मुज़फ़्फ़रनगर: दंगे के बीच भरोसे का गाँव!

घासीपुरा गाँव, मुज़फ़्फ़रनगर

घासीपुरा भी मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले का ही एक गांव है, मगर पूरे ज़िले से एकदम जुदा. पूरे मुज़फ़्फ़रनगर में जहां सांप्रदायिकता की आग फैली हुई है, वहीं इस गांव ने इसकी आंच को अपनी सरहदों तक न आने देने का फ़ैसला किया.

गांव की गलियों और नुक्कड़ पर खड़े लोगों के बीच चर्चा हो रही है. एक-दूसरे से फुसफुसाहट भरे लहज़े में लोग बातें कर रहे हैं. मगर इस चर्चा में षड्यंत्र नहीं, चिंता घुली है कि कैसे फ़िज़ां में घुली नफ़रत से लड़ा जाए. कैसे अपने नौजवानों को इस आग से दूर रखा जाए.

रविवार रात जब इलाक़ा हिंसा की आग में जल रहा था तो गाँव के 80 वर्षीय बुज़ुर्ग देवराज सिंह ने अपने घर पर गांव के लोगों को बुलाया. उनकी बात सभी गाँव वाले मानते हैं. पंचायत में फ़ैसला हुआ कि अगर गाँव का कोई शख़्स किसी तरह की हिंसा में शामिल पाया गया, तो उसे पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा और गांव का कोई आदमी उसकी ज़मानत नहीं कराएगा.

मुज़फ़्फ़रनगर के शिव चौक, खालापुर, मीनाक्षी चौक और दूसरे इलाक़ों का दौरा करने के बाद जब मैं दिल्ली की ओर निकले तो नेशनल हाइवे पर भी सन्नाटा पसरा था.

Image caption लोगों को भरोसा है कि उनके गाँव के बुज़ुर्ग माहौल को ख़राब नहीं होने देंगे.

मेरठ की ओर क़रीब 11 किलोमीटर चलने के बाद हम घासीपुरा गाँव में थे. यहाँ कुछ दुकानें खुली देखकर क़रीब 14 घंटे बाद चाय-नाश्ता नसीब होने की उम्मीद बंधी. मेरी उम्मीद गलत भी नहीं थी.

आख़िर क्यों है मुज़फ़्फ़रनगर में तनाव

'चूल्हा बंद हो जाएगा'

मुज़फ़्फरनगर में कर्फ्यू के सन्नाटे और तनाव के बाद घासीपुरा में शांति मिली. क़रीब साढ़े चार हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में सभी धर्मों-जातियों के लोग रहते हैं. कुछ गिने-चुने घर मुसलमानों के भी हैं.

हमने देखा कि यहाँ के हिंदू मुसलमानों को ढांढस बंधा रहे थे. 62 साल के नेत्रपाल ने कहा कि घासीपुरा गाँव में कुछ नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ के बच्चे अब भी बुजुर्गों की सुनते हैं. नेत्रपाल की बात में दम था.

अब तक मुज़फ़्फ़रनगर में मैंने जितने भी चेहरे देखे थे उन सब पर ख़ौफ़ हावी था, पर यहाँ के लोगों के चेहरों पर हमें सुकून और भरोसा दिखा.

हल्की बारिश के बीच लोग एक गुमटी के बाहर टिन के शेड के नीचे बैठे थे. 26 साल के राकेश ने कहा, "हम सब ग़रीब लोग हैं और हम जानते हैं कि अगर दंगा हुआ और हमारे गाँव में पीएएसी आ गई, तो काम-धंधे बंद हो जाएंगे. हमें मज़दूरी नहीं मिलेगी और दो दिन में ही हमारे घर का चूल्हा बंद हो जाएगा."

'इस गांव में ख़तरा नहीं'

पास खड़े 49 वर्षीय अफ़जाल कहते हैं, "मैं बचपन से इस गाँव में रह रहा हूँ. यहाँ के लोगों में मुहब्बत है. यही वजह है कि यहाँ से मात्र चार-पांच किलोमीटर दूर पुर बालियान गाँव में फायरिंग हो रही हैं, लेकिन फिर भी हमें कोई डर नहीं. हमें अपने गाँव के लोगों की मुहब्बत पर पूरा भरोसा है."

हम बात कर ही रहे थे कि गाँव के युवाओं ने कहा कि वे अपने गाँव के नाम वाले बोर्ड के पास खड़े होकर फोटो खिंचवाना चाहते हैं, ताकि दुनिया को इस मुहब्बत का संदेश दे सकें.

एक और युवा प्रवीण सिंह ने नेत्रपाल की बात की तसदीक़ की. उन्होंने भी बताया कि गाँव में लोगों के मिलनसार होने की वजह यह है कि सभी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं. तभी किसी ने बताया कि पास के पुर बालियान गाँव में सेना पहुँच गई है.

पुर बालियान और घासीपुरा के बीच क़रीब साढ़े चार किलोमीटर की दूरी है. यही वो गाँव है, जहाँ महापंचायत से लौट रहे लोगों पर हमला हुआ था और जिसकी ख़बर के बाद मुज़फ़्फ़रनगर के ग्रामीण इलाक़ों में तनाव पैदा हो गया था.

हिंसा का शिकार हुआ मंसूरपुर गाँव भी घासीपुरा से सिर्फ़ पाँच किलोमीटर दूर है. जिस वक़्त मैं गांव वालों से बात कर रहा था, उसी वक्त मोबाइल की घंटियों की शक्ल में मंसूरपुर से हिंसा की ख़बरें आ रहीं थी.

मगर इन ख़बरों को लेकर 50 वर्षीय मंज़ूर हुसैन बेचैन नहीं थे. उन्होंने कहा, "हमने अपना पूरा जीवन इसी गाँव में बिताया है और हम यहाँ के लोगों को जानते हैं. हमें इस गाँव में कोई ख़तरा नहीं."

Image caption आशा को डर है कि अगर बाहरी लोगों ने माहौल ख़राब किया, तो क्या होगा?

बारिश रुकी, तो हम बात करते हुए गाँव की मस्ज़िद तक पहुँचे. मस्जिद के सामने एक सैनी परिवार का घर है. यहाँ मौजूद लोगों के चेहरे देखकर यह कह पाना मुश्किल था कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान.

चिंता

चेहरा ढके एक महिला वहां से गुज़रीं. हमारी बातचीत सुनकर वो रुकीं और बोलीं, "घासीपुरा के लोग तो कभी नहीं लड़ेंगे, लेकिन जो बाहरी लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं, अगर वो गाँव में आ गए तो क्या होगा?"

35 वर्षीय आशा की चिंता हमें जायज़ लगी. मुज़फ़्फरनगर और आसपास हिंसा की असल वजह अब तक अफ़वाह और भड़काऊ बयानबाज़ी रही है.

जिस वीडियो ने पूरे इलाक़े की फिज़ां में ज़हर घोला, उसका भी यहाँ के लोगों पर असर नहीं था.

घासीपुरा मुज़फ़्फ़रनगर का शायद अकेला ऐसा गाँव नहीं, जहाँ गांव वाले नफ़रत से लड़ रहे हैं. हो सकता है कि ऐसे और भी गांव हों. देखना यह है कि अफ़वाहों और नफ़रत से इस जंग में प्रशासन इनका साथ दे पाता है या नहीं.

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