सपने देखो, साहस करो: राहा मोहर्रक

  • 10 सितंबर 2013
सऊदी अरब, राहा मोहर्रक, माउंट एवरेस्ट, अफ्रीका, पर्वत, महिला, अधिकार, समाज

वे मिसाल बन गई हैं उन औरतों के लिए, जो जीवन में चुनौतियां स्वीकार करती हैं और उन्हें जीतकर दिखाती हैं. 27 साल की राहा मोहर्रक. कौन हैं वे, और ऐसी क्या खूबी है उनमें.

दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर फ़तह की बात हो और महिलाओं का ज़िक्र हो, तो नाम आता है भारत की बछेंद्री पाल, अरुणिमा सिन्हा, पाकिस्तान की समीना बेग का.

अब इन नामों की फे़हरिस्त में राहा मोहर्रक का भी नाम जुड़ गया है. इस साल मई में राहा माउंट एवरेस्ट पर फ़तह हासिल करने वाली सऊदी अरब की पहली महिला बन गईं.

चुनौती को स्वीकारा

राहा ऐसे समाज से आती हैं, जहां लड़कियों को साइकिल चलाने की भी इजाज़त लेनी पड़ती है. अपनी गतिविधियों के लिए उन्हें पुरुष अभिभावक की मर्ज़ी का इंतज़ार करना पड़ता है.

मगर राहा अलग रहीं. वे ख़ुदमुख़्तार, खेलकूद में रुचि रखने वाली और दुस्साहसी मिज़ाज की हैं.

पर्वतों पर चढ़ने का ख्याल राहा को सबसे पहले नवंबर 2011 में आया. तब जीवन में अचानक काफी उथलपुथल भरा पड़ाव आ गया था.

राहा ने नौकरी छोड़ दी थी, उन्हें सर्जरी करानी पड़ी थी.

राहा अपने सपनों के लिए संघर्ष करने में विश्वास रखती हैं.

राहा इन सबसे बाहर निकलना चाहती थीं. वे लीक से हटकर कुछ ऐसा करना चाह रही थीं, जिसमें जोखिम हो, चुनौती हो.

राहा बताती हैं, "उस समय मुझे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का ख्याल आया क्योंकि किसी ने कहा कि मैं वहां नहीं जा सकती क्योंकि मैं सऊदी महिला हूं. फिर क्या था मैंने ठान लिया."

वे कहती हैं, "किसी खास जगह पैदा होने के कारण किसी काम के लिए अयोग्य बता दी जाऊं या सऊदी अरब में जन्म लेने के कारण किसी पाबंदी में बांध दी जाऊं, यह मुझे मंजूर नहीं था."

पहाड़ पर चढ़ने का सबसे पहला अभियान उन्होंने अफ़्रीका से शुरू किया. वे वहां के पहाड़ किलीमंजारो पर गईं.

पहाड़ पर चढ़ने का उनका पहला अनुभव काफी खराब और थकाऊ रहा. मगर इस अनुभव से उन्हें हिम्मत आई, जोश आया. बाद में ये महसूस कर अच्छा लगा कि वे 5800 मीटर की ऊंचाई पर अफ्रीका की छत तक पहुंच गई थीं.

पिता की ठंडी प्रतिक्रिया

राहा बताती हैं कि अरब में किसी लड़की को पर्वतारोहण या ऐसे किसी गतिविधि की इजाज़त नहीं है. इसके लिए माता-पिता से बात करनी पड़ती है.

उन्होंने जब पिता को फोन पर अफ्रीका के पहाड़ पर सफलतापूर्वक चढ़ने की बात बताई, तो उन्होंने ठंडी प्रतिक्रिया दी.

मगर राहा तो इरादा कर चुकी थीं. उनकी अगली मंजिल थी- माउंट एवरेस्ट.

उस दिन उनका जन्मदिन था. पिता ने पूछा कि जन्मदिन पर क्या तोहफ़ा चाहिए तो राहा ने कह दिया, एवरेस्ट.

उनके पहाड़ चढ़ने के अभियान के बारे में सऊदी अरब के समाज की प्रतिक्रिया दिलचस्प थी.

राहा बताती हैं, "मैंने सपने भी नहीं सोचा था कि मेरे इस काम को मीडिया इतनी तवज्जो देगा. लोग मेरी उपलब्धियों के बारे में बातें करने लगे थे. मैं हैरान थी"

सराहना ज़्यादा

राहा की कहानी को मीडिया की ओर से खूब तवज्जो मिली.

वे कहती हैं, "लोग मेरा उत्साह बढ़ा रहे थे. वे आश्चर्य जताते हुए पूछते थे कि यह सब मैंने किस तरह किया."

राहा आगे कहती हैं, "एक सऊदी महिला होने के कारण मैं किसी भी आलोचना के लिए तैयार थी."

राहा ने जो किया, उसके लिए उन्हें कड़ी आलोचना का भी शिकार होना पड़ा, लेकिन उन्हें आलोचना से ज़्यादा लोगों की सराहना मिली.

राहा बताती हैं, "मैं चकित हूं कि मुझे आलोचना से ज़्यादा लोगों की सराहना मिली. एक लड़की ने मुझे ईमेल में कहा कि उसे मेरी कहानी से इतना साहस आया कि वह अपने पिता से साइकिल की मांग कर बैठी. यह मेरे लिए सबसे खुशी का लम्हा था."

उन्हें अनुमान नहीं था कि उनका ये कदम अरब में एक तरह के आंदोलन को जन्म देगा. उनके अनुमान से परे उनकी उपलब्धियां अरब में बच्चियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं.

परिवार की नज़र में बाग़ी

लोग महिलाओं की परंपरागत भूमिका में इस तरह के परिवर्तन के लिए राहा को 'पोस्टर चाइल्ड' के बतौर देख रहे हैं.

राहा कभी नहीं चाहती थीं कि उनके जीवन, उनके सपने को कोई नकारात्मक तरीके से ले क्योंकि सऊदी समाज में लोग बस एक ग़लती की ताक में रहते हैं.

सऊदी अरब में लड़कियों को साइकिल चलाने के लिए भी घर वालों से इजाज़त लेनी पड़ती है.

एक हथियार के रूप में आपका इस्तेमाल करते हैं. उन्हें किसी तरह का स्पेस नहीं देते. परंपरागत भूमिका में बदलाव नहीं लाने देना चाहते.

समाज के इस रवैये के बारे में राहा कहती हैं, "मैं अपने काम के ज़रिए बस इतना संदेश देना चाहती हूं कि सपने देखो, साहस करो और आगे बढ़कर परिवार वालों से कह दो क्योंकि हमारा समाज नहीं चाहता कि लड़कियां समाज के परंपरागत उसूलों के ख़िलाफ़ विद्रोह करें."

कई लोग राहा की कहानी को बेहद नकारात्मक तरीके से देख रहे हैं. राहा कहती हैं, "मैं किसी को विद्रोही बनने के लिए नहीं कह रही. भले मैं अपने परिवारवालों की नजरों में विद्रोही हूं. हां, मैं यह नहीं कह रही कि अपने सपनों को पाने की धुन में संस्कृति से खुद को काट लें."

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