डिजिटल इंडियंस: जहां अखबार, रेडियो, टीवी नहीं, 'वहां मोबाइल मीडिया'

  • 11 सितंबर 2013
सीजीनेट स्वर

छत्तीसगढ़ के ज़िले कवर्धा में एक वनरक्षक ने जब कुछ बैगा आदिवासियों से कथित तौर पर 99 हज़ार रुपए रिश्वत ली, तो स्थानीय लोगों ने मोबाइल रेडियो स्टेशन ‘सीजीनेट स्वर’ पर इसकी शिकायत कर दी. शिकायत का पता चलते ही वन अधिकारी को पैसे लौटाने पड़े और उन्होंने माफ़ी भी मांगी. मामले की अब जांच हो रही है.

ये ताक़त है लोकल कम्यूनिटी नेटवर्क की, जिसने स्थानीय लोगों को अपनी आवाज़ सत्ता-प्रशासन में बैठे लोगों तक पहुँचा पाने का एक विश्वास दिया है.

'सीजीनेट स्वर' मध्य भारत के आदीवासी क्षेत्रों पर केंद्रित और मोबाइल पर आधारित एक रेडियो स्टेशन है. लोग अपना संदेश फ़ोन के ज़रिए रिकॉर्ड करते हैं और यह संदेश प्रारंभिक जांच के बाद वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया जाता है साथ ही इन्हें मोबाइल पर भी सुना जा सकता हैं. मोबाइल पर सुनने के लिए श्रोताओं को बस एक नंबर पर कॉल करना होता है.

सीजीनेट पर सामाजिक मुद्दों से लेकर सांस्कृतिक विषयों से जुड़े कार्यक्रम तक प्रसारित किए जाते हैं.

इंटरनेट और मोबाइल ने कम्यूनिटी बिल्डिंग के तरीक़े को बदलकर इसे काफ़ी सहज बनाया है. किसी जगह लोगों की वास्तविक मौजूदगी की ज़रूरत ख़त्म कर इंटरनेट और मोबाइल ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचने का एक रास्ता दिया है.

आम लोगों का 'हथियार'

राजधानी दिल्ली से दूर देश के एक राज्य के अंदरूनी इलाकों में, जहां सरकारी नीतियां और सहूलियतें तक नहीं पहुंच पातीं, वहां 'सीजीनेट स्वर' जैसी पहल को लोग अपना हथियार मान रहे हैं.

Image caption सीजीनेट स्वर पर ऑडियो प्रकाशित किए जाने से पहले उसे सुना और संपादित किया जाता है.

इसे शुरू करने वाले शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं, “रेडियो, मोबाइल और इंटरनेट- इन तीनों को जोड़कर क्या एक ऐसा मीडिया प्लेटफ़ॉर्म बनाया जा सकता है जो लोकतांत्रिक हो, जहां हर किसी को पूरी हिस्सेदारी मिले. हम लोग एक ऐसा ही मीडिया बनाने की कोशिश कर रहे हैं.”

सिर्फ 'सीजीनेट स्वर' ही नहीं, कुछ और भी संगठन हैं जो लोगों को अपनी बात रखने का मंच दे रहे हैं.

'ग्रामवाणी' ऐसी ही सेवा है, जिसके ज़रिए श्रोता अपने संदेश सामुदायिक रेडियो स्टेशनों तक पहुंचाते हैं.

'मिस कॉल करें और सुनें'

श्रोताओं को दिए गए नंबर पर सिर्फ एक कॉल करना होता है और उनका संदेश स्वचालित तरीके से रिकॉर्ड होना शुरू हो जाता है.

यही रिकॉर्डिंग सामुदायिक रेडियो स्टेशन के संचालक अपने कार्यक्रम में सुना देते हैं.

सरल तकनीक से बने एक आसान सूचना मॉडल के ज़रिए ग्रामवाणी 15 भारतीय राज्यों समेत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका में क़रीब 20 लाख लोगों तक पहुंचने का दावा करता है.

