आरटीआई में कहाँ तक सवालों का जवाब देंगी पार्टियाँ: शकील अहमद

Image caption स्थाई समिति की राय जानने के बाद विधेयक पेश किया जाएगा.

राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए संसद में इससे जुड़ा संशोधन विधेयक पेश नहीं हो सका है.

सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शकील अहमद का कहना है कि राजनीतिक दलों का वित्तीय मामला आरटीआई के दायरे में है लेकिन अन्य गतिविधियों को इसके दायरे में लाना व्यवहारिक नहीं है.

उन्होंने कहा कि पार्टियां किसको टिकट देती हैं, किसको अपना अध्यक्ष बनाती हैं, ये सब उनका अपना मसला है.

शकील अहमद ने कहा, "मैं साल 2009 में लोकसभा चुनाव हार गया था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष ने मुझे पार्टी का प्रवक्ता बनाया. कई राज्यों का प्रभारी बनाया, ऐसे में कोई भी आरटीआई के जरिए यह सवाल पूछ सकता है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनाव जीतने वाले 207 सांसदों में किसी और को क्यों नहीं पार्टी का प्रवक्ता बनाया. इसी तरह कोई भाजपा में नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने जैसे सवाल आरटीआई के जरिए पूछ सकता है, जिनका जवाब देना पार्टिंयों के लिए संभव नहीं है.

'व्यवहारिक नहीं'

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि लोगों में ऐसी धारणा बन रही थी कि राजनीतिक दल वित्तीय लेन-देन को छिपाने के लिए संशोधन विधेयक पेश नहीं कर रहे. ऐसे में यह तय हुआ कि स्थाई समिति की राय जानने के बाद विधेयक पेश किया जाएगा.

बीबीसी से बातचीत में अहमद ने कहा, ''वित्तीय लेन-देन को छिपाने का सवाल ही नहीं हैं, क्योंकि हर पार्टी को वार्षिक लेन-देन के आंकड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट से ऑडिट करवाकर निर्वाचन आयोग के पास जमा करवाने पड़ते हैं. यह सभी दलों के लिए अनिवार्य है.निर्वाचन आयोग इसके बाद अपनी वेबसाइट पर इसे डालता है. कोई भी आदमी आरटीआई के जरिए इस जानकारी को हासिल कर सकता है. यह आरटीआई के अंदर है.इसलिए सरकार और राजनीतिक दलों के बीच एक सहमति बनी है कि इस मसले को स्थाई समिति के पास भेजकर उसकी राय जानने के बाद आगे की कार्रवाई की जाय.

मुख्य सूचना अधिकारी (सीआईसी) के फैसले के बाद इस मामले में संशोधन की ज़रूरत पर अहमद ने कहा कि सीआईसी ने जो फैसला दिया वह व्यवहारिक नहीं है.

उनका कहना था कि राजनीतिक दलों के लिए वित्तीय मामला छिपाने का सवाल नहीं है बल्कि राजनीतिक दलों के अपने संगठन से जुड़े फैसलों से जुड़ा है.

कोई भी राजनीतिक दल चंदे के रूप में 20 हज़ार से अधिक की राशि नकद नहीं ले सकता. अगर वह ऐसा करता है तो उसके ख़िलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है.

शकील अहमद ने कहा, "जो लोग इस दिक्कत को समझते थे वे इस संशोधन को सही मान रहे हैं लेकिन कुछ लोग यह सोचते थे कि वित्तीय लेन-देन को इसके दायरे में लाने की बात हो रही है, उनको इससे अवगत कराने और जनता के बीच राजनीतिक दलों के खिलाफ़ संदेश न जाए, इसको देखते हुए मामले को स्थाई समिति को भेजने का फैसला किया गया है."

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