हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता

Image caption अमीर खुसरो का काल्पनिक चित्र. उन्होंने 'तुग़लकनामा' और 'नुह सिफ़िर' जैसी रचनाएं कीं.

अपनी पसंद की एकमात्र कविता को चुन पाना बड़ा मुश्किल और जोख़िम भरा काम है. वह इसलिए भी कि ऐसी कोई स्थिति आने पर पसंद की ढेरों कविताएं बरबस याद आने लगती हैं.

फिर भी अपनी पसंद की चुनिंदा दसेक कविताओं में से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व अमीर ख़ुसरो द्वारा लिखा गया अमरगीत ‘काहे को ब्याही बिदेस’ को याद कर रहा हूं जिसकी कई मार्मिक और जीवन से बड़ी होती जाती पंक्तियां हर बार पढ़ने पर रोमांच से तो भरती ही हैं, कहीं अन्दर से भिगो भी डालती हैं.

काहे को ब्याही बिदेस

अरे लखिया बाबुल मोरे

मुख्य रूप से हमारे समाज में बेटियों की स्थिति को लेकर उनके ब्याह के बहाने रचा गया विदा का गीत, दरअसल हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी ऐसा सामयिक पाठ है जो शायद दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लिखे जाने के बाद, आज इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भी अपनी स्फटिक गरिमा में अक्षरश: प्रासंगिक नज़र आता है.

ख़ुसरो की कविता में जो चीज़ प्रमुखता से उभरकर सामने आती है, वह है उनका जीवन से आत्मीय संवाद का ढंग जहां भाषा और साहित्य, संगीत और कलाएँ एवं न जाने ऐसी कितनी अनिर्वचनीय स्थितियाँ अपने वज़ूद का रूपाका पाने के लिए मौजूद हैं.

‘काहे को ब्याही बिदेस’ भी इसी चलन पर घर से परायी हो रही स्त्री की ऐसी करुण पुकार का आख्यान है, जिसमें माँ-बाप, भाई, घर-आँगन, महल-डोला, नीम का पेड़ भी उपस्थित हैं, मगर उस लड़की का वजूद जैसे अपनी घर की देहरी से ही तिरोहित होने के लिए विवश है.

भारतीय परंपरा में विवाह के बाद दूसरे घर में बस जाने की जो अनिवार्य शर्त टँकी हुई है, उसमें ख़ुसरो इतने समय पहले ही उसके अंतर्विरोधों की ओर देख लेते हैं जो उनकी लेखनी से बिल्कुल नेज़े की धार पर व्यक्त हुआ है.

भइया को दीनो बाबुल

मगला दुमहला

हमको दियो परदेस

आज जब भारतीय समाज में बेटे और बेटी के समान अधिकारों के तहत अपनी ज़मीन-ज़ायदाद में ब्याहता पुत्री को भी बराबर का हिस्सा देने की सार्थक स्थिति रची जा चुकी है, तब यह गीत एकबारगी हैरान करता है कि कैसे साहित्य की कचहरी में बेटियों का यह मुक़दमा हज़ार साल पहले अमीर ख़ुसरो ने लड़ा था. ठीक इसी समय उस सयानी हो चुकी बेटी के बचपन और युवावस्था का मार्मिक चित्रण भी देखने लायक है, जिसमें स्त्री-पुरुष विभेद को समाज का जैसे एक स्वीकार लिया गया नियम माना जाता है.

Image caption बहुचर्चित फिल्म 'उमराव जान' में अमीर ख़ुसरो की इस कविता को टाइटल गीत के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ

घर-घर माँगी में जाएँ

हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गइयाँ

जित बाँधो तित जाएँ

हम तो बाबुल तोरे पिंजड़े की चिड़ियाँ

कुहुक-कुहुक रट जाएँ.

इस मर्मस्पर्शी पंक्तियों के साथ कुछ दूसरी पंक्तियाँ भी इसी गीत की पढ़ने लायक हैं जो पाठ-भेद के साथ मिलती हैं. यह क़ाबिलेग़ौर पंक्तियाँ इस तरह हैं –

ताँतों भरी मैंने गुड़िया जो छोड़ी

छूटा सहेलन का साथ

निमिया तले मोरा डोला जो उतरा

आया बलम जी का गाँव

अगर अभिधा वाले अर्थ से अलग हटकर हम इसमें कुछ व्यंजना ढूँढना चाहें तो आसानी से उस रहस्यवाद की ओर ताक सकते हैं, जो इश्क़ और माशूक़ के बहाने जीव और परमात्मा की बात करता है. फिर इसमें यदि ख़ुसरो का रंग मिला हो तो यह उसी सूफ़ियात की ओर इशारा करता है जिसमें उनके पीर-ओ-मुर्शिद निज़ामुद्दीन औलिया जैसे योग्य गुरु के साथ आत्मीय सामंजस्य मौजूद है.

शायद इसीलिए सूफ़ियों के यहाँ कविता और संगीत के बहाने अपने स्व को तिरोहित करने का भाव भी रचा जाता रहा है. आप यदि ’काहे को ब्याही बिदेस लखिया बाबुल मोरे’ पढ़ते हुए ख़ुसरो के प्रेम में डूबते हैं, तो आपको उनकी कुछ अन्य कविताएँ, कव्वालियाँ एवं गीत, मसलन ‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो री’, 'बहुत रही बाबुल घर दुलहिन चल तेरे पी ने बुलाई’, ‘छाप तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिलाय के’, ‘निज़ाम तोरी सूरत पे बलिहारी’ एवं ‘जो पिया आवन कह गये अजहुँ न आए’ अवश्य पढ़नी चाहिए.

(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)

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