वेतन हज़ारों में, तो संपत्ति करोड़ों में कैसे?

भ्रष्टाचार, आईएएस, नौकरशाह

टीनू और अरविंद जोशी पति-पत्नी हैं और 1979 बैच के मध्य प्रदेश काडर के आईएएस अधिकारी हैं. 2011 में आयकर विभाग ने उनके भोपाल के घर में छापा मार कर 3 करोड़ रुपए नकद और करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज़ बरामद किए थे.

समझा जाता है कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने उनको बर्ख़ास्त किए जाने की सिफ़ारिश कर दी है और उनकी अनुशासनात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट फ़ाइल लोक सेवा आयोग के पास भेज दी गई है. अब ये देखा जाना है कि लोक सेवा आयोग उनके केस में अंतिम फ़ैसला क्या करता है.

केंद्रीय सतर्कता आयोग को वर्ष 2012 में भ्रष्टाचार के संबंध में 37,208 शिकायतें मिली हैं जो कि पिछले साल की तुलना में 113 फ़ीसदी अधिक हैं.

एक और उदाहरण देखिए. त्रिलोकीनाथ शर्मा पंजाब इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड में चीफ़ इलेक्ट्रिकल इंजीनयर के पद पर काम करते थे.

उनका प्रति माह वेतन था 26,000 रुपए. लेकिन उनके पास से करीब 2.82 करोड़ की संपत्ति और धन मिला.

भ्रष्टाचार से कमाई

अगर उन्होंने अपने वेतन से एक पैसा भी ख़र्च नहीं किया होता तब भी पकड़े जाने तक उन्होंने सिर्फ़ 6 लाख 24 हज़ार रुपए वेतन के तौर पर कमाए होते. और अगर वो इसी वेतन पर काम करते तो उन्हें 2.82 करोड़ रुपए जमा करने में 90 साल लग जाते.

सवाल ये उठता है कि शर्मा इतनी जल्दी इतने पैसों के मालिक कैसे हो गए?

वो बिना किसी व्यवधान के बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने, एनओसी जारी करने और इस बात का प्रमाणपत्र देने के लिए पैसे ले रहे थे कि औद्योगिक इकाइयाँ वास्तव से कम बिजली ख़र्च कर रही थीं.

जब लुधियाना के रहने वाले जसविंदर सिंह वालिया ने नए बिजली कनेक्शन की अर्ज़ी पास करने के लिए उन्हें कथित तौर पर 55,000 रुपए दिए तो पंजाब सतर्कता ब्यूरो के लोगों ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया.

जांच से पता चला कि शर्मा ने बाक़ायदा एक डायरी बना रख रखी थी और कथित तौर पर हर महीने 9 से 18 लाख रुपए रिश्वत से कमा रहे थे.

अभी कुछ दिनों पहले रेलवे मंत्री के एक रिश्तेदार के एक ऊंचे पद की नियुक्ति के लिए एक बड़ी घूस लेने का मामला सामने आया था.

चेक से रिश्वत

Image caption रिश्वतखोरी के मामले में नजदीकी रिश्तेदार के शामिल होने के आरोप के बाद पवन बंसल को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था.

10 साल पहले सीबीआई ने तत्कालीन वित्त मंत्री गिंगी रामचंद्रन के निजी सचिव आर पेरूमलस्वामी को उप आयकर आयुक्त अनुराग वर्धन से उनका तबादला करने के लिए कथित तौर पर 4 लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ़्तार किया था.

मज़े की बात ये है कि पेरुमलस्वामी के पास 69 लाख रुपए नक़द के अलावा 85 लाख रुपए के ब्लैंक चेक भी मिले थे.

ये तथ्य कि भ्रष्ट अधिकारी चेक से रिश्वत लेने के लिए तैयार थे, बताता है कि भारतीय व्यवस्था में भ्रष्टाचार किस हद तक घर कर गया है.

