आख़िर क्यों हैं मुज़फ़्फरनगर में तनाव?

कवाल गाँव
Image caption हिंसक घटना में तीन युवकों की मौत के क़रीब दो हफ़्ते बाद भी कवाल गाँव में सन्नाटा पसरा है

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में तीन युवकों की हत्या के बाद से सांप्रदायिक तनाव व्याप्त है. हिंदू और मुसलमान समुदायों के इन युवकों के परिजनों ने शांति बनाए रखने की अपील की है.

पुलिस के अनुसार धार्मिक स्थलों एवँ घरों में तोड़फोड़, वाहनों में आगज़नी और लोगों के साथ मारपीट, एक यात्री को ट्रेन से फेंकने जैसी घटनाओं ने तनाव को और बढ़ा दिया है. पड़ोसी ज़िले शामली में भी हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई है.

गुरुवार को जब बीबीसी की टीम मुज़फ़्फ़रनगर पहुँची तो यहाँ तनावपूर्ण शांति बरक़रार थी. गाँवों, क़स्बों एवँ शहरों में दुकानें बंद थी और रास्तों पर लोग कम ही नज़र आ रहे थे. शायद ये भाजपा के बंद के आह्वान का असर था.

यूपी पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (क़ानून व्यवस्था) राजकुमार विश्वकर्मा स्वयं मुज़फ़्फ़रनगर में मौजूद थे. उन्होंने कहा, ''हमारी पूरी कोशिश है कि सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे. एक घटना हुई थी जो कि पूर्व नियोजित नहीं थी. इसकी प्रतिक्रिया में हुई घटना के बाद जो नफ़रत की भावनाएं पैदा हुईं वे नहीं होनी चाहिए थीं.'' शुक्रवार को यूपी के डीजीपी देव राज नागर भी मुज़फ़्फरनगर पहुँच गए.

सन्नाटा

सुनसान सड़कें, दरवाज़ों पर लगे ताले, घरों के अंदर पड़ा हुआ टूटा सामान और कुछ जली हुई गाड़ियाँ युवकों की मौत के बाद हुई तोड़फोड़ की गवाही दे रहीं थी. कवाल गाँव में चप्पे-चप्पे पर पुलिस और पीएसी तैनात थी. कवाल ही वह गाँव हैं जहाँ युवकों की हत्या हुई थी.

कस्बे जानसठ से करीब तीन किलोमीटर दूर बसे कवाल गाँव की क़रीब पंद्रह हज़ार की आबादी में हिंदू और मुसलमान लगभग बराबर की तादाद में हैं. यहाँ कई जातियों के हिंदू और मुसलमान हमेशा से मिलजुलकर रहते आए हैं. लेकिन अब कवाल गाँव में सन्नाटा पसरा था और बहुत कम ही लोग नज़र आ रहे थे.

सेवानिवृत्त शिक्षक जबर सिंह ने अपना पूरा जीवन यहीं बिताया है. वे मानते हैं कि इस इलाक़े में इतने बुरे हालात कभी नहीं रहे.

निर्मम हत्या

जबर सिंह कहते हैं, ''युवको की निर्ममता से हत्या होने के कारण लोग आक्रोश में हैं, यदि उनकी गोली मारकर हत्या की गई होती तो भी शायद लोग इतने न भड़कते. पुलिस ने पक्षपात करते हुए हिंदू युवकों के परीजनों के ख़िलाफ़ ही एफआईआर दर्ज कर ली. यह अन्याय है.''

बहुसंख्यक समुदाय को लग रहा है कि अखिलेश यादव की सरकार उनके साथ नाइंसाफ़ी कर रही है. घटना की जाँच कर रहे तत्कालीन एसएसपी और डीएम के तबादले को भी बहुसंख्यक समाज इसी रूप में देख रहा है.

फ़र्ज़ी वीडियो, विधायक पर केस

एक युवक ने अपने सस्ते चाइनीज़ मोबाइल पर एक वीडियो दिखाते हुए कहा कि देखिए कितनी बेरहमी से दोनों युवकों को मारा गया है. सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के ज़रिए शेयर किया गया ये वीडियो लोगों के मोबाइल में पहुँच गया और इसे शेयर किया जाने लगा. पुलिस जाँच में फ़र्ज़ी पाए गए इस वीडियो को शेयर करने के लिए एक भाजपा विधायक सहित कई लोगों पर मामला दर्ज किया गया है. हालाँकि युवा ये मानने को तैयार नहीं थे कि ये वीडियो फ़र्ज़ी है.

