हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता

Image caption नागार्जुन ने 'हज़ार-हज़ार बाहों वाली', 'खिचड़ी विप्लव देखा है हमने', 'चंदना', 'तालाब की मछलियां' जैसी काव्य रचनाएं कीं.

हिंदी के प्रख्यात कवि बाबा नागार्जुन की कविता 'गुलाबी चूड़ियाँ' मेरी तमाम पसंदीदा कविताओं में से एक सबसे प्रिय कविता है. एक प्रस्तर के भीतर जो स्निग्ध तत्व होता है उसके उद्घाटन की अपनी यतिगति के लिए ये कविता मुझे बेहद पसंद है.

कोई भी व्यक्ति कड़क होता है, कड़क सिंह होता है, मुच्छड़ सिंह होता है लेकिन उसके भीतर भी कुछ न कुछ बड़ा द्रावक होता है जैसे स्मृति का निजी पक्ष.

ये कविता पिता का वात्सल्य रेखांकित करती है ख़ासकर एक ऐसे पिता का वात्सल्य जो परदेस में रहा है. छूटा हुआ परिवार बिहार में, पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर पिता रोज़गार की चिंता में या किसी राजनीतिक आंदोलन का महास्वप्न अपनी आँखों में ढारे हुए अपना परिवार पीछे छोड़ आते हैं.

प्रगतिशील आंदोलन के दौरान तो ऐसे पिता बहुत हुए जिनके मन में ये अपराधबोध-सा रहा कि हम घर जार के तो आए हैं कबीर की तरह कि 'जो घर जारै आपना चलै हमारे साथ'. लेकिन जिनको सड़क पर छोड़ आए हैं आम की छाया में इंतज़ार करता हुआ, उनका क्या हाल होगा.

तो ये कविता एक तरह का नाट्य है दो ऐसे पुरुषों को बीच में जिनके भीतर पिता का हृदय है. और जैसे स्त्रियों में तादात्म्य घटित होता है वैसे पिताओं में भी होता है. पिता का जो वात्सल्य है वो कम सुंदर नहीं होता. उसका जो स्निग्ध पक्ष होता है, ये कविता अपनी पूरी बनावट में उसे धीरे-धीरे उजागर कर देती है.

यहां विरोधाभासों का अच्छा मंचन देखने को मिलता है -

Image caption नागार्जुन ने 'गुलाबी चूड़ियाँ' कविता 1961 में लिखी थी.

"अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा

आहिस्ते से बोला: हाँ सा'ब

लाख कहता हूँ, नहीं मानती है मुनिया

टाँगे हुए है कई दिनों से

अपनी अमानत

यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने

मैं भी सोचता हूँ

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ

किस जुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?

और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा

और मैंने एक नज़र उसे देखा

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में" (गुलाबी चूड़ियाँ - नागार्जुन)

ट्रक ड्राइवर, रिक्शावाले, ठेलेवाले - जितने भी परदेसी जितने भी परदेसी पिया हैं जिनका ज़िक्र लोककथाओं, गाथाओं और लोकजीवन में आता है, उनके हृदय में जो छोड़ी हुई बेटी का हृदय धड़कता है, उसका ये कविता पूरी त्वरा में मंचन करती है.

यहां पर अधेड़ उम्र के मुच्छड़ चेहरे की बड़ी-बड़ी आँखों में दुधिया वात्सल्य की उपस्थिति दरअसल मनुष्य के मन में, कड़क से कड़क मनुष्य के मन में कोमल भावनाओं की उपस्थिति है जो कि एक बहुत ही द्रावक स्थिति है.

मुझे ये कविता इसलिए भी महत्वपूर्ण लगती है कि यहां पर प्रगतिशील आंदोलन के समय में सारे के सारे लोग सड़क पर थे जैसे इप्टा के लोग, उनके यहां बच्चियां बहुत तेजस्विनी दिखाई गई हैं.

जैसे 'काबुलीवाला' में या फिर त्रिलोचन की 'चंपा काले काले अच्छर में' या फैज़ की जो 'मुनिज़ा' कविता है उसमें.

उनकी पत्नियां तो मुंह सिल के बैठी हैं, लेकिन जो नई बच्चियां बड़ी हो रही हैं वो सब की सब तर्क करनेवाली और तेजस्विनी लड़किया हैं. ये हमारे भविष्य को एक संबल देनेवाला बिंब है. इसलिए ये कविता मुझे बहुत अच्छी लगती है.

(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)

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