मैंने पूर्व कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा से पूछा कि क्या आईएएस अधिकारी इसलिए रिश्वत लेते हैं क्योंकि उनकी तनख़्वाह बहुत कम है तो उनका कहना था, "यही बड़े ताज्जु़ब की बात है. अब तनख्वाहें उतनी कम नहीं हैं, जितनी पहले हुआ करती थी. जब मैं कैबिनेट सेक्रेटरी रिटायर हुआ तो मेरी तनख़्वाह थी पंद्रह हज़ार, अब मेरी पेंशन 75 हज़ार हो गई है. तो मेरी पेंशन अब आख़िरी तनख़्वाह से पाँच गुनी है. इसी तरीके से जो तनख़्वाह पहले डिप्टी सेक्रटरी को मिलती थी, वह अब डिप्टी सेक्रटरी के ड्राइवर को मिल रही है. तो यह कह देना कि तनख़्वाह कम थी, इसलिए लोगों ने बेइमानी की तरफ कदम उठाया सही नहीं है. मैं तो देखता हूं कि जैसे-जैसे तनख़्वाह बढ़ रही है लोगों की बदमाशी भी बढ़ रही है."

अकूत संपत्ति

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की साल 2005 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सार्वजनिक कार्यालय से काम कराने के लिए भारत के 62 फ़ीसदी लोगों को रिश्वत देने का अनुभव है.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का ही मानना है कि भारत में ट्रक मालिकों को हर साल अपना काम कराने के लिए करीब 22,500 करोड़ रुपए की रिश्वत देनी पड़ती है.

साल 1996 में उत्तर प्रदेश आईएएस एसोसिएशन के एक सर्वेक्षण में अखंड प्रताप सिंह को कथित रूप से प्रदेश का सबसे भ्रष्ट अफ़सर बताया गया था.

उनकी सारी संपत्ति की जाँच कराने की माँग की गई थी, जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने नामंज़ूर कर दिया था.

केंद्र सरकार ने अखंड प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ सीबीआई जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति मांगी थी जिसे राजनाथ सिंह सरकार ने अस्वीकार कर दिया था.

इसके बाद आई मायावती सरकार ने न केवल सीबीआई जांच की एक और मांग ठुकराई बल्कि सिंह के ख़िलाफ़ विजिलेंस के मामले भी वापस ले लिए.

मायावती के बाद आए मुलायम सिंह यादव एक कदम आगे गए और उन्होंने अखंड प्रताप सिंह को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया और बाद में केंद्र सरकार की सहमति से उन्हें सेवा विस्तार भी दिया.

चार अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्रियों का अखंडप्रताप सिंह को लगातार बचाना अपने आप में बड़ी बात थी लेकिन ये इस बात की पुष्टि भी थी कि खुद अखंड प्रताप सिंह अलग अलग राजनीतिक आक़ाओं को साधने में कितना माहिर थे.

उनके अवकाश लेने के बाद सीबीआई ने पाया कि उनके पास उनकी आय के स्रोतों से कहीं ज़्यादा धन था जिसे उन्होंने अपनी तीस साल की सरकारी नौकरी के दौरान जमा किया था. बताया गया कि उनकी संपत्तियों में एक बड़ी राजसी कोठी, चार अन्य घर, चार प्लॉट, लखनऊ के पास एक फ़ॉर्म हाउस, गुड़गाँव में चार फ़्लैट, 82 लाख रुपए नक़द और 13 वाहन शामिल थे.(हिंदुस्तान टाइम्स, 24 मार्च 2005)

मुख्य सचिव का पद

मुलायम सिंह यादव ने नीरा यादव के खिलाफ़ भ्रष्टाचार की कई शिकायतों के बावजूद उन्हें साल 2005 में राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त किया था.

Image caption उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव पर भ्रष्टाचार में शामिल होने के कई आरोप लगे.

नीरा यादव को यूपी आईएएसएसोसिएशन ने 1996 में कथित तौर पर राज्य का दूसरा सबसे भ्रष्ट अधिकारी घोषित किया था, (हाऊ नीरा गॉट द टॉप जॉब, हिंदुस्तान टाइम्स 2 मई,2005) लेकिन मुलायम सिंह के लिए इस महत्वपूर्ण पद के लिए ज़रूरी योग्यताओं में ईमानदारी का कोई महत्व नहीं था.

भ्रष्टाचार के कम जोखिम और अधिक इनाम वाली गतिविधि बनने का मुख्य कारण है, अब तक बहुत कम लोगों को भ्रष्टाचार के लिए सज़ा मिल पाना.

