे ने सवाल किया कि क्या 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके सवालों का जवाब देने आएंगे. मोदी ने कहा कि वे जीवन में कभी कुछ बनने का सपना नहीं देखते.

प्रधानमंत्री पद का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि जो ऐसा सपना देखते हैं वे बर्बाद हो जाते हैं. वे कुछ बनने का नहीं कुछ करने का सपना देखते हैं.

सबसे अहम बात मोदी ने इसके बाद कही. उन्होंने कहा कि गुजरात की जनता ने उन्हें 2017 तक प्रदेश की सेवा करने का काम दिया है. इसे पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है.

यह पहली बार है कि मोदी ने प्रधानमंत्री पद के मुद्दे पर इस तरह का जवाब दिया है. अभी तक उनसे जब भी यह सवाल पूछा गया वे इसे टाल गए.

2012 में गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने इतने साफ तौर पर ऐसी बात नहीं कही थी कि वे अपने को गुजरात तक सीमित रखना चाहते हैं.

उनके इस कथन को पार्टी और संघ परिवार को धमकी के रूप में भी देखा जा सकता है.

संघ की बैठक से पहले कही बात

Image caption शिवराज सिंह चौहान संघ प्रमुख से मिलकर मोदी के नाम की घोषणा अभी नहीं करने की गुहार लगा चुके हैं.

नरेन्द्र मोदी की बात ही नहीं उसका समय भी महत्वपूर्ण है. आठ और नौ सितम्बर को दिल्ली में संघ परिवार के वरिष्ठ पदाधिकारियों और भाजपा के नेताओं की की बैठक होने वाली है.

इसमें कुछ और अन्य मुद्दों के अलावा मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का भी फैसला होने वाला है. इस बैठक की तैयारी के तौर पर संघ के वरिष्ठ नेता भैय्या जी जोशी लालकृष्ण आडवाणी से मिल चुके हैं.

उस बैठक में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी मौजूद थीं. मुद्दा मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का था.

सुषमा स्वराज का कहना था कि यदि इस समय मोदी की उम्मीदवारी की घोषणा हुई तो उनके लिए संसद में विपक्ष के नेता के तौर पर काम करना कठिन हो जाएगा.

आडवाणी का कहना था कि इस बारे में कोई फैसला चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद होना चाहिए.वरना नरेन्द्र मोदी ही मुद्दा बन जाएंगे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरसंघ चालक मोहन भागवत से मिलकर यही बात कह चुके हैं.

सुनने में ये तर्क जितने निरापद लगते हैं उतने हैं नहीं. भाजपा संसदीय दल में मोदी के नाम का विरोध करने वाले तीन सदस्य हैं. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज.

जोशी ने विरोध का रास्ता छोड़ा

मुरली मनोहर जोशी संघ के नेताओं से अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं. पर संघ की सलाह पर उन्होंने विरोध का रास्ता छोड़ दिया है. बाकी दो नेता किसी भी हालत में मोदी के नाम की घोषणा को रोकना चाहते हैं.

उनकी नई रणनीति अब सीधे विरोध की बजाय किसी न किसी बहाने इस फैसले को टलवाते रहने की है. मोदी समर्थकों को यह बात समझ में आ रही है कि उनका रास्ता इतना आसान नहीं होगा.

इसीलिए राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने कहा कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम पर किसी तरह का विवाद लोकसभा चुनाव में भाजपा को हिट विकेट आउट कर सकती है.

Image caption संघ में मोदी के नाम पर आमराय नहीं है. यही बात आडवाणी और सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी ताकत है.

संघ में मोदी के नाम पर आमराय नहीं है. यही बात आडवाणी और सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी ताकत है.

मोदी विरोधियों की बांछें खिली

आडवाणी और सुषमा स्वराज की उम्मीद को हवा मोदी विरोधियों की हर कार्रवाई से मिलती है. गुजरात के आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा के पत्र से सारे मोदी विरोधियों की बांछें खिली हुई हैं.

उन्हें लग रहा है कि मोदी को घेरने का रास्ता खुल गया है. कांग्रेस को लग रहा है कि वंजरा के पत्र से डर कर मोदी ने यह बयान दिया है.

पार्टी के अंदर भी उनके विरोधी इससे खुश हैं. उनका तर्क है कि इसी तरह खुलासे होते रहे तो मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना जोखिम भरा हो सकता है.

यह मोदी की उम्मीदवारी रोकने का एक नया बहाना बन सकता है. इसलिए पहली बार मोदी ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए अपने नाम की घोषणा के लिए सार्वजनिक रूप से दबाव बनाया है.

ऐसे में पार्टी और संघ परिवार के लिए इस मुद्दे पर मोदी के पक्ष या विरोध में किसी फैसले को और टालना कठिन होगा.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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