Image caption मँगराम मुज़फ़्फरनगर जाकर मज़दूरी करते थे. तनाव के कारण वे नहीं जा पा रहे हैं. अब अख़बार पढ़कर वक़्त बिता रहे हैं

58 वर्षीय मँगराम ने पूरा जीवन इसी गाँव में गुज़ारा है. मँगराम मानते हैं कि यदि हत्या की वारदात के बाद प्रशासन ने उचित कार्रवाई करते हुए इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया होता तो शायद लोगों की भावनाएँ न भड़कती.

ख़ौफ़

कवाल गाँव की मस्जिद के इमाम क़ारी मोहम्मद औसाफ़ क़ासमी ने आरोप लगाया कि युवकों का अंतिम संस्कार करके लौट रही भीड़ ने 28 अगस्त को धार्मिक स्थलों और घरों में तोड़फोड़ की. ख़ौफ़ में आए मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर जा चुके हैं और अब तक नहीं लौटे हैं. पुलिस ने इस हिंसा के मामले में गाँव के पूर्व प्रधान को गिरफ़्तार भी किया है.

अपना पूरा जीवन कवाल गाँव में ही बिताने वाले 72 साल के निसार अहमद ने भी पहली बार अपने गाँव में इस तरह का तनाव देखा है.

वे कहते हैं, ''दो लोगों के बीच की इस निजी लड़ाई को बाहरी लोगों के कारण सांप्रदायिक रूप दे दिया गया. युवकों के अंतिम संस्कार के बाद भीड़ शांतिपूर्वक तरीक़े से गुज़र रही थी लेकिन कुछ लोगों ने तोड़फोड़ शुरू कर दी. वे मेरे घर की खिड़की तोड़ रहे थे तब हिंदू समाज के लोगों ने ही उन्हें रोका.''

Image caption अल्पसंख्यक समुदाय के ज़्यादातर घरों में ताले जड़े हैं. कुछ घरों में तोड़फोड़ भी की गई है.

अपील

हम कवाल से होते हुए मलिकपुरा गाँव गए. मारे गए युवक इसी गाँव के रहने वाले हैं.

गौरव के पिता रविंद्र सिंह ने भर्राई आवाज़ में कहा, ''हमारा आम आवाम से कोई झगड़ा नहीं है, हम नहीं चाहते की ख़ूनख़राबा हो या कोई नाहक़ मारा जाए. हमारे बच्चों की लाशें पड़ी थी और हम लोगों से ग़ुस्से पर क़ाबू करने की अपील कर रहे थे. हमने कहा कि जो हमारे साथ होना था हो गया. जो हमारे बच्चे मर गए वे मर गए, अब कहीं और किसी बेगुनाह को मारने-मरवाने से क्या होगा? शांति में ही सबका फ़ायदा है."

Image caption रविंद्र का कहना है कि वे नहीं चाहते कि उनके बेटे की मौत के नाम पर हिंसा हो

रविंद्र सिंह कहते हैं कि लोगों के ग़ुस्से की मुख्य वजह उनके परिवार के सात लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया जाना है. वे कहते हैं कि शुरू में जाँच कर रहे अधिकारियों ने न्याय का भरोसा दिया था लेकिन उनका तबादला कर दिया गया.

सरकारी फ़ैसला?

Image caption एडीजी क़ानून व्यवस्था राजकुमार विश्वकर्मा ने भरोसा दिया है कि किसी भी बेगुनाह को गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा

हालाँकि एडीजी(क़ानून व्यवस्था) तबादले को सरकारी फ़ैसला भर मानते हैं. वे कहते हैं, "यह सिर्फ़ एक आकस्मिक घटना थी. युवक गए और उनकी आपस में तकरार हुई जिसके बाद हत्या हुई और उसकी प्रतिक्रिया में दो हत्याएँ हुईं. इसे सांप्रदायिक रूप दिया जाना और इसके बाद लोगों के मन में पैदा हुई नफ़रत दुखद है."

एफआईआर में मारे गए युवकों के परिजनों का नाम होने पर वे कहते हैं, ''हम यह भरोसा देते हैं कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा और जो लोग वारदात में लिप्त थे वे हर हाल में गिरफ़्तार होंगे.''

एडीजी भले ही अधिकारियों के तबादलों को सरकारी फ़ैसला बता रहे हैं, वारदात के बाद हुई हिंसा को हत्याकांड में गिरफ़्तारियाँ न होने की वज़ह मानते हों लेकिन जनता में गुस्सा इसी बात को लेकर है.

बहुसंख्यक समाज में आम भावना यह है कि प्रशासन ने एकतरफ़ा कार्रवाई की है. समूचे ज़िले में हालात तनावपूर्ण हैं और कवाल में हुई घटना की आग पड़ोसी ज़िले शामली तक पहुंच गई हैं जहाँ माहौल मुज़फ़्फरनगर जैसा ही तनावपूर्ण हो गया है.

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