दिल्ली गैंगरेप: फ़ैसले की घड़ी आज

  • 10 सितंबर 2013
दिल्ली गैंगरेप, बलात्कार कांड, 16 दिसंबर, बलात्कार पीड़ित, फ़ैसला

नौ महीने बीत चुके. 16 दिसंबर को 'निर्भया' के साथ हुए जघन्य सामूहिक बलात्कार के लिए अभियुक्तों को सज़ा सुनाने का समय आ गया है۔

जो भी सज़ा उन्हें मिलेगी, हमें कम लगेगी۔

असल में सज़ा काफ़ी नहीं है- उसके साथ क़ानून में व्यापक बदलाव आए, तभी न्याय की नींव रखी जा सकती है.

जिस तरह अभियुक्तों में शामिल एक नाबालिग़ को केवल तीन वर्ष सुधार गृह में रखने का फ़ैसला सुनाया गया है, उसे देखते हुए कोई बड़ी उम्मीद नहीं जगती.

अगर इतने जघन्य अपराध के लिए भी क़ानून बालिग़ की परिभाषा बदलने की पहल नहीं कर सका तो कुछ और बदल पाएगा, यह उम्मीद जन्म से पहले ही दम तोड़ देती है.

जब देश की राजधानी में यह कांड हुआ तो उसके ख़िलाफ़ इतना ज़बरदस्त जनरोष उभरा कि एकबारगी मन में उम्मीद जगी अब बहुत कुछ बदल जाएगा, सत्ता हिल जाएगी, बलात्कार के अपराधियों के लिए सख्त क़ानून बनेंगे, जिनका सख्ती से पालन किया जाएगा. यूँ कि उसके बाद सामूहिक बलात्कार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

पर वैसा कुछ नहीं हुआ. काफ़ी समय तक हम यही सोचकर गौरवान्वित और सन्तुष्ट होते रहे कि ऐसा सावर्जनिक और व्यापक विरोध प्रदर्शन पहले कभी नहीं देखा गया था कि उसने हर अधिकारी और सत्ताधारी के भीतर अपराध बोध जगा दिया था.

क्रांतिकारी बदलाव?

यूँ कि अब बस क्रांतिकारी बदलाव आने ही वाले थे. हमने सोचा कि अब बलात्कार के केस की एफ़आईआर तुरंत दर्ज होगी; शिकायतनामा जल्द और संवेदनशील तरीके से अदालत में पहुँचेगा; अदालत क़ानून की संवेदनशील व्याख्या करेगी और अपना फ़ैसला शीघ्रतिशीघ्र सुनाएगी.

पर जिस तरह विरोध प्रदर्शन के साथ साथ दिल्ली समेत सभी छोटे बड़े शहरों में सामूहिक बलात्कार होते रहे; पुलिस का रवैया पहले जैसा क्रूर और नाकारा बना रहा; सत्ताधारी अक्षम्य बयान देकर बलत्कृत स्त्रियों-बालिकाओं को बलात्कार के लिए दोषी ठहराते रहे; उसके मद्देनज़र हर नई उम्मीद ख़ुद-ब-खुद मरती चली गई.

मैंने उसी समय कुछ अप्रिय सत्यों की तरफ़ इशारा करके लिखा था कि अगर निम्नलिखित हुआ होता, तो हम कुछ बदलाव की आशा कर सकते थे. मसलन अगर दो चार वीआईपी भी कहते कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था ज़रूरत से ज़्यादा है और उसे कम करके जनता के कमज़ोर तबकों की सुरक्षा बढ़ा दी जाए.

अगर दिल्ली के पुलिस अधिकारी प्रदर्शनकारियों से संवेदना के साथ पेश आते और उन पर लाठियाँ और अश्रु गैस बरसाने के बजाय उनसे बात करते और जाँच की गति बढ़ा देते.

अगर उन लोगों के ख़िलाफ़, जो बलत्कृत स्त्रियों को दोषी ठहराकर, बलात्कार को स्वाभाविक सिद्ध कर रहे थे, बलात्कार को बढ़ावा देने के अपराध के लिए कार्रवाई की जाती.

उम्मीद?

अगर क़ानूनविद एक स्वर में कहते कि सामूहिक तथा हिंसक बलात्कार के लिए क़ानून में उसी तरह अधिक कड़ी सज़ा का प्रावधान होना चाहिए, जैसे पूर्वनियोजित हत्या तथा यंत्रणासहित हत्या के लिए, औचक की गई हत्या से ज़्यादा कड़ी सज़ा दी जाती है.

नाबालिग़ होने से ही हिंसक बलात्कार को कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए. जब इनमें से कोई प्रतिक्रिया उभरकर सामने नहीं आई तो उम्मीद खामख़्याली बनकर रह गई.

इस समय जो सवाल मुँह बाये हमारे सामने खड़ा है, वह यह है कि ऐसे हिंसक बलात्कार की सज़ा क्या होनी चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप शिकार की मौत हो जाए? और उसकी सज़ा क्या हो, जिसका प्रयोजन ही हत्या रही हो?

सज़ा का प्रावधान

सामूहिक बलात्कार, एकल बलात्कार से उसी तरह भिन्न है जैसे अचानक की गई हत्या, पूर्वनियोजित हत्या से. फिर जब बलात्कार के साथ हत्या भी हो तो सज़ा वही दी जानी चाहिए जो पूर्वनियोजित हत्या के लिए दी जाती है.

या शायद उससे ज़्यादा, क्योंकि उसमें यंत्रणा भी शामिल रहती है. और पूरे विश्व में टॉर्चर के लिए अलग सज़ा का प्रावधान है.

इस प्रक्रिया में कुछेक महीनों या वर्षों से बालिग़ होने में समय रहने को लेकर सज़ा को कम करना, पूरी तरह से नाइंसाफ़ी ही मानी जाएगी. इस नाइंसाफ़ी का ऐलान सरकार पहले ही कर चुकी है.

तब भला उससे न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती है. जब सब कुछ धीमी गति से चल रहा था तो नाबालिग़ को बरी करने में इतनी गतिशीलता क्यों दिखलाई गई? मन्तव्य स्पष्ट है कि बलात्कारियों के लिए कड़ी सज़ा की उम्मीद रखना सरासर ग़लत है.

तब हम इसके सिवा क्या कह सकते हैं कि 'निर्भया' के पक्ष में जो जनरोष उभरा था, उसे असफल क्रांति का दर्जा ही देना होगा. या अब भी अदालत से कोई आशा की जा सकती है? और आने वाले समय में क़ानून बनाने वाली सरकार से? काश ऐसा कुछ हो पाए! पर काश हो पाए कहने से कुछ होता नहीं है, हम सब जानते हैं. इसलिए हमें आने वाले दिनों में संघर्ष करते रहने के लिए तैयार रहना होगा.

(यह साहित्यकार के निजी विचार हैं)

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