'ग़रीबों को फाँसी...बाबा या नेताओं का क्या'?

  • 10 सितंबर 2013
रविदास कैंप

दिल्ली गैंगरेप मामले में जिस वक्त अदालत अपना फ़ैसला सुना रही थी, उस वक्त दिल्ली की एक झुग्गी-बस्ती में जिंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी.

गैंगरेप के तीन अभियुक्त इसी इलाक़े के ही रहने वाले हैं. झुग्गियों के बाहर पड़ी चारपाइयों पर गेहूँ सूख रहे थे. महिलाएं पानी का 'जुगाड़' करने में जुटी थीं.

पुलिस और पत्रकारों की मौज़ूदगी ने माहौल को स्थानीय लोगों के लिए असहज बना दिया था.

तंग गलियाँ और उनसे भी तंग झुग्गियों में लोगों ने खुद को क़ैद कर लिया था. टीवी पर टिकी आँखें अदालत के फ़ैसले का इंतजार कर रही थीं.

पत्रकार फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देने वाले लोगों की तलाश में थे. कुछ ही लोग थे जो कैमरे के सामने अपनी बात रखने को तैयार थे.

अभियुक्त पवन गुप्ता की झुग्गी पर ताला लगा था. अंदर उसकी नाबालिग बहन अकेली थी, जो शायद पत्रकारों के पहुँचने से परेशान थी.

पवन के पिता फल बेचते हैं. हालाँकि मंगलवार को उन्होंने अपनी दुकान नहीं खोली थी.

फाँसी से क्या

पवन के पड़ोस में रहने वाली एक बीस वर्षीय युवती ने अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा, "जो भी उन्होंने किया वह ग़लत किया. उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि उन्होंने ग़लत काम किया है. क़ानून के तहत जो भी सही सज़ा हो वो उन्हें मिलनी चाहिए लेकिन अलग से कोई सज़ा नहीं दी जानी चाहिए, ज़रूरी नहीं है कि उन्हें फाँसी ही दी जाए."

कॉलेज जाने वाली ये युवती कहती है, "आजकल बलात्कार के मामले कुछ ज़्यादा ही सामने आ रहे हैं. मैं शाम को कॉलेज से वापस आती हूँ. रास्ते में बहुत डर लगता है. भीड़ होती है तो हिम्मत बंध जाती है लेकिन सन्नाटे में मन बैठ जाता है."

अभियुक्त के बारे में वे कहती हैं, "मुझे कभी नहीं लगा कि वे इस तरह का कोई अपराध कर सकते हैं. मेरा कभी उनसे सामना ही नहीं हुआ."

एक अन्य अभियुक्त विनय का घर भी बंद था. उनकी बहन सुबह तक तो घर पर ही थीं लेकिन पत्रकारों के पहुँचने के बाद वे भी वहाँ से चली गईं.

नामचीन आरोपियों का क्या?

विनय के ठीक पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा, "सज़ा तो जितने भी बलात्कारी है सबको ही मिलनी चाहिए. जो भी सजा इन ग़रीब बच्चों को अदालत देगी वो सभी को मिलनी चाहिए. चाहे वो कोई बाबा हो या फिर नेता या अमीरों के बच्चे हों."

वे कहती हैं, "मीडिया ने सिर्फ़ इस मामले को ही तूल दिया है बाकी मामलों पर ख़ामोश रहती है. जब तक हर मामलों को ऐसे ही नहीं लिया जाएगा तब तक इंसाफ़ कैसे होगा. सिर्फ़ ग़रीबों के मामले उठाकर क्या न्याया हो जाएगा?"

अभियुक्तों के बारे में वे कहती हैं, "वे ऐसी ग़लती करने वाले नहीं लगते थे. पता नहीं कैसे उन्होंने ये अपराध कर दिया. इस झुग्गी के बच्चे कॉलेज में पढ़ते हैं और सरकारी नौकरियों तक पहुँचे हैं."

अभियुक्त राम सिंह की झुग्गी की ओर जाने वाली संकरी गली में कुछ महिलाएं चेहरा ढके बैठी थीं और अदालत के फ़ैसले पर बात कर रही थीं.

Image caption रविदास कैंप में फ़ैसले के मद्देनज़र जवान तैनात किए गए थे.

उनमें से एक ने कहा, "इन्होंने अपराध किया तब ही तो अदालत ने दोषी माना है. बेग़ुनाह को थोड़े ही दोषी बताया जाता है. अगर अदालत कड़ी सज़ा देगी तो लोग इस तरह के अपराध करने से डरेंगे यदि सज़ा सही नहीं दी गई तो लोग शायद ऐसे ही अपराध करते रहे."

अभियुक्तों के बारे में वे कहती हैं कि यहाँ किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि ये लोग ऐसा घिनौना अपराध कर सकते हैं. यहाँ वे सब सही से रहते थे.

फ़ैसला आने के बाद कुछ और पत्रकार इस तंग झुग्गी झोपड़ी में पहुँच गए. अभियुक्त पवन गुप्ता की नाबालिग बहन ने झल्लाते हुए, 'मेरा जीवन काहे को नर्क बना रहे हो...'

वसंत विहार गैंगरेप ने रविदास नगर को बदनाम कर दिया है. लेकिन यहाँ सबकुछ बुरा ही नहीं. आठ गुणा दस फीट के कमरे में यहाँ पूरा परिवार बसता है. और इसी जगह में से युवा अपने पढ़ने के लिए स्थान बना ही लेते हैं.

जद्दोजहद

यहाँ की लड़कियाँ और लड़के दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में पढ़ते हैं. बेहद मुश्किल माहौल में वे मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं.

गैंगरेप की घटना ने उनके जीवन को बदला ज़रूर है लेकिन वे अपनी पहचान इससे अलहदा चाहते हैं.

यही वजह है कि इस इलाक़े में कोई भी अपनी पहचान ज़ाहिर करके इस बलात्कार कांड के बारे में बात करने को तैयार नहीं हुआ.

हाँ ये सवाल बार-बार किया गया कि सिर्फ़ इस एक मामले में सख़्ती दिखाकर, अभियुक्तों को कड़ी सजा देकर क्या हालात को बदला जा सकता है?

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