ग्रामवाणी से संबंधित 30 ग्रामीण रेडियो स्टेशन इंटरनेट और मोबाइल फोन के ज़रिए खबरें और लोगों की शिकायतें जुटाते हैं. साफ-सफाई से जुड़े मुद्दे हों या फिर स्थानीय राशन केंद्रों में भ्रष्टाचार के मामले, ग्रामवाणी इन सभी मुद्दों पर सिटिज़न रिपोर्टर्स के ज़रिए रोशनी डालती है.

लेकिन भारत के उन इलाकों में जहां टेरेस्ट्रियल रेडियो के सिग्नल नहीं पहुंच पाते, वहां ये सेवा नहीं पहुंचती.

इस समस्या को देखते हुए ग्रामवाणी ने मोबाइल फ़ोन पर आधारित तकनीक अपनाई जिसे नाम दिया- मोबाइल वाणी.

मोबाइल वाणी

मोबाइल वाणी एक ऐसी कम्युनिटी नेटवर्किंग सेवा है जिसमें मोबाइल फ़ोन के ज़रिए कार्यक्रम भेजे और प्रसारित किए जाते हैं. लिहाज़ा इसके लिए न तो इंटरनेट और न रेडियो सेट की ज़रूरत पड़ती है.

इसके संचालक आशीष टंडन बताते हैं, “ऐसी कम्युनिटीज़ जो बिल्कुल दूर-दराज़ के इलाकों में रहती हैं, जिनके पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं ताकि वो अपने आपको देश से जोड़ पाए. देश में जो हो रहा है उस पर अपनी बात रख पाएँ, उन लोगों को हमने एक ज़रिया दिया है.”

झारखंड में धनबाद ज़िले के महुदा बस्ती गाँव में रहने वाले राधू राय इस सेवा का इस्तेमाल करने वालों में से हैं.

उन्होंने हमें बताया, "इस सेवा के ज़रिए हमें एक दूसरे के अनुभवों से भी सीखने का मौक़ा मिला है. इस क्षेत्र में कई तरह की मिट्टी है और उससे जुड़ी अगर कोई परेशानी है या उसका समाधान है तो लोग उसे यहाँ रिकॉर्ड कराते हैं. इससे दूसरे क्षेत्र के अनभिज्ञ लोगों को जानकारी हो जाती है."

राय के मुताबिक़, "झारखंड में धान और मक्का की प्रमुख फ़सल होती है तो उससे जुड़े जो विशेषज्ञ हैं, वे हमें खेती के तरीक़ों के बारे में बताते हैं. बुज़ुर्ग लोग भी अपना अनुभव बाँटते हैं, तो बाक़ी लोग उसे सुनते हैं और फ़ायदा उठा पाते हैं."

इस तरह मोबाइल वाणी उन लोगों को भी जोड़ता है, जिन्होंने अपना दायरा वर्षों से अपने गांवों तक ही सीमित रखा हो.

आशीष टंडन कहते हैं, “मोबाइल वाणी के ज़रिए हम जिन लोगों से जुड़े हैं, वो ऐसे लोग हैं जो 60-70 साल से एक ही गांव में रह रहे हैं. अब उन्हें ये अहसास हो रहा है कि उनकी कम्युनिटी गांव की सीमा तक सीमित नहीं है. मोबाइल वाणी के ज़रिए अब तो एक दूसरे से जुड़ रहे हैं और कम्यूनिटी के आकार का विस्तार हो रहा है.”

डिजिटल माध्यम से एक दूसरे से जुड़ने का विचार शायद लोगों को भी पसंद आ रहा है, इसीलिए मोबाइल वाणी और सीजीनेट स्वर के कार्यक्रमों में लोग जमकर हिस्सा भी ले रहे हैं.

तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में जैसे-जैसे मोबाइल और इंटरनेट का फैलाव बढ़ेगा और तकनीक सुधरेगी, वैसे-वैसे इस तरह के टूल्स का महत्व भी बढ़ेगा.

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