भारत की 'गणपति' मंडी जहाँ की मूर्तियाँ अमरीका तक जाती हैं

  • 9 सितंबर 2013
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मुंबई में 600 से ज़्यादा पंडालों में अगले दस दिन तक एक ही नारा गूंजेगा- 'गणपति बप्पा मोरया'.

ढोल-नगाड़े लिए गणपति के भक्त इस पर्व का पूरे साल इंतज़ार करते हैं.

गणेशोत्सव के ख़ास रंग महाराष्ट्र में ही देखे जाते हैं, जहाँ इस उत्सव के दसवें दिन गणेश की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है.

पिछले साल इस समारोह के अंत में दो लाख से ज़्यादा गणेश मूर्तियों को जल में विसर्जित किया गया था.

सवाल उठता है कि आख़िर कहाँ से आती हैं 'गणेश' की इतनी मूर्तियां?

मुंबई-पुणे के बीच बसे गाँव पेण को भारत का सबसे बड़ा कला केंद्र कहा जाता है. यहाँ राजा-महाराजाओं के दौर से मूर्तियों का काम हो रहा है.

इस छोटे से गाँव की हर गली में मूर्ति के कई कारखाने हैं. पेण में बनी मूर्तियां भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक जाती हैं.

पुश्तैनी कारखाना

यहाँ बनती हैं छह इंच की नन्हीं मूर्ति से लेकर 12 फीट की विशाल गणेश मूर्तियां. इनकी कीमत 100 रुपए से लेकर 75 हज़ार रुपए तक होती है.

पेण में मूर्तिकारों की एक गली कौसर औली में अनिल दिवाकर डेरे का पुश्तैनी कारखाना है. अनिल के पिता से लेकर उनके बेटे अभिषेक तक सभी गणेश मूर्तियों का कारोबार करते हैं.

अनिल ने बताया कि पेण में राजा देवधर के समय से मूर्तियों का काम हो रहा है. इस गाँव में यही कमाई का सबसे बड़ा साधन है.

कई परिवार गणपति की इन मूर्तियों को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाते आ रहे हैं.

अनिल कहते हैं, "जैसे-जैसे गणेशोत्सव की तारीख पास आती है, इन कारखानों पर दबाव बढ़ता जाता है क्योंकि ग्राहक अपने ऑर्डर लेने आते हैं. इस दौरान मूर्तिकारों का दिन सुबह आठ बजे से लेकर देर रात दो बजे तक चलता है."

अनिल कहते हैं कि पेण के गणपति इतने मशहूर हैं कि यहाँ गणेशोत्सव के अगले दिन से ही अगले साल की तैयारियां शुरू हो जाती हैं.

30 करोड़ का कारोबार

पेण के मूर्ति बाज़ार से गणेश की कई मूर्तियां इंग्लैंड, अमरीका, मॉरीशस और दूसरे देशों तक जाती हैं.

भारत में मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर और गुजरात के कई शहरों में यहाँ की मूर्तियों को ले जाया जाता है.

अनिल ने कहा, "150 से ज्यादा कारखानों वाले इस गाँव में सालाना 25 से 30 हज़ार मूर्तियां बनती हैं. हमारा साल भर का लगभग 30 करोड़ रुपए का धंधा है."

उनके मुताबिक़ मुंबई जैसे बड़े शहरों के कई थोक विक्रेता एडवांस में ऑर्डर देते हैं और जैसे-जैसे गणेश चतुर्थी पास आने लगती है, वे टेम्पो भरकर पेण से अपना सामान ले जाते हैं.

40 से 50 फ़ीसदी बचत का मार्जिन रखकर काम करने वाले ये मूर्तिकार पूरे साल गणेश की मूर्तियाँ बनाने में लगा देते हैं.

'बैंक की नौकरी छोड़ी'

इस कारोबार से प्रभावित सतीश समेण ने अपनी बैंक की नौकरी छोड़ इस व्यवसाय को अपनाया.

सतीश का पूरा परिवार अब पेण में कारखाना चलाता है, जिसमें उनकी पत्नी सुजाता और उनके बेटे मिलकर काम करते हैं.

सतीश कहते हैं, "मैं अपनी बैंक की नौकरी के साथ मूर्तियाँ बनाता था, लेकिन देखा कि गणपति की मूर्ति के बिज़नेस में ज़्यादा पैसा है. मैंने सोचा कि क्यों न यही बिजनेस करूं."

पेण के आसपास कई गाँव हैं, जो अब पेण से उसका बिज़नेस खींच रहे हैं लेकिन पेण की खासियत है उसकी कारीगरी.

सतीश बताते हैं, "गणपति की मूर्ति में सबसे ख़ास बात होती है गणेश की आँख का काम, वो पेण जैसा कहीं नहीं होता. गणपति पर रंग करने की कला पेण से अच्छी कहीं नहीं है."

दूर-दूर से ऑर्डर

सतीश की पत्नी सुजाता कहती हैं, "सिनेमा और टीवी के ज़रिए अब गणेशोत्सव को लोग महाराष्ट्र के बाहर भी जानने लगे हैं. हमारे पास अब कर्नाटक से भी ऑर्डर आते हैं."

इस साल पेण में बिकने वाली मूर्तियों के रेट में 15 से 20 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है. इसका कारण है बिजली और डीज़ल के बढ़ते दाम, कारीगरों की कमी और मूर्ति सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी.

फिर भी पेण के मूर्तिकारों को विश्वास है कि उनका यह छोटा सा उद्योग केंद्र आने वाले कई साल तक भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहेगा.

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