आपराधिक न्याय प्रणाली ने शिकायत करने वाले की कम और भ्रष्ट अधिकारी की अधिक सुनी है.

अपने ज़माने में अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर आईएएस अधिकारी भूरे लाल कहते हैं, "जो आदमी सबसे ज़्यादा हाइली पेड हैं, सबसे ज़्यादा करप्ट वही है. यह कहना कि तनख़्वाह नहीं मिल रही या वेतन कम है, उस वज़ह से आदमी करप्ट हो रहा है, ये ग़लत है. ये एक बीमारी है. क्यों न अपनी आदत आप ये बना लें कि मुझे अपना कोट या अपनी चादर, अपने साधनों के मुताबिक लेनी है तो काफ़ी कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन जब हम उपभोग की होड़ में दौड़ते हैं तो उसका कोई अंत नहीं है. उसके पास एक करोड़ हो गया तो मेरे पास दस करोड़ होना चाहिए.यह चीज़ हमको पथ से हटा देती है और हम करप्ट हो जाते हैं.एक बार हमने अंतरात्मा की आवाज़ को मारा तो फिर आप उसको रोक नहीं सकते."

रिश्वत के 48 मौके

फ़ैसले आने में देरी के कारण आपराधिक न्याय प्रणाली पूरी तरह से ठप्प हो गई है.

भ्रष्टाचार के कारण भारतको अपनी कुल जीडीपी का डेढ़ से दो फ़ीसदी का नुकसान उठाना पड़ता है.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार भ्रष्टाचार के पैमाने पर दुनिया के 174 देशों में भारत का स्थान 94वाँ है. भ्रष्टाचार इस हद तक बढ़ा है कि लोग आईएएस को स्टील फ़्रेम की जगह स्टील(चोर) फ़्रेम कहने लगे हैं.

ऑल इंडिया मेन्यूफ़ैक्चरिंग एसोसिएशन के पूर्व प्रमुख विजय कोलांतरी का कहना है, "लाइसेंस राज ख़त्म हो जाने के बावजूद भारत में एक छोटी फ़ैक्ट्री भी शुरू करने के लिए 49 अलग अलग लाइसेंस लेने होते हैं. इसका अर्थ ये हुआ कि सरकारी बाबुओं को रिश्वत लेने के करीब 48 मौके मिलते हैं. एक बार कारोबार शुरू हो जाने के बाद हर साल 65 अफ़सर उसके संस्थान का मुआयना करने आते हैं यानी उसे साल के हर पाँचवे दिन एक बाबू को संतुष्ट करना होता है."

तैनाती के लिए रिश्वत

किसी भी अधिकारी की पोस्टिंग में मदद करने के लिए बाबू और नेता रिश्वत में मिले पैसों को आपस में बांटते हैं.

एक अच्छी जगह पर एक कान्सटेबल की पोस्टिंग के लिए एक लाख रुपए देना और उससे बड़े पद के लिए कई लाख रुपए देना आमबात है.

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दिल्ली के बाहरी इलाके में जहाँ बहुत सारे फ़ॉर्म हाउस हैं, पोस्टिंग के लिए 75 लाख से एक करोड़ रुपए देने पड़ते हैं.

आयकर अधिकारी मुंबई में अपनी तैनाती कराने के लिए पद के हिसाब से दस लाख से पचास लाख रुपए ख़र्च करते हैं. अक्सर लोग ये कहते सुने जाते हैं कि जो रिश्वत दे सकते हैं और जो इसे देने के लिए तैयार रहते हैं वही इससे प्रभावित होते हैं.

लेकिन सच्चाई ये है कि इसकी सबसे बड़ी मार ग़रीब पर पड़ती है.

दसवीं पंचवर्षीय योजना की समीक्षा में ये बात सामने आई है कि हर साल ग़रीबी उन्मूलन पर ख़र्च किये जाने वाले धन में से 40,000 करोड़ रुपए ग़रीब लोगों के पास पहुँच ही नहीं पाते.

यहाँ तक सलाह दी गई है कि बाबुओं पर निर्भर रहने के बजाए अगर सरकार हर साल भारत के पांच करोड़ सबसे ग़रीब लोगों को 8000 रुपए मनीऑर्डर से भेज दे तो भी काफ़ी फ़र्क पड़ेगा.

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